भारत-विभाजन का दोषी कौन?

सत्ता हस्तांतरण की वार्ताओं में तीन पक्ष थे—अंग्रेज, मुस्लिम व कांग्रेस। इन वार्ताओं की अन्तम परिणति हुई भारत-विभाजन। इस विभाजन का वास्तविक दोषी कौन?
क्या अंग्रेज?
अंग्रेज तो विदेशी थे। इंगलैंड से आए थे। और यहाँ आकर उन्होंने अपना राज्य स्थापित कर लिया। उनकी निष्ठा व भक्ति इंगलैंड के प्रति थी। भारत को गुलाम बनाकर रखने के कारण ही उनकी तूती सारी दुनिया में बोलती थी। उन दिनों भारत के सिक्कों पर लिखा होता था ‘George V, King of England and Enperor of India’। यानी जार्ज पंचम इंगलैंड का तो केवल ‘राजा’ था, किन्तु भारत का वह सम्राट था। भारत के स्वतन्त्र हो जाने पर उसका ‘सम्राट’ पद भी समाप्त हो जाने वाला था और वह केवल एक छोटा सा ‘राजा’ ही रह जाता; जिसका सीधा अर्थ था विश्व में इंगलैंड की प्रतिष्ठा की समाप्ति। इसलिए कोई भी अंग्रेज भारत से ब्रिटिश सत्ता समाप्त करने के पक्ष में नहीं था।
किन्तु द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी के आक्रमणों से इंगलैंड तहस-नहस हो चुका था। ब्रह्मदेश में आजाद हिन्द फौज ने भी उसको गहरी चोट पहुँचायी थी, और रही-सही कसर युद्ध के बाद भारतीय सेना के विद्रोह ने पूरी कर दी। उस सेना का विद्रोह, जिसके बल पर उसने विश्वयुद्ध जीता था। एक तरफ़ उसका अपना टूटा-फूटा घर (इंगलैंड) और दूसरी ओर भारत में पड़ने वाली सम्भावित मार से डर कर उन्होंने भारत से भाग जाने का निर्णय कर लिया। किन्तु भागते-भागते भी उन्होंने भारत को दुर्बल व शक्तिहीन करने का प्रयास आरम्भ कर दिया, ताकि भविष्य में कहीं शाक्तिशाली भारत इंगलैंड पर ही न चढ़ दौड़े। अथवा इंगलैंड का किसी अन्य तरह का नुकसान न कर पाए। वे अपने प्रयास में सफल हुए और भारत का विभाजन हो गया।
अंग्रेज इंगलैंड के थे। उन्हें भारत से कोई मतलब नहीं था। उन्होंने वह किया, जो इंगलैंड के हित में था। भारत का हित भारत के लोगों ने देखना था, अंग्रेजों ने नहीं। अतः भारत विभाजन के लिए अंग्रेजों को दोष देना आत्म-प्रवंचना है।
मुस्लिम लीग?
मुस्लिम लीग भारत में रहने वाले मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्था थी। वह अपना सम्बन्ध भारत पर आक्रमण करने वाले विदेशी मुस्लिम आक्रान्ताओं के साथ जोड़ती थी। उन्हीं को वह अपना आदर्श मानती थी। उन्हीं के अधूरे सपने को पूरा करना चाहती थी। वह अधूरा सपना था—सम्पूर्ण भारत को इस्लाम के झण्डे के नीचे ले आना और सभी भारतवासियों को, चाहे कैसे भी हो, मुसलमान बनने के लिए बाध्य करना। भारत में फिर से इस्लामी शासन स्थापित हो जाए, यह उसका लक्ष्य था।
किन्तु इस लक्ष्य की प्राप्ति लोकतन्त्रीय तरीके से नहीं हो सकती थी, क्योंकि मुसलमानों की जनसंख्या हिन्दू जनसंख्या की तुलना में बहुत कम थी। इसलिए प्रथम पग के रूप में उसने मुसलमानों के लिए मुस्लिम जनसंख्या के अनुपात से अधिक सीटें केन्द्रीय असेम्बली व प्रान्तीय असेम्बलियों में प्राप्त करन की मांग की और 1933 में कम्युनल अवार्ड के द्वारा उसकी यह मांग पूरी भी हो गई। इस प्रकार कम जनसंख्या होने के बावजूद असेम्बलियों में मुस्लिम सदस्य बढ़ गए अर्थात् मुस्लिम शक्ति बढ़ गई।
अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए मुस्लिम लीग ने अब दूसरा पग उठाया और भारत के अन्दर मुसलमानों के लिए अलग से ‘मुस्लिम होम लैंड’ की माँग कर डाली, जिसे बाद में ‘पाकिस्तान’ नाम दिया गया। इसके लिए वह प्रयत्नशील हुई। ‘मुस्लिम होमलैंड’ में कौन-कौन से क्षेत्र वह चाहती है यह उसने कभी नहीं बताया; क्योंकि वह भारत का अधिक से अधिक क्षेत्र हड़पना चाहती थी। निश्चित क्षेत्र बता देने पर वह वहाँ तक ही सीमित हो जाती।
मुस्लिम लीग अपने उद्देश्य में बिल्कुल स्पष्ट थी कि पूरे भारत को पाकिस्तान बनाना है। इसमें से जितना आसानी से मिल जाए, वह प्राप्त कर लिया जाए, शेष भारत को अन्य तरीकों से बाद प्राप्त करेंगे।
मुस्लिम लीग की योजना सफल हुई। 1947 में भारत का विभाजन हो गया और उसे बहुत आसानी से पाकिस्तान मिल गया। यह उसके व्यापक लक्ष्य का एक हिस्सा था। मील का पत्थर था। इसी को उसने इन शब्दों में प्रकट भी किया—
‘हँस के लिया है पाकिस्तान, लड़ के लेंगे हिन्दुस्थान।‘
भारत को स्वतन्त्र कराना मुस्लिम लीग का कभी लक्ष्य था ही नहीं। वह तो पूरे भारत को हड़प कर यहाँ की सम्यता, संस्कृति व सभी मान बिन्दुओं को नष्ट करके इस्लामी सत्ता स्थापित करना चाहती थी। उसे भी विभाजन एक मजबूरी के रूप में स्वीकार करना पड़ा। क्योंकि वह पूरे भारत को प्राप्त कर ही नहीं सकती थी।
कांग्रेस?
कांग्रेस हिन्दू समाज की प्रतिनिधि संस्था थी। भारत को पूर्णतया स्वतन्त्र करवाने की उसने शपथ ले रखी थी। यह शपथ उसने रावी के तट पर ली थी।
अंग्रेज विदेशी थे, यह कांग्रेस मानती थी। इसीलिए वह भारत से अंग्रेजी सत्ता को हटाना चाहती थी। जिस अर्थ में अंग्रेज विदेशी थे, उसी अर्थ में मुसलमान भी विदेशी थे। अन्तर इतना ही था कि अंग्रेज भारत में लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व आए थे और मुसलमान लगभग तेरह सौ वर्ष पूर्व। अंग्रेज तो यहाँ व्यापार करने आए थे। वे यहाँ शासन करने के लिए नहीं आए थे। किन्तु यहाँ की परिस्थितियों को देख कर उन्हें मौका मिल गया यहाँ के शासन पर कब्जा करने का, और वे यहाँ के शासक बन बैठे। इसके विपरीत मुसलमान तो यहाँ आए ही थे आक्रमणकारी के रूप में, यहाँ की सभ्यता और संस्कृति को नष्ट करने तथा यहाँ के लोगों को जबरदस्ती अपने मत में परिवर्तित करने के लिए। इस दृष्टि से मुसलमान अंग्रेजों से भी अधिक घातक विदेशी थे, कांग्रेस को यह समझना चाहिए था।
कांग्रेस की दृष्टि अंग्रेजों से पूर्व के भारतीय इतिहास पर गई ही नहीं। अंग्रेजों से पूर्व का भारत का इतिहास मुस्लिम आक्रमणों और मुस्लिम शासकों के अत्याचारों व क्रूरताओं का इतिहास है। कांग्रेस ने इस ओर से पूरी तरह आँखें बन्द कर लीं और उन्हें भी भारतीय मान लिया तथा ‘हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई’ की बीन बजानी शुरु कर दी। यह बीन सन् 1920 में जैसे ही बजनी शुरु हुई कि मुसलमानों ने हिन्दुओं के गले काटने शुरु कर दिए। यह गला-काट कार्यक्रम 1921 में केरल के मलाबार से शुरु हुआ और 1947 तक उत्तरोत्तर भीषण से भीषणतर रूप ग्रहण करता गया।
