राजनीतिक समाज सेवा या शुद्ध व्यवसाय ? एडीआर की रिपोर्ट

समाज जागरण

चुनाव से पहले की भगदड़ शुरू है। कोई इधर चला कोई उधर चला। मौका परस्त चापलूस धोखापरस्त नेता पार्टी बदल रहे है। 5 साल सत्ता भोगने बाद अब उनका दम घुंटने लगा है जब आचार संहिता लागू हो चुका है। यह खामी हमारे देश के चुनाव व्यवस्था और जनता मे है। जिसके पास इस दमघोंटू बीमारी के लिए कोई कारगर ईलाज नही है। जात-पात कोे खत्म करने वाली राजनीति और दलबदलू पार्टी के नेताओं आखिर एक बार फिर से जाति गेम खेलने में लगे है। कारण यह भी हो सकते है कि कुछ नेताओं के नाम सीएजी रिपोर्ट जांच में भी सामने आ सकते है। चुनाव के आखिरी समय में आये सीएजी रिपोर्ट से भी लोगों में काफी घबराहट है। जिनके खिलाफ इस कार्यकाल में कार्यवाही नही हो पाया या दबाब के कारण फाइले दबी रही। आशंका है कि अगर योगी सत्ता में लौटा तो उनका हाल भी मुख्तार अंसारी जैसा न हो जाय। निश्चित तौर पर उत्तर प्रदेश के राजनीतिक में कई बार देखा गया कि लगातार योगी के अक्रामकता को कम करने की कोशिश की गयी। कई बार नेता जी साफ सूथरे भी हो तो उनके करीबी राजनीतिक का फायदा उठाकर लाभ कमाते है। बिल्डर लाॅबी उसका एक उदाहरण है। योगी ऐसे लोगों पर कार्यवाही करना चाहते थे, लेकिन कुछ राजनीतिक चंदे की मजबूरी और कुछ राजनीतिक सांठ गांठ के कारण कई बार योगी को भी घुटने टेकने पड़े। यही कारण है कि दल-बदलू एक बार फिर से योगी को आंख दिखा रहे है।

क्या चुनाव आयोग के पास में कोई दल-बदल कानून है

किसी विधायक का किसी दल के टिकट पर निर्वाचित होकर उसे छोड़ देना और अन्य किसी दल में शामिल हो जाना। मौलिक सिध्दान्तों पर विधायक का अपनी पार्टी की नीति के विरुध्द योगदान करना। परन्तु पार्टी से निष्कासित किए जाने पर यह नियम लागू नहीं होगा। सवाल उठता है कि 5 साल तक पार्टी में रहकर मंत्री पद पर बने रहना और अचानक से ये कहना कि मेरा दम घुंट रहा है। क्या दल बदल कानून ऐसा नही हो सकता है कि जो नेता पार्टी छोड़े उसे 6 साल तक किसी भी पार्टी का सदस्यता लेने का अधिकार न हो और नही तो निर्दलीय चुनाव लड़ सके।

आज राजनीतिक कोई समाजसेवा नही बल्कि एक व्यवसाय है, जिसमें लाखो लगाओ और करोड़ों कमाओं की स्थिति है। लेकिन प्रदेश में योगी सरकार आने के बाद स्वयं उनके विधायक जी जो पिछले चुनाव में पैसे खर्चे किये थे उनका मूलधन भी नही निकाल पाये कमाई की बात तो छोड़िये। आने वाले समय में यह बात भी अवश्य आपको पता चलेंगे। क्योंकि पुलिस और मिडिया काफी हद तक स्वतंत्र होकर काम किया है।

क्या नेता समाजसेवी होते है ?

जनता इस बार नेताओं से सवाल पूछ रही है क्या आप समाजसेवी है ? क्या आप समाजिक कार्यकर्ता है ? क्या आप समाज के लिए जीने वाले अमुख व्यक्ति है ? अगर ऐसा ही है तो चुनाव से पहले ये भगदड़ क्यो है ? जनता जानना चाहता है कि आखिर वेतन भत्ता और थाने चौकी को बेचकर करोड़ रुपये कमाने वाले नेता समाजसेवा के किस सिद्धान्त को अपनाते है ?

यूपी पुलिस को पहली बार फ्रिं हैंड किया गया ?

