सम्राट मिहिर भोज को लेकर क्यों छिड़ी बहस

सम्राट मिहिर भोज , जिसके नाम सुनते ही मुगलों और अरबी जाहिलों के पेशाब निकल जाया करता था। आज उस हिंदू सम्राट मिहिर भोज नें जाति पर क्यों बहस छिड़ी है। एक तरफ जहाँ गुर्जर समाज उन्हे अपने जाति के मानते है वही दूसरी तरफ क्षत्रीय महासभा नें सम्राट के मिहिर क्षत्रीय बताया है और उनके नाम से पहले गुर्जर लगाने को लेकर विरोध किया। मध्य प्रदेश से शुरु हुए यह बहस आने वाले दिनों में और भी बढ़ सकते है, क्योंकि आगामी 22 सितंबर को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के सम्राट मिहिर भोज के प्रतिमा का अनावरण करेंगें। कार्यक्रम का आयोजन गुर्जर समाज के द्वारा किया जा रहा है। इसी बीच मे अब प्रदेश सरकार के सामने नया मोड़ आ गया है। क्योंकि अगले साल 2022 में चुनाव है और पहली नजर में देखे तो एक वोट बैंक को साधने की तैयारी के नजर से भी देखा जा रहा है। उधर दूसरी तरफ अखिल भारतीय क्षत्रीय महासभा नें योगी सरकार को चेतावनी दे रही है। उनका कहना है कि सम्राट को सिर्फ हिंदू सम्राट मिहिर भोज के नाम से प्रतिमा का अनावरण किया जाय। उनको किसी जाति विशेष से जोड़ना ठीक नही होगा। सम्राट मिहिर भोज क्षत्रीय समाज के थे और उनको गुजर्राधिपति का उपाधि दिया गया था। उस समय मे बहुत सारे क्षेत्र गुर्जर बहुल थे इसलिए उनकों गुर्जरों का राजा भी कहा जाता है।

गुगल विकिपिडिया के अनुसार

मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक 49 साल तक राज किया। मिहिरभोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक और कश्मीर से कर्नाटक तक फैला हुआ था। ये धर्म रक्षक सम्राट शिव के परम भक्त थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। ५० वर्ष तक राज्य करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे। अरब यात्री सुलेमान ने भारत भ्रमण के दौरान लिखी पुस्तक सिलसिलीउत तवारीख 851 ईस्वीं में सम्राट मिहिरभोज को इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु बताया है, साथ ही मिहिरभोज की महान सेना की तारीफ भी की है, साथ ही मिहिर भोज के राज्य की सीमाएं दक्षिण में राजकूटों के राज्य, पूर्व में बंगाल के पाल शासक और पश्चिम में मुलतान के शासकों की सीमाओं को छूती हुई बतायी है। प्रतिहार यानी रक्षक या द्वारपाल से है।

सैन्य वृत्ति
915 ईस्वीं में भारत आए बगदाद के इतिहासकार अल-मसूदी ने अपनी किताब मरूजुल जुहाब मेें भी मिहिर भोज की 36 लाख सेनिको की पराक्रमी सेना के बारे में लिखा है। इनकी राजशाही का निशान “वराह” था और मुस्लिम आक्रमणकारियों के मन में इतनी भय थी कि वे वराह यानि सूअर से नफरत करते थे। मिहिर भोज की सेना में सभी वर्ग एवं जातियों के लोगो ने राष्ट्र की रक्षा के लिए हथियार उठाये और इस्लामिक आक्रान्ताओं से लड़ाईयाँ लड़ी। मुस्लिम आक्रमणकारी मिहिर भोज के केवल नाम लेने मात्र से थर-थर कांपा करते थे |

मिहिर भोज के मित्र काबुल का ललिया शाही राजा कश्मीर का उत्पल वंशी राजा अवन्ति वर्मन तथा नैपाल का राजा राघवदेव और आसाम के राजा थे। सम्राट मिहिरभोज के उस समय शत्रु, पालवंशी राजा देवपाल, दक्षिण का राष्ट्र कटू महाराज आमोधवर्ष और अरब के खलीफा मौतसिम वासिक, मुत्वक्कल, मुन्तशिर, मौतमिदादी थे। अरब के खलीफा ने इमरान बिन मूसा को सिन्ध के उस इलाके पर शासक नियुक्त किया था। जिस पर अरबों का अधिकार रह गया था। सम्राट मिहिर भोज ने बंगाल के राजा देवपाल के पुत्र नारायणलाल को युद्ध में परास्त करके उत्तरी बंगाल को अपने क्षत्रिय साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया था। दक्षिण के राष्ट्र कूट राजा अमोधवर्ष को पराजित करके उनके क्षेत्र अपने साम्राज्य में मिला लिये थे। सिन्ध के अरब शासक इमरान बिन मूसा को पूरी तरह पराजित करके समस्त सिन्ध प्रतिहार साम्राज्य का अभिन्न अंग बना लिया था। केवल मंसूरा और मुलतान दो स्थान अरबों के पास सिन्ध में इसलिए रह गए थे कि अरबों ने क्षत्रिय सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार गुर्जर के तूफानी भयंकर आक्रमणों से बचने के लिए अनमहफूज नामक गुफाए बनवाई हुई थी जिनमें छिप कर अरब अपनी जान बचाते थे।