मुस्लिमानों की हिंसक प्रवृत्ति
मुसलमान स्वभाव से ही क्रूर और हुड़ंदगी होता है। हिन्दू स्वभाव से ही सहनशील व अहिंसक होता है। यह बात कांग्रेस अच्छी तरह जानती थी। गान्धीजी ने 1924 में ही कहा था—‘ए मुस्लिम इज़ बुली एण्ड ए हिन्दू इज काऊ’। जब वे यह जानते थे तो मुसलमानों की इस हिंसक प्रवृत्ति पर नियन्त्रण करने के लिए उन्होंने क्या किया? केवल कोरे उपदेश? वे मनोविज्ञान के इस सिद्धान्त को भूल गए कि उपदेश से एक व्यक्ति को तो बदला जा सकता है, समाज को नहीं। इसलिए कांग्रेस की ‘अहिंसा’ का असर मुस्लिम समाज पर कुछ हो ही नहीं रहा था। कांग्रेस ने यह बात भी कभी समझने की कोशिश नहीं की।
कांग्रेस के नेता देशभक्त थे। वे सब प्रकार से देश का हित ही चाहते थे। लेकिन वे ‘हिन्दू मानसिकता’ और ‘मुस्लिम मानसिकता‘ के अन्तर को नहीं समझ पा रहे थे। हिन्दू मानसिकता जहाँ भारत भूमि के प्रति भक्ति की है, वहीं मुस्लिम मानसिकता अरब देश की भूमि के प्रतिआसक्ति की है। हिन्दू जहाँ भारत को ‘मातृभूमि’ मानता है और इसीलिए इसे ‘भारत माता’ कहता है, वहीं मुसलमान इसे ‘भोगभूमि’ मानता है और इसे ‘भारत माता’ कहने में कुफ्र (पाप) समझता है।
इस अन्तर को यदि कांग्रेस नेता समझ लेते तो उनकी व्यवहार मुस्लिम समाज के प्रति कुछ और ही होता। फिर वे ‘हिन्दू-मुस्लिम भाई भाई’ के नारे लगाने की बजाए उन्हें वास्तव में भाई बनाने का प्रयत्न करते जैसाकि स्वामी श्रद्धानन्द जी ने किया था।
किन्तु ऐसा न होने के कारण मुस्लिम समाज व मुस्लिम लीग धीरे-धीरे कांग्रेस, हिन्दू समाज व भारत से दूर होते गए। कांग्रेस ही अपनी गलत सोच के कारण अनजाने में उन्हें शक्ति प्रदान करती गई और आरोप अंग्रेजों पर लगाती रही कि वे लीग का पक्ष ले रहे हैं तथा ‘बाँटो और राज करो’ की नीति पर चल रहे हैं।
वास्तव में अंग्रेज भारत को छोड़ना नहीं चाहते थे; और वे छोड़ते भी क्यों? वे भारत को छोड़ें या न छोड़ें, मुस्लिम लीग की इसमें कोई रुचि नहीं थी। यह दावा तो कांग्रेस कर रही थी कि हम भारत को स्वतन्त्र कराएँगे। इसके लिए उसने लाहौर अधिवेशन में शपथ भी ली थी।
काग्रेस हिन्दू समाज को सबल बनाती
उस शपथ की पूर्ति में जो-जो तत्व बाधक थे, उन्हें रास्ते से हटाने का उद्योग कांग्रेस को करना चाहिए था। मुस्लिम लीग इसमें बाधक तत्व थी। वह मुसलमानों द्वारा दंगे करवाती थी और उन दंगों से शक्ति प्राप्त करती थी। उसकी शक्ति के स्रोत उन दंगों को बन्द करवाने की आवश्यकता थी। इसके लिए कांग्रेस को चाहिए था कि वह हिन्दू समाज को संगठित व बल संपन्न बनाती। बल संपन्न हिन्दू समाज पर मुसलमान हमले करने की हिम्मत ही न करते। फलतः दंगे होते ही न। दंगे न होने से मुस्लिम लीग शक्तिहीन हो जाती। शक्तिहीन मुस्लिम लीग से अंग्रेज भी वार्ता न करते। ऐसी स्थिति में वार्ता केवल कांग्रेस से होती और भारत के विभाजन का प्रश्न ही खड़ा न होता।
