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अब पछताए क्या होत

दक्षिण प्रदेश के एक बड़े नगर के बाहर बरगद का पेड़ था। उस पेड़ की घनी छाया में आने-जाने वाले मुसाफिर बैठकर विश्राम किया करते थे। उस पेड़ पर एक कौवा रहता था। एक बार यह कौवा नगर की ओर उड़ा जा रहा था कि रास्ते मे एक शिकारी को जाल फैलाए हुए देखा। उसे देखकर कौवे ने सोचा कि यह शिकारी आज अपने बरगद के वृक्ष की ओर चला गया तो न जाने कितने पक्षियों को जाल में फंसाकर ले जाएगा।

यही सोचकर कौवा वहीं से वापस आ गया और आते ही उसने बरगद पर रहने वाले पक्षियों को त्तकाल बुलाया और बोला भाईयो ! यह सामने से जो आदमी आ रहा है, इसके जाल है। हमें फांसने के लिए दाना डालेगा। इस दाने को तुम लोग जहर समझना।‘

अभी कौवा यह कह ही रहा था। कि वह शिकारी वृक्ष के नीचे आ गया। उसने आते ही वृक्ष के नीचे चारो ओर दाना बिखेर दिया और अपना जाल फैलाकर दूर आराम से बैठ गया। बरगद पर बैठे सभी पक्षी तोवे कौवे की बात मानकर अपनी जान बचाकर चुपप बैठे तमाशा देख रहे थे। इसी बीच कबूतरो का एक झुंड इधर से आ निकला। बिखरे हुए दानो को देख उनके में पानी भर आया। वहां पर बैठे दूसरे पक्षियो ने उन्हे मना किया, किंतु वे नही माने और दाने पर टूट पड़े। बस फिर क्या था, दाना खाने की बजाय वे सब शिकारी के जाल मे फंस गए।
इधर वह शिकारी उन पक्षियो को जाले मे फंसे देखकर अपने स्थान से दौड़ा। उन पक्षियो के सरदार ने कहा, ‘भाईयो, तुम डरो मत। मुसिबत मे घबराने से काम नही चलता दुःख मे बुध्दि से काम लेना चाहिए। बुध्दिमान लोग दुःख और सुख से को समान ही समझते है। जैसे सूर्य का रंग सुबह और शाम एक ही जैसा लाल होता है। इसलिए हमे हिम्मत से काम लेते हुए इस जाल समेत ही उड़ जाना चाहिए। यह पापी शिकारी देखता ही रह जाएगा। यदि हम ऐसा नही करेंगे तो सब के सब मारे जाएंगे।

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