सम्राट मिहिर भोज नही चाहते थे कि अरब इन दो स्थानों पर भी सुरक्षित रहें और आगे संकट का कारण बने, इसलिए उसने कई बड़े सैनिक अभियान भेज कर इमरान बिन मूसा के अनमहफूज नामक जगह को जीत कर अपने प्रतिहार साम्राज्य की पश्चिमी सीमाएं सिन्ध नदी से सैंकड़ों मील पश्चिम तक पहुंचा दी, और इसी प्रकार भारत को अगली शताब्दियों तक अरबों के बर्बर, धर्मान्ध तथा अत्याचारी आक्रमणों से सुरक्षित कर दिया था। इस तरह सम्राट मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं काबुल से राँची व असम तक, हिमालय से नर्मदा नदी व आन्ध्र तक, काठियावाड़ से बंगाल तक, सुदृढ़ तथा सुरक्षित थी

हिंदू सम्राट मिहिर भोज की गौरवशाली दास्तान, इस्लामी आक्रांताओं को नहीं रखने दिया भारत में कदम ZEE NEWS MAY 12 2020

भारत भूमि के हिंदू वीरों ने सदियों तक इस पवित्र धरती पर अरब और तुर्क के इस्लामी लुटेरों का निशान तक नहीं पड़ने दिया. इस कड़ी में महान सनातनी सम्राट मिहिर भोज का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है. 36 लाख की सेना के डर से तुर्क और अरब भारत की तरफ मुंह करने से भी डरते थे. लेकिन उनकी गौरव गाथा को दूषित मनोवृत्ति के इतिहासकारों ने छिपाने का कुत्सित प्रयास किया.
कन्नौज के सम्राट मिहिर भोज भगवान शिव के अनन्य भक्त थे. उन्होंने 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक 49 साल के लंबे समय तक शासन किया. उनका साम्राज्य आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल में गुर्जरपुर तक और कश्मीर से कर्नाटक तक फैला हुआ था था. सम्राट मिहिर भोज के साम्राज्य को तब गुर्जर देश के नाम से जाना जाता था.

कई बार दुश्मनों के दांत खट्टे किए सम्राट मिहिर भोज ने
मिहिर भोज उस दौर में राजा बने, जब इस्लामी कट्टरपंथी अक्सर भारत की धरती पर कब्जा करने के इरादे से हमले करते थे. ऐसे हमलावरों से निपटने के लिए सम्राट मिहिरभोज ने भी अपनी सेना को बेहद मजबूत और विशाल बना लिया था. उनके साम्राज्य की सीमाएं आधुनिक भारत के राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, ओडिशा, गुजरात, हिमाचल तक फैली थी. मिहिरभोज के विशाल साम्राज्य की राजधानी कन्नौज में थी.

मिहिर भोज के सक्षम शासन तले एक ऐसा साम्राज्य स्थापित हुआ, जहां प्रजा खुश थी, अत्याचारियों को दण्डित किया जाता था. व्यापार और कृषि को खूब बढ़ावा दिया जा रहा था. राजधानी कन्नौज में 7 किले और दस हजार मंदिर थे. सारा साम्राज्य धन, वैभव से संपन्न था. उनके राज्य में व्यापार सोने और चांदी के सिक्कों से होता था.

दुश्मन के इतिहासकारों ने भी की है मिहिर भोज की तारीफ
अरब के हमलावर मिहिरभोज के साम्राज्य पर विजय चाहते थे, लेकिन सम्राट मिहिरभोज ने अरब तुर्क मुस्लिम आक्रमणकारियों को भारत की धरती पर कभी पांव रखने नहीं दिया. दुश्मन सेनाएं सम्राट मिहिर भोज से खौफ खाती थीं. उस दौर के अरब यात्री सुलेमान ने अपनी पुस्तक सिलसिला-उत-तारिका में लिखा कि सम्राट मिहिरभोज के पास उंटों, घोड़ों और हाथियों की बड़ी विशाल और सर्वश्रेष्ठ सेना है. उनके राज्य में व्यापार सोने और चांदी के सिक्कों से होता है. इनके राज्य में चोरों डाकुओं का भय नहीं होता था.

मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं दक्षिण के राष्ट्रकूटों के राज्य, पूर्व में बंगाल के शासक पालवंश और पश्चिम में मुल्तान के मुस्लिम शासकों से मिली हुई है. 915 ईस्वी में भारत भ्रमण पर आये बगदाद के इतिहासकार अल मसूदी ने भी अपनी किताब मिराजुल-जहाब में लिखा कि सम्राट मिहिरभोज के पास महाशक्तिशाली, महापराक्रमी सेना है. इस सेना की संख्या चारों दिशाओं में लाखो में बताई गई है.