इस बात को केवल पं. मदनमोहन मालवीय जी ने समझा था। जब मुस्लिम नेता यह कह कर कांग्रेस को राने लगे कि “अब होगा चौथा पानीपत“ तो मालवीय जी ने उनकी चुनौती को स्वीकार करते हुए कहा था—“तो हो जाने दो देर कैसी?“ किन्तु बाकी सब कांग्रेस नेता चुप्पी साध गए। मालवीय जी ने केवल यह कहा ही नहीं तो देश भर में घूम-घूम कर वे हिन्दू युवकों को अखाड़ों में जा कर बल संपन्न बनने का आह्वान भी करते रहे।
सरदार पटेल को पीछे क्यों धकेला
जुलाई 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव होना था। सबको यह पता था कि इस बार चुना गया अध्यक्ष ही अन्तरिभ सरकार में और बाद में स्वतन्त्र भारत की सरकार में प्रधान मन्त्री होगा। मुस्लिम लीग द्वारा डाली जा रही अंड़गे बाजियों से कठोरतापूर्वक निपटने की सामर्थ्य सरदार पटेल में ही है, ऐसा सब कांग्रेसी समझते थे। इसलिए 14 में से 11 प्रान्तीय समितियों ने अध्यक्ष के लिए सरदार पटेल का नाम प्रस्तावित किया। वे सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने जाने वाले थे। किन्तु गान्धीजी ने अड़ंगा लगा दिया और जवाहरलाल नेहरू को अध्यक्ष बनवा दिया, जबकि एक भी समिति ने जवाहर लाल का नाम प्रस्तावित नहीं किया था।
ऐसा क्यों हुआ? सरदार पटेल में ऐसा क्या दोष था कि गान्धीजी उन्हें देश का प्रधानमन्त्री नहीं बनने देना चाहते थे?
इसका उत्तर हमें 26 जनवरी 1940 को गान्धीजी की डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी से हुई भेंट वार्ता में मिलता है। इस वार्ता का उल्लेख बलराज मधोक द्वारा लिखित डा. मुखर्जी की जीवनी में है—
जब महात्माजी को मुखर्जी के हिन्दू महासभा में प्रवेश की बात बतलायी गई, तब वे बोले—“मालवीय जी के बाद हिन्दुओं का नेतृत्व करने वाले की आवश्यकता थी।“
इस पर डा. मुखर्जी ने टिप्पणी करते हुए कहा—“तब आप साम्प्रदायिक कह कर मेरी भर्त्सना करेंगे।“
गान्धीजी का उत्तर था—“समुद्र मंथन के बाद भगवान शिव ने जैसे विषपान कर लिया था, उसी तरह भारतीय राजनीति के विष को पीने के लिए भी किसी की आवश्यकता थी, वह तुम ही पूरी कर सकते हो।“
गान्धीजी डा. मुखर्जी के उदार और सर्वांशतः राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से बहुत प्रभावित थे। विदा के पहले वे बोले—“पटेल एक कांग्रेसी है जिसका हृदय हिन्दू है तुम एक हिन्दूसभाई हो जिसका हृदय कांग्रेस का है।“
—मधोक, डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, 1996, पृष्ठ-37
स्पष्ट है कि पटेल का हृदय हिन्दू होना ही पटेल का दोष था। इस बात की पुष्टि प्रसिद्ध पत्रकार दुर्गादास भी करते हैं—
“कांग्रेस में उन्हीं व्यक्तियों को आगे लाया गया, जो मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति में विश्वास करते थे। 1928 में सरदार वल्लभ भाई पटेल के लिए कांग्रेस अध्यक्ष बनने का अवसर था, किन्तु गान्धीजी ने मोतीलाल नेहरू को अध्यक्ष बनाया। 1929 में कांग्रेस अध्यक्ष के लिए पटेल का नाम अनेक प्रान्तों से प्रस्तावित हुआ था, किन्तु गान्धीजी जवाहर लाल नेहरू का नाम सामने लाए। फिर 1936 में पटेल का नाम बहुमत से प्रस्तावित हुआ, परन्तु गान्धीजी ने फिर से जवाहरलाल नेहरू के नाम का समर्थन किया। 1946 में भी पटेल के स्थान पर नेहरू अध्यक्ष बने। इस समय भी अधिकांश प्रान्तीय समितियों ने पटेल का ही नाम प्रस्तावित किया था, क्योंकि बहुमत की यह धारणा थी कि पटेल जिन्ना से अच्छी तरह, निपट सकते हैं।“
