उल्लास और आनंद का त्योहार होली

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उल्लास और आनंद का पर्व-होली

 

समरसता और सामूहिकता का अनुष्ठान पर्व होली प्राचीन त्योहारों में से एक है । यह पर्व भगवान नृसिंह द्वारा हिरण्यकश्यपु का बध कर प्रह्लाद की रक्षा करने व होलिका दहन की स्मृति से जुड़ा है । शायद होली शब्द प्रह्लाद की बुआ होलिका के नाम पर ही रखा गया होगा । आर्य परंपरा से चली आ रही इस पर्व का पुरातन ग्रंथों यथा वैदिक ऋषि जैमिनी के पूर्व मीमांसा, श्रीमद भागवत पुराण, नारद पुराण, भविष्य पुराण जैसे धर्मग्रंथों तक में वर्णन किया गया हैं । विदेशी विद्वान अलबरूनी ने भी अपनी यात्रा वृतांत में होली मनाये जाने का विस्तार से उल्लेख किया है । अकबर, जहांगीर और आखिर मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर द्वारा मनाए जाने वाली होली के धमाल किस्से प्रसिद्ध है। कवियों और साहित्यकारों की तो खैर होली मन -पसंदीदा पर्व है । विद्यापति,अमीर खुसरो, सूरदास, रहीम,रसखान, जायसी, मीरा, कबीर,बिहारी धनानंद आदि- आदि अन्यान्य कवियों ने अपनी रचनाओं में होली के जो रंग बरसाएं हैं, वह अनूठी और निराली है ।

 

 

हालांकि होली मनाने की कई कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन लोक मान्यता यह है कि सबसे पहले होली योगेश्वर श्री कृष्ण ने राधा रानी के साथ खेली थी । इसलिए ब्रज की होली आज भी दुनिया भर में प्रसिद्ध है । देशभर में होली मनाने के भिन्न-भिन्न तरीकों के साथ-साथ इस पर्व से कई पौराणिक कथाएं जुड़ी है, जिसमें विष्णु भक्त प्रह्लाद और पिता हिरण्यकश्यप की कथा सबसे ज्यादा प्रचलित मानी जाती है । भक्त प्रह्लाद के पिता हिरणकश्यपु स्वयं को भगवान मानते थे । वह अपने बेटे प्रह्लाद के हरि भक्ति का विरोध करते थे । उन्होंने प्रह्लाद को विष्णु भक्ति करने से रोका और जब वह नहीं माने तो प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया । उसके पिता ने आखिर अपनी बहन होलिका से मदद मांगी । होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था । अग्नि को सहन कर सकने की शक्ति से युक्त होलिका, प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि के कुंड में बैठ गई । विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जलकर भस्म हो गई ।

 

 

इस कथा के साथ-साथ भगवान शिव की पौराणिक कथा को भी होली पर्व से जोड़ा जाता है। मान्यता है की कामदेव ने फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि के दिन पुष्प बाण चलाकर समाधिस्थ भगवान शिव का तप भंग करने का अपराध किया था, जिससे क्रोधित होकर उन्होंने अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से कामदेव को भस्म कर दिया था । कामदेव प्रेम के देवता माने जाते हैं। उनके भस्म होने के कारण संसार में शोक की लहर फैल गई ।बाद में कामदेव की पत्नी रति की प्रार्थना और विलाप् से द्रवित होकर भगवान शिव ने रति को आशीर्वाद दिया कि उसे श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युमन के रूप में अपना पति पुन: प्राप्त होगा । भोले शंकर की इस वरदान और उदारता की याद में लोगों ने होली खेलकर खुशियां मनाई

 

 

सचमुच हंसी ठिठोली का यह त्यौहार हमारी देश की विविधता को अनेक रूपों में प्रतिबिंबित करता है जहां एक और चैत्र माह के पदार्पण के साथ भारतीयों के लिए नए साल की शुरुआत होती है वहीं इस समय रबी की फसल के पकने की आशा से समस्त किसानों के मन में हिलोरें उठने लगती है । सदियों से इस त्योहार को हर्षोल्लास से परिपूर्ण हो कर एक दूसरे को अबीर और गुलाल लगाकर आपसी भाईचारे एवं प्रेम को बढ़ावा देने वाले सामाजिक पर्व के रूप में मनाए जाने की परंपरा रही है ।

 

 

 

गिले- शिकवे भूलकर एक – दूसरे पर अबीर- गुलाल लगाकर गले लगाने वाले इस त्योहार पर बिना गीत संगीत बिन साजन बारात की तरह है । लोक संगीत, शास्त्रीय संगीत, फिल्मों के गीत होली के रंग में रंगा हुआ हैं । शायद हिंदी सिनेमा में त्योहारों पर सबसे अधिक गीत होली के ही हैं । ‘मदर इंडिया’ में शमशाद बेगम की आवाज में ‘होली आई रे कन्हाई’ फिल्म ‘कोहिनूर’ का गीत ‘तन रंग लो जी आज मन रंग लो’, ‘ नवरंग’ फिल्म का गीत ‘अरे जा रे हट नटखट’ , ‘कटी पतंग’ का गीत ‘आज न छोड़ेंगे बस हमजोली’ ‘शोले’ के गीत ‘होली के दिन दिल खिल जाते है’ ‘नदिया के पार’ का होली गीत ‘ जोगी जी सा रा रा’ आज भी लगभग हर होली पर जरूर ही सुनाई देता है । फिल्म ‘फागुन’ का चर्चित गीत ‘पिया संग खेली होली’ ‘पराया धन’ का ‘होली री होली मस्तों की टोली’ ‘सिलसिला’ का रंग बरसे’ ‘डर’ का गीत ‘सजन हमें ऐसे रंग लगाना’ ‘बांगवां’ का ‘होली खेलत रघुबीरा अवध में’ , फिल्म ‘डर’ ‘अंग से अंग लगाना’, ‘मोहव्वतें’ की ‘सोनी सोनी अखियों वाली’, ‘मशाल’ का ‘होली आई होली आई देखो होली आई री’ ‘वक्त – द रेस अगेस्ट टाइम’ फिल्म का अँग्रेजी-हिंदी मिश्रित गाना ‘डू मी फेवर लेट्स प्ले होली’ , ‘ये जवानी है दिवानी’ ‘बलम पिचकारी जो तुने मुझे मारी तथा टॉयलेट्स एक प्रेम गाथा का होली गीत भी हर होली की शान माना जाता है।

 

आजकल इस रंगों के उत्सव को मनाने के हमारे तौर-तरीकों में बहुत अधिक बदलाव आने के साथ-साथ वैमनस्यता व ईर्ष्या का भाव अधिक जागृत प्रतीत होता है । आज के परिवेश में वर्तमान पीढ़ी ने होली के महत्व को घटा दिया है जबकि यह त्यौहार तो सबको गले लगाने और एक रंग में रंग जाने का है ।अगर किसी रूठे को मनाना हो या किसी को गले लगाना हो तो होली से अच्छा मौका कोई और नहीं हो सकता है । तो आइए बेहद सहजता सरलता, उमंग, शालीनता और उलास के साथ मनाएं होली…

प्रवीण कुमार झा

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