google-site-verification=T3FY5sztK2346btUIz-KVJq_4hP7OPE7HkLHoHYmQto

अनासक्त कर्म ही कर्मयोग है

कर्म दो प्रकार के हैं: (1) आसक्त कर्म और अनासक्त कर्म प्रायः मनुष्य आसक्ति के कारण ही कोई कर्म करता है आसक्ति ही कर्म करने के लिए प्रेरणा देती है कर्मयोगी को आसक्ति पर विजय प्राप्त करनी चाहिए फल की कामना को त्यागकर कर्म करना चाहिए निष्काम कर्मयोगी सुख दुःख लाभ हानि जय पराजय से ऊपर उठकर कर्म करता है कर्मयोगी लाभ हानि की भावना से प्रेरित नहीं होता ऐसा कर्म निष्काम कर्म या अनासक्त कर्म है श्रीकृष्ण इसी कर्म योग का उपदेश अर्जुन को देते हैं कि वह सुख दुःख लाभ हानि और जय पराजय को समान समझकर युद्ध में प्रवृत्त हो सुख -दुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि

कर्मयोगी के लिए स्वकर्म ही स्वधर्म है गीता में सभी वर्गों के कर्म निश्चित हैं ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य एवं शूद्र के कर्म निश्चित हैं ये निश्चित कर्म ही उनके स्वकर्म कहे जाते हैं और यही स्वधर्म है प्रत्येक मनुष्य को अपने स्वधर्म के अनुसार आचरण करना ही पवित्र कर्तव्य है अर्जुन क्षत्रिय है अतः युद्ध करना ही उनका पुनीत कर्तव्य है और यही उनका धर्म है

Please follow and like us:
error
%d bloggers like this: