तिलक-दहेज

बैठकी
हाँ त भाई लोगन, अब गाँव के वैवाहिक कार्यक्रम आउर शहर के वैवाहिक कार्यक्रम में बड़ा कम अंतर रही गईल बा |पहले गाँव में बराती भा गोतिया चाहे हित- नाता के जमीन प चटाई बिछा के, खिआवल जात रहे बाकि अब, टेबल कुर्सी ना त शहर लेखा बुफे सिस्टम चलता– मुखियाजी, बैठते ही शुरू हो गये |

लिजिये! पहले दयाद, गोतिया बेटी वाले के यहाँ नेवता देकर चले जाते थे लेकिन अब उनके लिए भी नास्ता, भोजन की व्यवस्था करनी होती है | लोग नये नये खर्चिले सिस्टम को अपनाते चले जा रहे हैं | —- सुरेन्द्र भाई साथ दिये |

ओर ये सब नये सिस्टम, स्टेटस सिंबल बन जाता है—कुंवरजी गर्दन हिलाये |

बेटी चाय का ट्रे रख गयी और हमलोग एक एक कप उठा लिये |

समाज में बढ़ी अपेक्षायें भी तिलक दहेज में बढ़ौतरी का कारण बनता जा रहा है | लोगों की पहली पसंद, सरकारी नौकरी वाला वर के चुनाव की, हो गई है जबकि प्राइवेट सेक्टर में अच्छे लड़के और परिवार उपलब्ध रहते हैं | सरकारी वाला उसके स्टेट्स में नहीं मिल सकता फिर भी!! क्या कहा जाय ! वैसे भी अब सरकारी नौकरी मिलती हीं बहुत कम है ! अगर सरकारी नौकरी वाला लडका है भी तो कई ग्राहक दौड़ते हैं फिर तो तिलक दहेज उसके मापदंड में जुड़ना स्वभाविक है ! उत्पादन कम और मांग अधिक फिर तो….—सुरेंद्र भाई जैसे आपबीती कह रहे हों |

दर असल बेटी वाला हो या बेटा वाला, हमलोगों की अपेक्षायें बहुत बढ़ गई हैं | बेटी वाले को समतुल्य पसंद नहीं आता, श्रैष्ठ के चक्कर में पड़ा रहता है | तो तिलक दहेज का सामना करना हीं पड़ेगा!! — कुंवरजी अखबार पलटते हुए | पुनः –“लिजिये दहेज उत्पीड़न के केस का समाचार छपा है”–!

आजकल ये आम हो गया है, किसी कारण नवविवाहिता की मृत्यु हो जाती है तो वरपक्ष वालों की सांसें थम जाती है कि कहीं उसपर दहेज उत्पीड़न का केस न हो जाये!—- मास्टर साहब नेताजी की ओर देखे |

ऐसा नहीं है कि सभी झूठे केस हीं होते हैं | सामान्य रूप से बहु अपने मायके के संपर्क में रहती है | यदि तिलक दहेज की वजह से प्रताड़ित होती है और हत्या या आत्महत्या होती है तो निश्चय हीं समाज के लिए ये कलंक है और दोषियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए |—नेताजी दुखी दिखे |

मेरे विचार से दोनों हीं परिस्थितियां खेद जनक हैं, वरपक्ष द्वारा बहु का उत्पीड़न करना, या निर्दोष वरपक्ष को डावरी एक्ट में फंसाना |कभी कभी तो ये भी देखा गया है कि सामान्य परिस्थिति में या वरपक्ष का मृत्यु में कोई हाथ नहीं होता, वे भी समान रूप से दुखी होते हैं तथापि लड़की वाले डावरी एक्ट में फंसाने की धमकी देकर ब्लैकमेल करते हैं— सुरेन्द्र भाई चुप्पी तोड़े |

कुछ भी हो बेटे वाले को तो समझना हीं चाहिए कि बेटी वाला, बेटी को जन्म दिया, पोषा- पाला, शिक्षा- संस्कार दिया और जब सयानी हुई तो बेटे वाले को सौंप देता है जो उसका घर संभालती है, वंश बढ़ाती है– कुंवरजी, के चेहरे पर बेचारगी दिखी |

प्रोफेसर साहब, दिनों दिन तिलक बढ़ते जाता काहें!! तब, जबकि लड़कीन के जनसंख्या कम होखल जाता आ कठोर कानून बा बाकि केवनो असर नईखे—! मुखियाजी मेरी ओर मुखातिब थे |

