लोकतंत्र के मंदिर में धक्का मुक्की का सही मायने

भारत लोकतंत्र से ज्यादा वोटतंत्र में विश्वास रखता है। हालाँकि वोटतंत्र वाले भारत में एक लोकतंत्र के मंदिर है। लेकिन जब उसमें जाहिल, गवार, टिकट ब्लैकियर, गुंडा बदमाश नाचने नाचने वाले मांगने वाले पहुँच जाय तो लोकतंत्र के मंदिर में कुछ ऐसा ही होगा। यह कोई अस्वभाविक नही है। जहाँ पर नशा हो वही पर नाश है और इस लोकतंत्र में भी कुछ ऐसा ही है। अगर कोई अपनी ड्यूटी पर शराब पीकर नही जा सकता है तो फिर इस लोकतंत्र में बैठे लोगों को जिसे जनता 24X7 के लिए पैसे देती है उसके बावजूद भी वो सांसद अगर शराब पीकर संसद में जाता हो तो संसद के भविष्य तो ऐसे ही गर्त में चला जाता है।
संसद का काम कानून बनाने की है, निश्चित तौर पर इसमें विश्वास रखने वालों के लिए यह एक मंदिर है। लेकिन इसमें अमर्यादित तरीके से हंगामा करने वाले कौन है ? क्या ये लोग इस संसद में या फिर लोकतंत्र में विश्वास रखते है। भारत के सर्वोच्य सदन राज्य सभा में हुए अमर्यादित हंगामें के बाद हमे नही लगा कि किसी के भी आंखों में शर्म आया होगा, अगर हम उपराष्ट्रपति को छोड़ दे तो। बात ये है कि लोग शर्मिंदा भी क्यों हो, आखिर भारत के लोगों नें ही तो इन उन्मादियों को संसद में भेजा है हंगामा करने के लिए। भले ही बाहर यह दुश्यन्त कुमार के यह पंक्ति को गाते हो,

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।”

लेकिन इनका मकसद हंगामा करने से ज्यादा तो कुछ भी नही होता है।
ऐसे भी राजनीति में आजकल लोग सेवा करने नही आते है, आज राजनीतिक का मतलब बिजनस है और बिजनस का मतलब होता है उससे धन कमाना। राजनीति से ज्यादा कमाऊ बिजनस कोई भी नही है, जहाँ सालों में करोड़ों कमाया जा सकता हो और अपने कई पुस्तों के लिए धन संचय करना भी एक लक्ष्य बन गया है। उदाहरण तो आप देख ही सकते है कैसे एक हेडमास्टर जी के पास अरबों की संपति है। राजनीतिक लाखोंं की स्कीम चलाकर करोड़ो कमाने वाली एक व्यवसाय़ बन चुका है जिसमें आजकल हर कोई अपना किस्मत आजमाने की कोशिश कर रहा है।
राजनीतिक एक ऐसी स्कीम है जो जनता के पैसे से जनता को ही कैसे लूटा जाय का बेहतरीन नमूना है। जो जनता को फ्रि में कंबल देने की बात समझा दिया उसी का बिजनस चल पड़ा।
जनता को चाहिए 5 किलों फ्रि का अनाज और फ्री के बिजली पानी के लिए ऐसे लोगो को संसद भेजते है तो यह उस सांसद की दोष नही है बल्कि यह दोष आपका ही है। अगर लोकतंत्र में टिकट ब्लैकियर, फिल्मी कलाकार और चोर उचके को भेंजेंगे तो निश्चित ही है कि व्यक्ति वैसा ही अभिनय करेगा। संसद मेे कोई साधना को करेगा नही या त्याग की बात करेगा। आखिर उनको भी तो अपने नौ बच्चों के लिए धन कमाना है ताकि उन निकम्मो को जिंदगी भर कमाना न पड़े और ऐस से जिये।
जनता तो जनार्दन है वह सब जानती है, ये भी जानती है कि ऐसे लोगों को संसद में भेजने का परिणाम क्या होगा। सभी लोग आरएसएस के शाखा में तो जाते नही है, कुछ लोग तो आस्ट्रेलिया और कनाडा से पढ़कर आये है और अपने पूर्वजों के द्वारा राजनीतिक में कमाए संपति से मौज उड़ा रहे है। इन सबका कारण है हमारा संविधान जो कि बहुविधान है, आतंकवादी अलगाववादी, लिबरल के साथ साथ इन नेताओं को विशेषाधिकार मिल जाये तो क्या ये लोग शांति पाठ करेंगे।
जब जनता ही समझदार नही है तो संसद में चुने हुए प्रतिनिधियों से क्या शिकायत करे हम। प्रतिनिधी अपनी बात रखे इसलिए संसद बनाया गया है, उसके आधार पर समाजहित में फैसला लिया जा सके। जिस पर सरकार जनता के टैक्स में दिए गए करोड़ रुपये घंटे के हिसाब से करती है। सांसद को चाहिए कि वहाँ पर पहले सूने और अपनी बारी आने पर बात रखे। अगर मौका नही मिलता है तो बात रखने के लिए मिडिया मौजूद है। लेकिन सांसद जिस प्रकार की हरकत लोकतंत्र की मंदिर में करने लगे है वह बेहद ही शर्मनाक है।
सरकार को चाहिए कि अब संसद भी आनलाईन ही रखे, ताकि ऐसे सांसद अपने घर में उछले कूदे और खिड़की के शीशा बर्तन तोड़े। वाकआउट करने के लिए लागआउट करे। निश्चित तौर पर इससे देश के पैसे भी बचेंगे और देश के छवि भी खराब नही होगा। या फिर एक विशेष कानून बनाकर ऐसे सांसदो को 6 साल के लिए जेल भेजने की व्यवस्था हो।
सबसे बड़ी जिम्मेदारी जनता की है। उसे चाहिए कि उसे अपराधि ,और माफिया किस्म के लोगों को संसद भंजने से बचना चाहिए। जो आपको लालच दिया जा रहा है वह तो आपका ही कमाई है जिसे ये नेता और उसके बच्चे लूटकर ऐश मौज कर रहा है।
देश को लालबहादूर शास्त्री जैसे कर्मठ ईमानदार और सरदार पटेल की तरह पराक्रमी निर्डर हो। जनता को नशेरी गजेरी टिकट ब्लैकियर को संसद भेजने से बचना चाहिए। लोकतंत्र में सबका हिस्सेदारी जरूरी है। आप जैसा समाज बनायेंगे आपके बच्चों को वैसा ही समाज मिलेगा। संसद में रेपिस्ट अपराधी लोग आ गए है इसका कारण है कमजोर कानून। कानून बदलने की मांग सरकार से कीजिए। देश में संविधान की व्यवस्था की जानी चाहिए न कि बहुविधान की।

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