अक्सर पुलिस और थाने बिकने की खेल के साथ साथ पुलिस की राजनीतिकरण होने के पुलिस को बंधुआ मजदूर बनाकर रखा जाता था। पुलिस सत्ताधारी पार्टी के नुक्कड़ छाप नेता के गुलाम हुआ करती थी। लेकिन यूपी में पहली बार बीजेपी के नेताओं को शिकायत करते सुना गया कि पुलिस तो हमारे भी नही सुनती है। पहली बार यूपी मे कानून का राज देखा गया और मुख्तार अंसारी और अतिक अहमद जैसे दानव को जेल भेजा गया उनके संपति को सरकारी कब्जे में लिया गया। पहली बार नेताओं के कारण पुलिस को कम नुकसान उठाना पड़ा है। पुलिस पर भेदभाव का आरोप लगना तो एक आम बात है लेकिन अनुपात में लगातार कमी देखी गयी है। इसका एक ही कारण था कि प्रदेश के मुखिया ने सभी विधायकों को साफ-साफ निर्देश दिया था कि पुलिस के कार्यों में कोई हस्तक्षेप नही किया जायेगा। पुलिस में कमी रही है क्योंकि लगातार 20 सालों से जो पुलिस रिश्वतखोरी और शराब में डुबी रहती थी उनमे रातों रात बदलाव तो संभव नही है, लेकिन काफी हद तक बदलाव देखा गया है।

राजनीतिक दलों की बात करे तो —

भारत में अभी तक 2858 राजनीतिक दल पंजीकृत थे जिनमे से 97.83 प्रतिशत अमान्य है जो कि 2796 पार्टी है। यानि कि सिर्फ 62 राजनीतिक दल की मान्यता है। 2796 दल ऐसे है जिन्होने कभी चुनाव नही लड़ा हो, अगर चुनाव लड़ा भी है तो वोट प्रतिशत हासिल नही किया। इन्होंने राजनीतिक चंदे की आडिट रिपोर्ट जमा नही किया है। लेकिन चुनाव आते है हजारों के संख्या में पार्टियाँ और नेता खड़े हो जाते है। एक एक सीट पर 500 से अधिक उम्मीदवार।

राजनीतिक दलो के गिरते मानदंड और बढते संख्या

आज राजनीतिक में कोई मानदंड नही बचा है। हर कोई किसी न किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़कर आय में वृद्धि करना चाहता है। लगातार बढते राजनीतिक दलों की संख्या इसको समझने के लिए काफी है। एडीआर के रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10 वर्षों में राजनीतिक पार्टियों कि संख्या लगभग दोगुनी हो चली है। लेकिन इसमे से ज्यादा रजिस्ट्रेशन तो करवा लेते है लेकिन चुनाव नही लड़ते या फिर लड़ते भी है तो वोट प्रतिशत या सीट हासिल नही कर पाते है। लेकिन सरकारी दफ्तर और पुलिस पर दबाब बनाने की पुरजोर कोशिश करके, राजनीतिक चंदा वसूलते है और अपने आय के श्रोतो में वृद्धि करते है।

साल 2010 में पार्टियों कि संख्या 1112 थी जो कि साल 2019 में बढ़कर 2301 हो गयी। वर्तमान समय में इसकी संख्या 2858 तक पहुँच चुकी है। नियम के अनुसार सभी राजनीतिक पार्टियों को अपना आडिट रिपोर्ट जमा करना जरूरी है लेकिन कुछ ही पार्टी इनमें दिलचस्पी लेते है। साल 2019-20 के लिए कुछ 2796 गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों में से सिर्फ 230 नें ही अपना आडिट रिपोर्ट सार्वजनिक किया है।

पांच राज्यों में चुनाव और राजनीतिक स्थिति

पांच राज्यों में चुनाव होने वाले है, जिसमें 889 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है। जिसमें से केवल 90 दलों नें 10.12 प्रतिशत नें ही अपना आडिट रिपोर्ट सार्वजनिक किया जो सीईओ के वेवसाइट पर उपलब्ध है। उत्तर प्रदेश और पंजाब के 36 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दलों को 32.56 करोड़ रुपये 1965 चंदे से प्राप्त हुए है। उत्तर प्रदेश में 32 दलो ने कुल मिलाकर 1938 दानों से 32 करोड़ रुपये जमा किए है।

उत्तर प्रदेश के वर्तमान 396 विधायक में से 45(12 प्रतिशत) विधायक ऐसे है जिन पर माननीय न्यायालय नें आरपी अधिनियम 1951 की धार 8(1) (2) और (3) के तहत आने वाले अपराधों के तहत आरोप तय किए गए है। दलों में बीजेपी के सबसे अधिक विधायक 32 है। सपा के 5 बीएसपी और अपना दल के 3 विधायक है।

अगली कड़ी में 5 राज्यों में विधायकों के अपराधिक रिकार्ड और 5 साल में धन की वृद्धि पर एक खास रिपोर्ट पेश करेंगे।

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