शहर में सन्नाटा क्यों है ? क्या होली के रंग में अल्कोहल की तड़का लगा है ?

समाज जागरण नोएडा

हर रोज ट्रेफिक से जाम रहने वाली सड़क पर आज सन्नाटा क्यों है ? इक्का दुक्का गाड़ी और ई-रिक्शा को छोड़ पूरे शहर में ऐसा लगा जैसा कि कोरोना काल के समय में लाॅकडाउन लगा हो। जगह जगह पर पुलिसकर्मी मुस्तैद दिखायी दिेए अपनी जिम्मेदारी को निभातेे हुए। हालांकि मोहल्ले में काफी हलचल है। लोग एक दूसरे को रंग गुलाल लगा रहे थे। छत से पानियों की बौछारे हो रही थी। बच्चे और बड़े घुम रहे थे फटे कपड़े में। एक मोटरसाइकिल पर 5-5 सवारी बिठाए युवा रंग से सराबोर यहाँ से वहाँ करते हुए। गलियों में रंग खेलते बच्चे और महिलाओं की टोलियाँ। एक ही शहर के दो भिन्न रूप देखकर बड़ा अजीब लगा।

होली रंग के त्योहार है और इस बार रंग भी प्राकृतिक है। लेकिन मै बहुत सोचा कि होली अगर रंग और प्यार मोहब्बत की त्योहार है तो शहर में सन्नाटा क्यों है और जगह जगह पुलिस की गाड़ी क्यों खड़ी है। बहुत ध्यान से दीमाग को दौराने पर ध्यान आया कि इस रंग में लोगों नें एक रंग और मिला लिया है वो है मंदिरा। सारे अपराध के जड़ है। क्योंकि पीने के बाद तो वो अपने शहर नही तो कम से कम गली का राजा जरूर है। पीने के बाद होने वाले अभद्रता और अश्लीलता, छेड़खानी को आखिर कौन भूल सकता है। यही कारण है कि महिलाएँ आज सड़क पर नही निकलती है।

इन सबका जिम्मेदार है सरकार

फिर मै सोचा आखिर इस सन्नाटे का जिम्मेदार कौन है समाज या सरकार ? सन्नाटे के लिए मै सबसे पहले समाज को जिम्मेदार मानता हूँ क्योंकि समाज ने एक ऐसा सरकार बनाया है जो शराब बेचकर अर्थव्यवस्था चला रही है। समाज सेवा के नाम पर एक ऐसा नेता देश और समाज को दिया है जो अपने परिवार के लिए समाज को बलि देने को तैयार हो जाते है। शराब भी उसका एक उदाहरण है। 90 प्रतिशत से ज्यादा हत्या बलात्कार, छेड़खानी करने वाले व्यक्ति ज्यादा शराब सेवन करने वाले होते है या फिर अधिक मांसहारी। इन सबको जानने के बाद भी सरकार को अपनी रेवेन्यू के लिए मांस और शराब दोनों बेचना पड़ता है। सरकार सबसे बड़ा ड्रग्स माफिया है जो लाइसेंस देती है समाज में नशा फैलाने और नशा बेचने के लिए।
निश्चित तौर पर जरूरी है शराब बेचना क्योंकि इससे सरकार को सिर्फ टैक्स नही बल्कि नेताओं को चुनाव लड़ने के लिए मोटी चंदा भी मिलते हैै। ज्यादातर शराब के कारखाने और मांस के स्लोटर हाउस नेताओं के रिस्तेदारों के है। क्या शराब पीने वाले समाज कभी राम राज्य की कल्पना की जा सकती है ? जिस शहर, प्रदेश और देश में मांस खाने की अधिकता हो और हर एक किलोमीटर के बाद मांस की दुकान खोली गयी हो, क्या वह लोग कभी भी राम को स्वीकार कर सकते है ?

सबसे बड़ा उदाहरण दिल्ली है देश की राजधानी जहाँ पर शराब एक पर एक फ्रि है। वही बीजेपी जो केन्द्र में है और नगर निगम में भी है वह इसका विरोध करते हुए अपने राजनीतिक हित साधने की कोशिश करते है। केन्द्र चाहे को पूरे देश को शराब मुक्त कर सकता है और राज्य चाहे तो राज्य को। सवाल उठाता है कि आखिर हरियाणा से देश भर में शराब कि सप्लाइ क्यों? उत्तर प्रदेश के योगी सरकार शराब पर पूर्ण प्रतिबंध क्यों नही लगा रही है? उत्तर प्रदेश के आयोध्या और मथूरा वृंदावन में शराब की दुकान और मांस की दुकान क्यों है ?

शराब के दंश महिलाओं को झेलनी पड़ती है।

शराब के सबसे ज्यादा दंश महिलाओं को झेलनी पड़ती है, उन बेटियों को झेलनी पड़ती है जिसे मोदी सरकार बेटी पढाओं बेटी बढाओं के नारा दे रही है। लाॅक डाउन के बाद खुले शराब के दुकान और फिर जो शुरु हुआ घर में चिख पुकार उसे कौन भूल सकता है। क्योंकि सरकार को तो रेवेन्यू चाहिए था इसलिए सबसे पहले शराब के दुकान खोल दिया। महीनों से घर में बेरोजगार बैठे लोगों को अचानक ही शराब की अम्ल जगी और फिर महिलाओं के साथ मार-पीट करना शुरु कर दिया।
बिहार में शराब बंद होने के बाद भी बंद नही है क्योंकि उसके बार्डर क्षेत्र में खुले हुए है। हरियाणा के शराब बस में भरकर यूपी होते हुए बिहार पहुँच जाते है और यूपी पुलिस को भनक तक नही लगती है। दूसरी तरफ नेपाल से तस्करी और तीसरी तरफ बंगाल और उड़ीसा।

आखिर होली के रंग में कब तक मिलते रहेंगे अल्कोहल की तासीर। तब तक सवाल यही उठते रहेंगे आखिर होली के दिन में सन्नाटा क्यो ? आखिर यह रंग सड़क पर क्यो नही है ? उस दिन का इंतजार रहेगा जब शहर के पूरी सड़क होली के रंग से रंगकर शांति का संदेश आने वाले पीढ़ियों को देगा। हमारे देश के कार्पोरेट कल्चर को भी जिम्मेदारी लेनी होगी। क्योंकि वहाँ पर भले ही इंटरव्यू में ये पूछे जाते है कि तुम शराब तो नही पीते हो लेकिन जब भी उनके पार्टी होती है तो सबसे पहले शराब को ही प्राथमिकता दी जाती है।

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