इस्लामिक शरणार्थी गैर इस्लामिक देशों में शरण क्यो ?

दुनिया भर में मुस्लिम के 57 देश है, लेकिन आज जब अफगानिस्तान के मुस्लिमों को सिर छुपाने के लिए जगह चाहिए तो सभी देशों नें मना कर दिया है। खासकर मस्जिद और मदरसों के लिए सबसे ज्यादा फंड देने वाला इस्लामिक देश सऊदी अरब और इस्लाम को मसीहा मानने वाला और खलीफा कहलाने वाला देश टर्की नें तो साफ तौर पर किसी भी शरणार्थी को अन्दर लेने से मना कर दिया है। एक इस्लामिक देश नें तो शरणार्थियों पर गोली चला दिया है। आखिर किस रणनीति के तहत इस्लाम काम कर रहा है यह सोचने की जरूरत है।

अफगानिस्तान में ताजा हालात
अफगानिस्तान में तालिबानी आंतकी गुट का कब्जा हो चुका है। अफगानिस्तान के आखिरी किला पंजशीर में नार्दन एलाईंस और तालिबानी लड़ाके के बीच घमासान चल रहा है। उस अफगानिस्तान के उप राष्ट्रपति अमरूल्ला सालेह अपने 9 हजार लड़ाकों के साथ पंजशीर में तैयार है। इससे पहले सूचना मिली थी कि तालिबानी लड़ाकों को मुंह खानी पड़ी है और सैकड़ों लड़ाके मारे गये है। अफगानिस्तान नें 3 जिले को और कब्जा कर लिया है।

मजहब छोड़ना पसंद नही करते
सबसे पहले मै एक बात कहूँगा कि यहाँ पर एक मजहबी लौजिक समझिये। चाहे रोंहिग्या हो या कोई और इतने देशों से भागने के बाद भी एक भी अपने मजहब को नही छोड़ा। हालांकि दिल्ली दंगे और फिर एनआरसी लागू होने की सूचना के बाद कुछ खबरे आयी थी कि 25-30 रोहिंग्या मुस्लिम नें महजब को छोड़कर रिलिजन को स्वीकार कर लिया है, लेकिन इसका अभी तक कोई अधिकारी जानकारी प्राप्त नही हुई है। मुस्लिम लाख परेशानियों के बाद भी अपने मजहब को छोड़ना पसंद नही किया है। भले ही उसी मुस्लिम नें उसके बहन बेटियों के साथ बर्बरता किया हो। आज अफगानिस्तान की हालात को देखकर यह बात छूपी नही है। अपने घर बार छोड़कर भाग रहे अफगानिस्तान के मुसलमान अपने बीबी बच्चों को भी छोड़कर या तालिबानियों के हवाले करके भाग रहे है। तालिबान के क्रुरता का अंदाजा तो इसी से लगाया जा सकता है कि किस प्रकार से एक अमेरिकी रिपोर्टर को बुर्का पहनना पड़ रहा है रिपोर्टिंग के दौरान।

शऱणार्थियों को भारत और दूसरे गैर इस्लामिक देश पसंद क्यो है ?
आज अफगानिस्तान से हजारों के संख्या में शरणार्थी भाग रहा है। निश्चित तौर पर 99.9% इसमें से मुस्लिम समुदाय के है। अफगानिस्तान के चारों सीमा मुस्लिम देशों से घिरा है, लेकिन वह भागकर भारत और अमेरिका जा रहा है। अफगानिस्तान 6 देशों के सीमा से लगता है। ये सभी देश मुस्लिम देश है। जिसमें पाकिस्तान, ईरान, उजबेकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्केेमेनिस्तान है। छठा चाईना का लगता है। निश्चित तौर पर शरणार्थियों के लिए पाकिस्तान, ईरान और उजबेकिस्तान जैसे देश में शरण लेना आसान है। लेकिन सभी नें बार्डर बंद कर दिए है।

दुनिया भर में तालिब, मदरसे और मस्जिद के लिए सबसे ज्यादा फंडिंग करने वाले देशों में शुमार सउदी अरबिया नें भी किसी भी शरणार्थी को प्रवेश करने पर रोक लगा दी है। जबकि यूएन नें साफ तौर पर मना किया है कि कोई भी देश किसी भी शरणार्थी को मना नही करेगा। एक और खास बात है कि शरणार्थी लोग किसी भी मुस्लिम देश में जाना भी पसंद नही करते है। क्योंकि उनको तो गैर-मुस्लिम देशों में गंदगी फैलाने के लिए कहा गया है।

मुख्य कारण क्या है ?

