गुरु दीक्षा क्या है ? गुरू की कृपा और शिष्य की श्रद्धा

गुरु दीक्षा क्या है

(देव मणि शुक्ल )

गुरू की कृपा और शिष्य की श्रद्धा रूपी दो पवित्र धाराओं का संगम ही दीक्षा है। यानी गुरू के आत्मदान और शिष्य के आत्मसमर्पण के मेल से ही दीक्षा संपन्न होती है। दीक्षा के संबंध में गुरूगीता में लिखा है— गुरूमंत्रो मुखे यस्य तस्य सिद्धयन्ति नान्यथा। दीक्षया सर्वकर्माणि सिद्धयन्ति गुरूपुत्रके।। – गुरूगीता 2/131 अर्थात् जिसके मुख में गुरूमंत्र है, उसके सब कर्म सिद्ध होते हैं, दूसरे के नहीं, दीक्षा के कारण शिष्य के सर्वकार्य सिद्ध हो जाते है। गुरूदीक्षा एक सूक्ष्म आध्यात्मिक प्रयोग है। दीक्षा में शिष्यरूपी सामान्य पौधे पर गुरूरूपी श्रेष्ठ पौधे की कलम (टहनी) प्राणानुदान के रूप में स्थापित कर शिष्य को अनुपम लाभ पहुंचाया जाता है। कलम की रक्षा करके उसे विकसित करने के लिए शिष्य को पुरूषार्थ करना पडता है। गुरू की सेवा के लिए शिष्य को अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरूषार्थ एवं धन का अंश उनके सानिध्य में रहने हेतु लगाना आवश्यक होता है। शिष्य अपनी श्रद्धा और संकल्प के सहारे गुरू के समर्थ व्यक्तित्व के साथ जुडता है। उधर गुरू को दीक्षा में अपना तप, पुण्य और प्राण यानी शक्तियां और सिद्धियां शिष्य को हस्तांतरित करनी पडती हैं और वह सत्प्रयोजनों के लिए शिष्य से श्रद्धा, विश्वास, समयदान, अंशदान की अपेक्षा करता है।
इस प्रकार दीक्षा का अंतरंग संबंध गुरू और शिष्य के मध्य होता है। एक पक्ष शिथिल पडेगा, तो दूसरे का श्रम व्यर्थ चला जाएगा यानी दीक्षा लेने वाले की भावना और समर्पण से ही दीक्षा फलीभूत होती है अन्यथा ज्यादातर दीक्षाए असफल हो जाती हैं। दीक्षा मंत्र बोलकर दी जाती है, तो उसे मांत्रिकदीक्षा कहते हैं। निगाहों से दी जाने वाली दीक्षा शांभवी और शिष्य के किसी केन्द्र का स्पर्श करके उसकी कुंडलिनी शक्ति जगाई जाती है, तो उसे स्पर्श-दीक्षा कहते है। गुरूमंत्री दीक्षा के द्वारा शिष्य की सुषुप्तशक्ति को जगाते हैं, चैतन्यशक्ति देते हैं। सद्गुरू से प्राप्त सबीज मंत्र को शद्धा, विश्वासपूर्वक जपने से कम समय में ही शिष्य को सिद्धि प्राप्त होती है।
ध्रुव नारदजी के शिष्य थे। उन्होंने नारदजी से “ओम नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र पाकर उसका जप किया तो उन्हें प्रभु के दर्शन हो गए। इसी प्रकार नारदजी ने रत्नाकर डाकू को “मरा-मरा” मंत्र दिया, जिससे उसका उद्धार हो गया। सभी शिष्यों, साधकों के लिए दीक्षा अनिवार्य होती है, क्योंकि साधना का ही नहीं, जीवन का आवश्यक अंग है। जब दीक्षा नहीं होती, तब तक सिद्धि का मार्ग अवरूद्ध ही बना रहेगा। शास्त्रों में दीक्षा के बिना जीवन पशुतुल्य कहा गया है।
गुरूदीक्षा का एक अंग ह्रदयालंभन भी है अर्थात् शिष्य के ह्रदयप्रदेश पर गुरू अपना हाथ रखकर मम व्रते ते ह्रदयं दधामि आदि मंत्रोच्चाारण करता हुआ, अपनी उपार्जित अध्यात्मशिक्त को शिष्य के ह्रदय में प्रविष्ट करता है। यह शक्तिपात का शास्त्रीय सिद्धांत पूर्णरूप से वैज्ञानिक है। उपनयन-संस्कार के समय उपनीत शिष्य के ह्रदय पर तथा विवाह-संस्कार के समय पति-पत्नी क ह्रदय पर हाथ रखकर इस विधान को गुरू करते हैं, तो उनकी सुसुप्त शक्तियां जाग्रत हो उठती है।

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