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वैदिक_जातिवाद_पतनका_कारण_नहीं

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श्रीराम!
कुछ लोग गीता जी के “चातुर्वर्ण्यम् माया सृष्टम् गुणकर्म विभागशः ” केवल इतने वचन को ही पढ़ते हैं तथा जोर शोर के साथ ” कर्मों के अनुसार जाति होती है, जन्मसे नहीं” ऐसा बबण्डर फैलाते रहते हैं। जिनमें अधिक गुरुत्व नहीं है ऐसे हल्के लोग इस बबण्डर के शिकार भी होते रहते हैं।
यद्यपि इनलोगों को इस श्लोक का अर्थ कभी नहीं समझमें आता। यहाँ अति अपष्ट है।
श्री भगवान् कहते हैं– #चातुर्वर्ण्यम्_मया_सृष्टम्– चारों वर्ण की सृष्टि मैने की।
तब तो आप पक्षपाती व निर्दयी हैं?
नहीं। #गुणकर्म_विभागशः_सृष्टम्–मैने गुण (सात्विक राजस तामस ) तथा कर्म ( पूण्य पाप ) के यथा योग्य विभाग पूर्वक सृष्टि की है। जिनके जैसे पूर्वजन्मार्जित गुण स्वभाव व कर्म थे , उसी के अनुसार मैंने ब्राह्मण क्षत्रिय आदि वर्ण ( जाति) व मनुष्य पशु आदि योनियों की सृष्टि की है। अतः हमारा कोई दोष नहीं।
जिसकी जैसी सृष्टि हुई है उसी गुण स्वभाव से प्राप्त शास्त्रीय कर्मों के द्वारा ही, जिन परमात्मा से सभी भूतों की उत्पत्ति हुई है, जिनसे समस्त जगत् व्याप्त है, उन्हीं परमात्मा की आराधना करता हुआ व्यक्ति सिद्धि( मोक्ष) को प्राप्त होता है,अन्यथा नहीं–
यतः प्रवृत्तिर्भुतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।। ( गीता १८/४६)।इति।।
भली भाँति दूसरों के द्वारा आचरित धर्म ( कर्म) की अपेक्षा गुणरहित होने पर भी अपना धर्म श्रेष्ठ होता है। क्योंकि स्वभाव से नियत किये हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता। ( अर्थतः परधर्म का अनुष्ठान करने से अवश्य पाप को प्राप्त होता है।)—
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः पराधर्मात् स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम्।।( गी. १८/४७)। इति।
यदि इस गीतोक्त शिक्षा को समझ लिया जाए, तो समस्त जातिमूलक विवाद ही समाप्त हो सकता है। किन्तु इन वचनों से कोई लेना देना नहीं रहता। लोक परलोक मोक्ष नरक की बातें जाए जहन्नुम में। हमें तो बस बाम्हन बनना है, इस धुन में न जाने क्या क्या बक बक चक चक होती रहती है।
वस्तुतः वैदिक जातिवाद जीवन को शाश्वत मानकर सुदृढ़ व्यवस्था देता है। जिन्हें जीवन का अर्थ मात्र यही जन्म और आकण्ठ भोग ही विदित होता है, उन्हें कभी भी कोई जाती विज्ञान या सामाजिक विज्ञान धर्म कर्म विज्ञान समझ में आने वाला नहीं है।
यह जातिवाद अंधविश्वास पर नहीं वल्कि अति शूक्ष्म वैज्ञानिक आधारों पर व्यवस्थित है। शरीर विज्ञान व पराविज्ञान से समर्थित है। समाज व व्यक्ति का घातक नहीं वल्कि उत्थान कारक है। स्वार्थ राग द्वेष या घृणा मूलक नहीं वल्कि पूर्णतः सहानुभूति परक है। स्व पर संघर्ष का प्रयोजक नहीं वल्कि स्व पर संघर्ष का नाशक है।
यहाँ यह आक्षेप हो सकता है कि ऐसा अति उपयोगी वैदिक जातिवाद होने पर भी अवनति क्यों हो रही है?? इस का उत्तर यह है कि–
कुछ उच्च जाति वालों द्वारा जातिवाद का #दुरुपयोग करके निमन्जाति वालों को उत्पीड़ित करना, एक बड़ा कारण है। इस बात को कुछ दयालु प्रकृति के लोगोंद्वारा बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाना भी कारण है।
दयालु महानुभावों के मन में इसके लिए पीड़ा होना स्वाभाविक है।किन्तु उन दयालु सज्जनों ने वैदिक जातिवाद को समझने का कभी यत्न ही नहीं किया।
#उत्पीड़न_का_मुख्य_कारण_जातिवाद_नहीं_वल्कि_उसका_दुरुपयोगरूप_दोष है। इस यथार्थ तथ्य को नहीं समझने के कारण वे लोग जातिवाद को ही उत्पीड़न का कारण मान कर निम्न जाति के लोगों को भड़काया।उनमें कलह का बीज बोया। तथा जातिवाद को मिटाने के लिए कानून भी बनवा डाला।
यह वैसी ही अदूरदर्शिता मूलक दयालुता है जैसे जैसे कोई रोग को दुख का हेतु न मानकर रोगी को ही दु:ख का कारण मानकर रोगी को ही समाप्त करने का पूरा प्रयास करने लगे।
कटु सत्य तो यही है कि जो लोग जाति सम्प्रदाय आदि को संघर्ष का कारण मानकर इन्हें मिटाना चाहते हैं, उनको सबसे पहले कांग्रेस सपा बसपा बीजेपी आदि पार्टीवादों को ही मिटाना चाहिए। क्योंकि जातिवाद सम्प्रदाय वाद से तो कहीं कुछ थोड़ी हानि है पर पार्टीवादों से तो सर्वत्र प्रतिदिन बहुत बड़ी जन धन हानि हो रही है।
यदि कहें कि नुकशान पार्टियों से नहीं वल्कि कुछ स्वार्थी लोगों के द्वारा जो दुरुपयोग किया जाता है उससे है , अतः पार्टी को नहीं वल्कि दुरुपयोग को ही हटाना चाहिए ।तो हम आपके इस सत्य को पूर्णतः ससम्मान हृदय से स्वीकार करते हुए निवेदन करते हैं कि वैसे ही — जातिवाद को नहीं वल्कि उसके दुरुपयोग को मिटाने का प्रयत्न करें।
सत्य ही नहीं वल्कि परम सत्य तो यह है कि किसी भी देश में किसी भी वर्गों का विभाग न रहे , ऐसा संभव ही नहीं है।अतः वर्ग विहीन समाज की कल्पना केवल मुंगेरीलाल का हसीन सपना ही है। अधिक से अधिक वैदिक जाती व्यवस्था के अलावा किसी अन्य वर्ग व्यवस्था के रूप में रहे, या कोई नूतन बनाई जाएगी, इतना ही हो सकता है। सर्वथा जातिवाद का उन्मूलन असम्भव है।
*जाति व वर्ण पर्याय ही हैं*🙏🙏🙏

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