अभी भूत के सिवा और कौन मिलेगा लेह के रास्ते में

टॉकिंग पॉइंट्स

नरविजय यादव

उत्तर भारत में सर्दी पूरे शबाब पर है। हिमाचल प्रदेश, कश्मीर और लद्दाख के ऊंचे पहाड़ों पर बर्फबारी होने से पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली तक शीतलहर का प्रकोप है। हिमालय की ऊंची वादियों में भले ही कड़ाके की ठंड पड़ रही है, लेकिन पर्यटकों को ऐसे मौसम में घूमना बहुत भाता है। कुछ लोग तो दिसंबर और जनवरी की जमा देने वाली ठंड में भी लद्दाख घूमने जाते हैं। वहां इक्का दुक्का लग्जरी होटलों में सर्दियों में भी सभी सुविधाएं मिल जाती हैं। इन दिनों लद्दाख जाने के लिए विमान सेवा ही एकमात्र जरिया है। मई-जून में बर्फ छंट जाने के बाद सड़क मार्ग खुल जाते हैं। फिर श्रीनगर और मनाली से लेह के लिए बाइकर्स और कारों की कतारें लग जाती हैं। मनाली से लेह का रास्ता कठिन जरूर है, लेकिन है बहुत रोमांचक। हवाई मार्ग से लेह पहुंचने वालों को हिमाच्छादित चोटियां देखकर अचरज होता है। परंतु सड़क मार्ग से मनाली, सरचू होते हुए लेह जाने वालों को भी यह यात्रा जीवन भर याद रहने वाली होती है।

गर्मियों में लद्दाख के निर्जन पहाड़ देखने लायक होते हैं। मीलों तक आदमी नहीं दिखता, चिड़िया नहीं दिखती, जानवर नहीं दिखते। कहीं-कहीं तो सड़क भी नहीं दिखती। सामने होता है तो सिर्फ ऊबड़-खाबड़ रास्ता। हिमालय का ठंडा रेगिस्तान है लद्दाख। जीवन कठिन है धरती के इस भूभाग में। दिन तो खूबसूरत नजारे देखते बीत जाता है। लेकिन रात को डर लगने लगता है। कमजोर दिल वालों को भूत भी दिख सकता है। मनाली-लेह मार्ग पर ऐसा ही एक स्थान है गाटा लूप। वहां बीस तीखे मोड़ों वाली ऊंची चढ़ाई है। यह स्थान मनाली से आगे और नकीला दर्रे से पहले पड़ता है। वहां से गुजरने वाले पर्यटकों को एक स्थान पर प्लास्टिक की सैकड़ों बोतलों का ढेर दिख सकता है। वहां बिस्किट के इक्का दुक्का पैकेट भी पड़े हो सकते हैं। लाल झंडियों वाली एक गुफा जैसा कुछ बना है वहां। कहते हैं कि यह बोतल वाले एक भूत का बसेरा है। स्थानीय लोगों ने इस स्थान को एक मंदिर जैसा स्वरूप दे दिया है।

पिछली यात्रा में हमने कार के ड्राइवर से पूछा कि बोतलों का राज क्या है। इतनी सारी पानी की बोतलें क्यों पड़ी हैं वहां। जवाब मिला, वहां एक प्यासा भूत रहता है। रात को वहा से गुजरते ट्रक ड्राइवरों को परेशान करता है। इस चक्कर में अनेक हादसे हो चुके हैं उधर। भूत को खुश रखने के लिए ट्रक ड्राइवर वहां मिनरल वाटर की बोतलें रख देते हैं। कभी कभार बिस्किट भी। फिर, वे सुरक्षित गुजर जाते हैं। कई साल पहले गाटा लूप के इस रास्ते में एक ट्रक खराब हो गया था। घंटों मशक्कत करने के बाद भी ठीक नहीं हो पाया। रात होने पर बर्फ गिरने लगी और रास्ते बंद हो गये। फिर कोई अन्य ट्रक नहीं गुजरा उधर से। ड्राइवर नजदीक किसी गांव की तलाश में निकल गया। क्लीनर ट्रक की रखवाली के लिए वहीं रुका रहा। अगले दिन ड्राइवर लौटा तो क्लीनर को मृत पाया। भूख, प्यास और ठंड ने उसकी जान ले ली थी। कहते हैं, उसी प्यासे क्लीनर की आत्मा भटकती है वहां। स्थानीय लोगों ने उसकी शांति के लिए एक मंदिर बना दिया। मोड़ से गुजरने वाले ट्रक पानी की बोतलें छोड़ जाते हैं वहां। पहाड़ों पर ऐसे किस्सों की कमी नहीं होती।

नरविजय यादव वरिष्ठ पत्रकार व कॉलमिस्ट हैं।

ईमेल: narvijayindia@gmail.com

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