—दुर्गादास, भारत : कर्जन से नेहरू और उसके पश्चात्, पृष्ठ-240
गान्धीजी ने सक्षम व लौहपुरुष सरदार पटेल को पीछे हटाकर अक्षम व कायर जवाहर लाल को अन्तरिम सरकार का अगुआ बनवा दिया। जवाहर लाल जिन्नाह व मुस्लिम लीग से निपट ही नहीं सके। मुस्लिम दंगों को लौह-पंजों से दबाने की हिम्मत उसमें थी नहीं। वह इतना भयभीत हो गया कि विभाजन स्वीकार कर बैठा। उसका साथ कृपलानी, पटेल व बल्देवसिंह को भी देना पड़ा।
कांग्रेस महासमिति द्वारा भी विभाजन स्वीकार
इसके बावजूद जवाहर की इस गलती को सुधारने का एक मौका कांग्रेस के पास था। अखिल भारतीय कांग्रेस महासमिति के द्वारा विभाजन की योजना की पुष्टि आवश्यक थी। अतः 14 व 15 जून 1947 को महासमिति की बैठक हुई। इस बैठक में विभाजन के प्रस्ताव के पक्ष में 157 मत तथा विपक्ष में केवल 29 मत पड़े। 32 सदस्य तटस्थ रहे। स्वयं गान्धीजी ने ही सब सदस्यों से अपील की कि वे विभाजन को स्वीकार कर लें, और सबने स्वीकार कर लिया।
इस बैठक में पुरुषोत्तम दास टण्डन ने बड़े ओजस्वी सब्दों में विभाजन का विरोध किया। उन्होंने कहा—
“भले ही हमें कुछ और समय तक ब्रिटिश राज के अधीन कष्ट उठाने पड़ें, पर हमें अखण्ड भारत के चिरपोषित लक्ष्य की बलि नहीं देनी चाहिए। आइए, हम युद्ध के लिए कटिबद्ध हों, यदि आवश्यकता पड़े तो हम अंग्रेजों और लीग दोनों से लोहा लें और देश को खण्डित होने से बचाएँ।“
—जे.बी. कृपलानी, गान्धी, पृष्ठ-283
भेले ही टण्डनजी ने ‘युद्ध के लिए कटिबद्ध’ होने का आह्वान कर दिया था, लेकिन गान्धीजी सहित कांग्रेस के अधिकांश नेता बूढ़े हो चुके थे। वे हताश व निराश थे। संघर्ष करने की अब उनकी मानसिकता भी समाप्त हो चुकी थी। इसलिए गान्धीजी की अपील का उनके ऊपर तुरन्त असर हुआ और विभाजन का प्रस्ताव पास हो गया।
इसलिए भारत-विभाजन के लिए दोषी कांग्रेस है। देश को एक और अखण्ड रखने की उसकी ही जिम्मेवारी थी। यह देश कांग्रेस का था, मुस्लिम लीग और अंग्रेजों का नहीं था। इसलिए जिम्मेदारी भी कांग्रेस की ही थी। उसने वह जिम्मेदारी नहीं निभायी।
लोहिया की स्वीकारोक्ति
डा. राम मनोहर लोहिया भी उन दिनों कांग्रेस नेता थे और जुलाई 1947 की महासमिति की बैठक में मौजूद थे। उन्हें बाद में अपने आचरण पर बहुत ही आत्म-ग्लानि हुई। उन्होंने लिखा—“आज मुझे इस बात का गहरा क्लेश हो रहा है कि जब हमारे देश का विभाजन हुआ, तो न तो किसी व्यक्ति ने अपने प्राणों का उत्सर्ग किया और न ही कोई कारागार में गया। मुझे इस बात पर गहरा खेद है कि भारत-विभाजन पर कारागार जाने के लिए मैंने रंचमात्र भी चेष्टा नहीं की। हिन्दू-मुस्लिम बलवे की भयावह, पर झूठी आशंका ने मुझे इतना अंधा कर दिया था कि मैं अपने जीवन की, और देश के इतिहास की, निर्णायक घड़ी में अपनी आस्था का साक्षी भी नहीं बन सका। दूसरों का भी यही हाल हुआ। नेताओं की तो और भी अद्योगति हुई। वे लालच के फन्दे में फँस गए।“

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