fbpx

प्रस्तावना : विभाजिन कालीन भारत की साक्षी

उतरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्ष तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्तति:
।।

विष्णु पुराण में ऐसा जिस भारतमाता का वर्णन पढ़ने को मिलता है, 14 अगस्त 1947 को उसी भारतमाता का दु:खद विभाजन हुआ। विभाजन के बीज तो बहुत पुर्व में ही बोये जा चुके थे। मुस्लिम लीग और उसके कार्यकर्ताओं का यह मत था कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग राष्ट्र हैं, इसलिये मुसलमानों को यह अलह राष्ट्र मिलना चाहिए। तो दूसरी ओर कांग्रेस का ढुलमुल रवैय्या था। जब एक और पाकिस्तान की माँग करने वाले ‘डायरेक्ट एक्शन’ पर कर हिन्दुओं का कत्लेआम करके भी अपनी मांग मनवाने पर आमादा थे तो दूसरी ओर हिन्दू समाज कांग्रेस नेतृत्व के आश्वासनों तथा महात्मा गाँधी जी के इस कथन कि ‘देश का विभाजन मेरी लाश पर ही होगा’ पर विश्वास कर मूढता की चादर ओढ़े सो रहा था।
1909 के मार्ले मिंटो सुधारों में मुसलमानों को पृथक निर्वाचान क्षेत्र का जो क्रम प्रारंभ हुआ वह क्रमश: 1919 के माण्टेग्यु-चैम्सफोर्ड सुधार तथा 1935 के माण्टेग्यु-चुम्सफोर्ड से होता हुआ 1947 में अंतत: भारत विभाजन के साथ ही समाप्त हुआ। और भारत के विभाजन के साथ ही शुरु हुआ विस्थापन का वह दौर, जिसे विश्व की भीषण त्रासदी कहा जा सकता है।
विस्थापन की एक छोटी सी झकल तो हमें कोरोना काल (अप्रैल-मई 2020) में भी दिखाई दी थी। किन्तु इस विस्थापन में न तो किसी के साथ कोई लूट-पाट हुई और नही ही किसी की हत्या। इस विस्थापन में विस्थापितों के साथ सम्पूर्ण समाज व सरकार की सहानुभूति थी तथा उन्हें सभी प्रकार का सहयोग भी मिला। इसके विपरित, भारत विभाजन के समय हुए विस्थापन की त्रासदी अत्यन्त भयावह थी।
उस विस्थापन में उन्हें न केवल अपनी सम्पति से ही हाथ धोना पड़ा, वरन् उन्हें अपने परिवारजनों की जघन्य हत्या के भीषण दृश्य भी देखने पड़े। परिवार की महिलाओं का शीलभंग होते हुए देखना पड़ा। एक समय के प्रतिष्ठित सम्पनन परिवार अब अपमानित औक कंगाली का जीवन देखने जीने के लिए अभिशप्त हो गये थे।
क्या1947 में भारत विभाजन के साथ भारत में विभाजनकारी मानसिकता समाप्त हो गई है? दुर्भाग्य से ऐसा दृष्टिगोचर तो नही होगा। क्योंकि 15 अगस्त 1947 के पस्चात भी यह साम्प्रदायिक अलगाववाद समाप्त नही हुआ है। 1948 में कश्मीर पर कबाइलियों के वेष में आक्रमण हो या पिर 1967 व 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध या फिर कारगिल की लड़ाई। दुर्भाग्य से भारत में रहने वाले मुस्लिम समाज के एक वर्ग में आज भी यह भाव बना हुआ है तथा देश का संविदान. यहाँ की संस्कृति और इस देश की उन्नति के लिए आवस्य कर्तव्यों की तुलना में यह वर्ग सदैव ही अपन अधिकारों तथा मजहबी कर्तव्यों को वरीयता देता है। कोरोना कालखण्ड का व्यवहार इसका साक्षी है। सबसे विचित्र बात यह है कि एक ओर ‘पैन इस्लामिज्म’ या दुनिया को इस्लाम के झण्डे के नीचे लाने का सपना यह राष्ट्रहित की सीमा लांघता हुआ अनेक बार प्रतित होता है, वही दूसरी ओर इस्लामिक देश भी आपस में परस्पर हिंतो के कारण संघर्षरत दृष्टिगोचर हो रहे है।