मिहिर भोज की गाथाओं से भरे हैं सनातन ग्रंथ
भले ही वामपंथी इतिहासकारों ने मिहिर भोज के इतिहास को काट देने की साजिश की. लेकिन स्कंद पुराण के प्रभास खंड में भी सम्राट मिहिरभोज की वीरता, शौर्य और पराक्रम के बारे में विस्तार से वर्णन है. मिहिरभोज बचपन से ही वीर बहादुर माने जाते थे. उनका जन्म विक्रम संवत 873 को हुआ था. सम्राट मिहिरभोज की पत्नी का नाम चंद्रभट्टारिका देवी था. जो भाटी राजपूत वंश की थी. मिहिरभोज की वीरता के किस्से पूरी दुनिया मे मशहूर हुए. कश्मीर के राज्य कवि कल्हण ने अपनी पुस्तक राज तरंगिणी में सम्राट मिहिरभोज का उल्लेख किया है.

ये थे मिहिर भोज के मित्र और शत्रु
काबुल का ललिया शाही राजा, कश्मीर का उत्पल वंशी राजा अवन्ति वर्मन, नेपाल का राजा राघवदेव और आसाम के राजा, सम्राट मिहिरभोज के मित्र थे. वहीं दूसरी तरफ पालवंशी राजा देवपाल, दक्षिण का राष्ट्र कटू महाराज अमोघवर्ष और अरब के खलीफा मौतसिम वासिक, मुत्वक्कल, मुन्तशिर, मौतमिदादी सम्राट मिहिरभोज के सबसे बड़े शत्रु थे.

सम्राट मिहिरभोज ने राज्य की रक्षा और विस्तार के लिए कई युद्ध लड़े. उन्होंने बंगाल के राजा देवपाल के पुत्र नारायणलाल को युद्ध में परास्त करके उत्तरी बंगाल को अपने साम्राज्य में शामिल कर लिया था. दक्षिण के राष्ट्र कूट राजा अमोघवर्ष को पराजित करके उनके क्षेत्र पर विजय प्राप्त की. सिन्ध के अरब शासक इमरान बिन मूसा को पराजित करके सिन्ध को अपने साम्राज्य का अभिन्न अंग बनाया. इस तरह सम्राट मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं काबुल से रांची और आसाम तक, हिमालय से नर्मदा नदी और आन्ध्र तक, काठियावाड़ से बंगाल तक, सुदृढ़ और सुरक्षित थी.

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार मिहिरभोज की एक सेना कनकपाल परमार गुर्जर के नेतृत्व में गढ़वाल नेपाल के राघवदेव की तिब्बत के आक्रमणों से रक्षा करती थी. इसी प्रकार एक सेना अल्कान देव के नेतृत्व में पंजाब के गुर्जराज नगर के समीप नियुक्त थी जो काबुल के ललियाशाही राजाओं को तुर्किस्तान की तरफ से होने वाले आक्रमणों से रक्षा करती थी. इसकी पश्चिम की सेना मुलतान के मुसलमान शासक पर नियंत्रण करती थी.

महादेव के अनन्य भक्त थे मिहिर भोज
सम्राट मिहिर भोज मूल रूप से शैव थे. वह उज्जैन में स्थापित भगवान महाकाल के अनन्य भक्त थे. उनकी सेना जय महादेव जय विष्णु, जय महाकाल की ललकार के साथ रणक्षेत्र में दुश्मन का खात्मा कर देती थी. कभी रणक्षेत्र में भिनमाल, कभी हकड़ा नदी का किनारा, कभी भड़ौच और वल्लभी नगर तक अरब हमलावरों के साथ युद्ध होता रहता. मिहिर भोज की एक उपाधि ‘आदिवराह’ भी थी. उनके समय के सोने के सिक्कों पर वराह की आकृतियां उकेरी गई थी.

मिहिरभोज के समय अरब के हमलावरों ने भारत में अपनी शक्ति बढ़ाने की कई नाकाम कोशिश की. लेकिन वह विफल रहे. साहस, शौर्य, पराक्रम वीरता और संस्कृति के रक्षक सम्राट मिहिर भोज जीवन के अंतिम वर्षों में अपने बेटे महेंद्रपाल को राज सिंहासन सौंपकर सन्यास ले लिया था. मिहिरभोज का स्वर्गवास 888 ईस्वी को 72 वर्ष की आयु में हुआ था. भारत के इतिहास में मिहिरभोज का नाम सनातन धर्म और राष्ट्र रक्षक के रूप में दर्ज है.

अंत में सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि क्या फर्क पड़ता है कि सम्राट गुर्जर थे या फिर राजपूत। जिस सम्राट का इतना बड़ा इतिहास रहा हो वह तो सबका होना चाहिए। क्या ऐसा नही लगता है कि इस विरोध से हम आपस में ही लड़ने की तैयारी कर रहे है जबकि आज जरुरत है हमे एक और सम्राट मिहिर भोज की।

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