इसका मुख्य कारण है गैर-इस्लामिक देशों में जाकर उन देशों को कब्जा में लेना। इतनी मजहबी उन्माद होने के बाद भी मजहब नही बदलने वाले लोग दुनिया भर में इसी प्रकार से जाते है और अपना वर्चस्व कायम करते है। उदाहरण के तौर पर न्यूजीलैण्ड को लिजिए। जो कि 14 हजार किलोंमीटर समुन्द्री रास्ते को पार करके पहुँचने का मार्ग है। वहाँ पर तो शरणार्थी पहुँच गया लेकिन हजार किलोमीटर के दूरी और जमीनी रास्ते से अरब नही जा सका। न्यूजीलैण्ड दुनिया के सबसे साथ-सूथरा और शांतिप्रिय देश है लेकिन वहाँ भी शांतिदूतों नें पहुँचकर उनकों जिना मुहाल कर दिया है। आखिर 14 हजार किलोंमीटर तक इनको जाने की व्यवस्था किसने और कैसे किया होगा। जरूर इनको वोट और इंधन उपलब्ध कराया गया होगा।

ताजा उदाहरण आप फ्रांस का ले लिजिए। फ्रांस नें इन लोगों को शरण दिया। जबकि टर्की उसके बराबर में है। टर्की को दुनिया के इस्लामिक देश खलीफा मानते है। भारत में उसी खलीफा को बचाने के लिए खिलाफत आंदोलन किया गया था। उसमें सबसे ज्यादा तादाद भारत में रहने वाले मुसलमानों की है। फ्रांस नें जिन लोगों को शरण दिया आज फ्रांस को उनसे ही दो-दो हाथ करने पड़ रहे है। भारत तो 1400 साल से इस्लामिक आतंक को झेल रहा है। कौन लोग है ये जो भारत के धरती को रक्तरंजित किया है। खुन हत्या, बलात्कार जिसके चरित्र में है उसे कही भी शरण नही मिलनी चाहिए।

क्योंकि किसी भी मुस्लिम देश में उनको शरण चाहिए ही नही। आज ही अमेरिकी दूतावास के बाहर दिल्ली में अफगानियों नें शरणार्थी कार्ड की मांग की है और किसी और देश में उनके लिए व्यवस्था करने के लिए कहा है।
क्या अमेरिका और दूसरा देश उसे पाकिस्तान या किसी ईस्लामिक देश में उनके लिए व्यवस्था करेंगे। आपको जबाब मिलेगा नही, क्योंकि यह लोग किसी भी ईस्लामिक देश में रहना पसंद नही करते है। गैर-ईस्लामिक देश में जाकर वहाँ पर इनको जनसंख्या बढाना है और फिर उसी देश को कब्जा करके वहाँ के लोगों को मार देना है। उनको बच्चों के साथ नरसंहार करना है।

मुस्लिम देश और इनके फिरकों में लगातार हो रहे युद्ध के बावजूद लगातार इनकी बढ़ती जनसंख्या। गैर-इस्लामिक देशों में इनका प्रसार। आज पूरे विश्व को सोचने पर मजबूर कर दिया है। हालांकि यहाँ यह भी कहना होगा कि चाईना, रसिया जैसे देश पहले से ही सतर्क है। आज चाईनिज पाकिस्तान के अंदर जाकर वह सब कर रहा है जो तालिबानी और दूसरे इस्लामिक आतंकी आज तक दूसरे के साथ करते रहे है। अगर मेरा अनुमान सही निकला तो अफगानिस्तान और तालिबान का भी चाईना वही हालत करेगा जो पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति है।

आखिर शांतिदूत है उनके मानसिकता तो आप इस बात से भी अंदाजा लगा सकते है कि एक बंगाली टीचर जो कि विशेष समुदाय का था अफगानिस्ता में फंसा हुआ था। मोदी सरकार नें उसका एयरलिफ्ट किया है। लेकिन जिसका जो डीएनए होता है वह सामने आ ही जाता है। आते ही उसनें तालिबान के पक्ष में कसीदे पढ़ने लगा। हाल ही के कन्वर्टेड शांतिदूत है नाम है तमाल भट्टाचार्य। यानि की अभी तक भट्टाचार्य को लेकर साथ में घुम रहा है। अगर तालिबान इतना ही पसंद था तो जहाज से कुद जाता। लेकिन वैसा उसने नही किया। भारत सरकार को चाहिए कि ऐसे लोगों को फिलहाल तालिबान में ही ड्राप करें।

बता दे कि तालिबान यूएन के द्वारा घोषित आतंकी संगठन है। उसको जो भी समर्थन करता है उसे आतंकी गतिविधियों में लिप्त होने की सजा दी जा सकती है। ऐसे शांतिदूतों की फितरत ऐसी है कि बिना अशांति के शांत होते नही है।

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