मुखियाजी, हमारी बैठकी से जो तथ्य सामने आये उसके अनुसार, तिलक दहेज के पिछे कई कारण हैं जैसे– पुरुष प्रधान समाज,स्त्रियों की नीची सामाजिक प्रस्थिति ( सोसल स्टेट्स), पुरुषों पर आर्थिक निर्भरता, स्त्री शिक्षा,प्रथा की विवशता, प्रतिष्ठा का प्रतीक, लालच, खर्चिली वैवाहिक प्रक्रिया, ऊंची अपेक्षायें, प्रसंग समूह व्यवहार अर्थात देखा- देखी, आदि |=== मैं ठहरा |

तब इ दहेज विरोधी कानून काहे ला बनल हय! खाली छोटके आदमी लिये!!! इ देश में बड़का,बड़का पहुँच वाले के विआह में करोड़ों करोड़ खर्चा होता, लाखों लाख, गिफ्ट के नाम प दहेज दिहल आ लिहल जाता उ, कानून के नईखे लउकत | मंत्री,नेता,आईएएस, जज लोग, भाग लेता लेकिन केवनो एक्शन ना! इहे सब नु देखा देखी, नीचहुं वाला नकल करेला |— मुखियाजी व्यथित लगे |

मुखियाजी, दहेज विरोधी कानून के दायरे में,लेने वाले और देने वाले , दोनों आते हैं जो सरासर गलत है | सिर्फ लेने वालों पर लागू होना चाहिए क्योंकि बेटी कुंवारी रखेगा नहीं और बगैर तिलक दहेज दिये विवाह होगा नहीं ! यदि तिलक दहेज देकर विवाह कर दिया तो फिर इसकी शिकायत करने जायेगा नहीं ! क्योंकि बेटी का जीवन बर्बाद हो जायेगा |== मैं ठहरा |

प्रोफेसर साहब, तो इसका निदान क्या है!! — नेताजी प्रश्न किये |

नेताजी, वैसे तो बुद्धिजीवियों द्वारा कई सुझाव दिये जाते हैं जैसे– स्त्री शिक्षा, स्त्री स्वावलंबन, सामाजिक जागरुकता, आदि | तिलक दहेज के विरुद्ध कठोर कानून भी है लेकिन उपरोक्त वर्णित कारकों जैसे- वैवाहिक खर्च , ऊंची अपेक्षा आदि के निवारण के साथ साथ मूख्य तथ्य समाजिक है | चूकि तिलक दहेज एक सामाजिक समस्या है कानूनी नहीं, इसलिये इसका निदान भी समाजिक स्तर पर हीं संभव है | सामाजिक जागरुकता इस संदर्भ में होनी चाहिए कि ऐसे विवाह का जिसमें वरपक्ष, तिलक दहेज लिया हो, उसके भाई-गोतिया सामाजिक बहिष्कार शुरू कर दें! जिस विवाह में लाखों का गिफ्ट लिया, दिया जाता हो वैसे समारोह का बहिष्कार शुरू किया जाय और आलोचना की जाय! यदि तिलक दहेज लेना सामाजिक आलोचना का विषय बन जाय तो इस प्रथा को दम तोड़ते समय नहीं लगेगा | तिलक दहेज प्रेमी का बहिष्कार करने हेतु सरकारी एजेंसियों द्वारा प्रचार- प्रसार किया जाय तथा बगैर तिलक दहेज के होने वाले विवाह को पुरस्कृत करने एवं सामाजिक सम्मान प्रदान की जाय |
आज बदलते परिवेश ने काफी हद तक, तिलक दहेज प्रथा को,प्रभावित किया है और अधिकांश बुद्धिजीवी वर्ग, वैवाहिक प्रक्रिया में आपसी सहमति एवं सहयोग से काम ले रहे हैं और परिवार के अनुकूल बहु को प्रश्रय देते हैं | आशा है कि भविष्य में लोग तिलक दहेज की अपेक्षा योग्य बहु को प्राथमिकता देंगे तथापि ये प्रथा हमारे हिन्दू समाज को प्रताड़ित तो कर हीं रही है |—- में चुप हुआ |

कुंवरजी यह कहते हुए उठ गये और बैठकी भी…–“चलिये अब चला जाय! ईश्वर करें ,हम अपनी सनातन संस्कृति के अनुरूप स्त्रियों का सम्मान करना आरम्भ करें और हमेशा याद रखें– यस्य पूज्यंते नार्यस्तु, रमन्ते तत्र देवता: !!”
शुभम् शुभम्,

प्रोफेसर राजेन्द्र पाठक (समाजशास्त्री), बक्सर, बिहार

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