भारत में उपासना का स्वातंत्र्य आदिकाल से रहा है। सभी में ईश्वर का अंश है तथा किसी भी मार्ग से ईश्वर की आराधना की जा सकती है, यह भारत में स्वीकार किया गया है। इतना ही नहीं ‘ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है’, यह मानने वाले चावार्क दर्शन का भा अस्तित्व भारत रहा है। परन्तु ‘हमारा मार्ग ही ठीक है तथा तुम्हें भी उसी मार्ग पर ले जाना, हमारा दायित्व है, इस विषय को भारत में कभी भी स्वीकृति नही मिली। किसी भी सभ्य समाज में इसे स्वीकृति नहीं मिल है तथा मिलनी भी नही चाहिये।
विभाजन की तिथी 14 अगस्त 1947 के पास आते-आते प्रस्तावित विभाजन में हिन्दुओं(सिख व जैन इसी में समाविष्ट है) पर जो अमानुषिक अत्याचार हुए वे अवर्णीनीय तथा अकथनीय हैं। दीर्घावधि से जो पड़ोसी रहा हो, कर्मचारी के रूप में अपने याहाँ काम कर रहा हो, साझेदारी में व्यवसाय कर रहा हो, आर्थिक लेन-देने चला रहा हो, एकाएक वही लुटेरा बन जाएगा तथा प्राण व प्रतिष्ठा के लिए घातक बन जाएगा; ऐसा तो किसी ने सोचा भी नहीं था। सबसे दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति उन माता-बहनों की थी, जिन्हें केवल भोगवस्तु माना गया तथा उन पर अमानुषिक अत्याचार किए गए। ‘स्वतंत्रता’ ऐसे विस्थापितों के लिए एक डरावना सपना ही नही था, वह डरावनी हकीकत थी।
ऐसा नही था कि इन बातों की कल्पना समाज में किसी को भी नहीं थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिन्दू महासभा तथा आर्य समाज जैसे संगठन इस बारे में हिन्दू समाज को जाग्रत कर रहे थे। परन्तु एक तो उनके कार्य का विस्तार कम था तथा दुसरे, उस समय लोगों का कांग्रेस नेतृत्व पर विश्वास भी अधिक था। सपनों की दुनिया में खोए रहने का परिणाम शीघ्र ही सम्पूर्ण हिन्दू समाज को भारत विबाजन तथा उसके परिणाम स्वरूप हुए विस्थापन के रूप में देखना पड़ा। गत सदी का यह विस्थापन विश्व की ऐसी भीषण आपदा थी, जिसे कोई भी समाज पुन: भुगतना नही चाहेगा। परन्तु भारत में स्वतंत्रता के पश्चात् विभाजन की इस त्रासदी को भूलाने का योजनाबद्ध प्रयास किया गया और परिणाम स्वरूप हमारी वर्तमान पीढ़ी इस त्रासदी को लगभग भूल चुकी है।
इतिहास को भूलाने का परिणाम समाज को अवश्य ही भूगतना पड़ता है। अत: समाज के सुधिजनों का यह दायित्व है कि इस तथात्मक इतिहास तो समाज के समक्ष प्रस्तुत करें। संघ के वरिष्ठ प्रचारक स्व. ठाकुर रामसिंह जी के आग्रह से यह दुरूह कार्य, इस ग्रन्थ के लेखक श्री कृष्णानंद सागर जी ने स्वीकार किया तथा विभाजिन की विभिषिका के भुक्तभोगियों से प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर इस ग्रन्थ की रचना की है।
चार खण्डों में प्रकाशित हो रहे इस ग्रन्थ में विभाजनकालीन भारत की परिस्थितियों का जो सटीक वर्णन पढ़ने को मिला है, वही हमारे दृश्य तथा मस्तिष्क दोनों को ही झकझोर कर रख देता है।
भारत विभाजन की त्रासदी व उसके परिणाम स्वरूप उत्पन्न हुए विस्थापन की भीषण आपदा पर रचित यह ग्रन्थ हम सभी को यह बताने में सक्षम है कि भविष्य में किसी भी कीमत पर इस प्रकार की दुर्घटना को हम पुन: कभी भी नही होने दे।
विश्वास है कि यह ग्रन्थ सुधी पाठकों को अंतर्मन में झाँकने की प्रेरणा देगा।
(श्रीराम आरावकर)
अखिल भारतीय महामंत्री
विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान।

Please follow and like us:
%d bloggers like this: