तुम बरगद जैसी छाया हो जेठ दोपहरी मे मां

तुम्हारी जिम्मेदारियां बहुत थी, तब समझ नहीं पाता था
कभी क्षोभ उमड़ता था और कभी याद बहुत आती थी
एक रोज तेरे आने का इंतजार सात दिन करता
जो कहना था तुमको वह तुम्हें देख के भूला करता

कभी लगा कि तुमको मेरी परवाह नहीं रहती है
कभी तुम्हें बताकर रोता,कभी पास न पाकर रोता
तेरा न होना जीवन में अभिशाप लगा करता था
सोचा करता कितना कुछ, तुम पास मगर न होती

फिर लगा कि साथ तो हो पर तुम समझ न पाती मुझको
कभी ध्यान नहीं दे पाती, कभी तुम ठुकराती मुझको

फिर एक दिन वह भी आया, तुमको रोते देखा था
तेरी आँखों में उस दिन मेरा दर्द झलक आया था
वो रातें मेरे सिरहाने जग जग तुमने काटा था
सच में, मां उस दिन तुमने ही दर्द मेरा बांटा था

मुट्ठी भर प्यास समेटा, तुमको प्रेरणा बनाकर
जीने की ललक बटोरा तेरा ही सहारा पाकर
उस दिन जाना कि तुमको मैं समझ नहीं पाया था
तुम मां थी, आखिर मैं तो तेरा ही छाया थी

अब भी झुंझलाता हूं मैं, जब पास तेरे होता हूं
पर मां, तुमसे ही अब भी मुझमें विश्वास भरा है
तुम हो तो अकेली कैसे, सांसों में सांस भरा है

तुम मुझे थाम ही लोगी जब चोट कहीं खाऊँगा
तुम मुझे सहारा दोगी, जब पास तेरे आऊँगा
दुख चाहे मैं पहुंचाऊँ, तुम क्षमा करोगी मुझको
यह निश्चल, सुदृढ़ भरोसा मैं और कहां पाऊँगा

तुम बरगद जैसी छाया हो जेठ दोपहरी मे मां
और पूस की धूप खिली सी मेरे जीवन में तुम हो
मैं पास नहीं पर हो तुम, विश्वास धरा रखा है
विश्वास अमर हो मेरा, कह सकूं सदा कि तुम हो! लेखक:- रुद्र त्रिपाठी सम्पर्क सूत्र:- 9453789608

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