मानव प्रकृति के लिए खतरा है ?

आज चरो तरफ मानव में त्राहिमान मचा हुआ है, या कहे कि मानव अपने जीवन बचाने के लिए भाग रहा है। लेकिन सत्य यह नही कि मानव के लिए आज खतरा है। सत्य यह है कि मानव प्रकृति केे लिए खतरा है। मानव एक बुद्धिजीवी प्राणी होने के बावजूद अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करता दिख रहा है। प्रकृति तो अपना संतुलन समय समय पर बना लेती है, लेकिन मानव अपने जीवन को संतुलित करने के बजाय भोग विलास को अपने जीवन का परम उद्देश्य बना लिया है। यही कारण है कि मनुष्य जिस पर प्रकृति बचाने की जिम्मेदारी है वो स्वयं ही प्रकृति के लिए विनाशक है।

मानव अपना धर्म भूलकर गुटों में बट चुका है। प्रकृति के जीवन चक्र को स्वीकार करने के बजाय उसके विपरित कार्य में जुट गया है। मनुष्य अपने स्वार्थ और स्वाद के लिए जानवरों तथा पशु पक्षियों को अपना शिकार बना रहा है। जबकि मनुष्य को प्राकृतिक रूप से शाकहारी बनाया गया है। उसका ढांचागत विकास शाकहारी है। लेकिन आज मनुष्य के एक वर्ग इसका सबसे बड़ा भक्षक बना हुआ है, वह भी मजहब के नाम पर । भला धर्म ने कब कहा है कि मानव अपने पेट भरने के लिए किसी का वध करे।

मनुष्य का विकास माडल उसके स्वयं के लिए प्राण घातक बनता जा रहा है। आज के परिस्थिति को देखे। हर तरफ से सरकार से आक्सीजन की मांग की जा रही है। पहली बार पता चल रहा है कि मनुष्य के सांस भी सरकार के भरोसे ही चल रहे है। सरकार चाहे तो सिलेण्डर दे या नही दे। जबकि आक्सीजन तो वायुमंडल में फ्रि है। लेकिन लोगों को फ्रि की सांस मिले इसकी व्यवस्था भी सरकार को करनी है। कुछ दिनों बाद पता चलेगा कि आक्सीजन घोटाला भी हो गया है। फिलहाल जनता को सांस कैसे मिले इसकी व्यवस्था सरकार करने में लगी है। योगी ने तीन प्लांट लगवा दिया है। उससे सिलेण्डर भरकर लोगो के पेट तक पहुँचाने की जिम्मेदारी है। क्योंकि लोगों ने वोट दिया है। लेकिन सबसे बड़ी बात है कि शोर वो लोग ज्यादा मचा रहे है जिसने वोट नही दिया। लोकतंत्र है यहाँ अफवाह फैलाना तो मौलिक अधिकारों में शामिल है।

सनातन धर्म और वेद-पुराण में मनुष्य के लिए काफी कुछ है। लेकिन मनुष्यों ने इसका विरोध करके आज अपने ही जीवन के लिए संकट खड़ा कर लिया है। हजारों वर्षों से पीपल, वटवृक्ष, तुलसी, नीम जैसी पेड़ो को पूजा किया जाता रहा है। यह पूजा मनुष्य के जीवन को बचाने के लिए हमेशा कारगर रहा है। पीपल का पेड़ सबसे ज्यादा ऑक्सीजन देता है। वटवृक्ष भी भारी मात्रा में आक्सीजन का उत्सर्जन करता है। तुलसी का पेड़ हमेशा मनुष्य के लिए आक्सीजन के साथ-साथ औषधीय भी है। तुलसी के पत्ते और बीज कई बिमारियों में काम आते है। जिसके लिए वर्षों से तुलसी की पूजा को पूजा जाता रहा है। आज हम अपने घरों में एयर प्यूरिफाइर लगा रहे है। लेकिन नीम का पेड़ जो कि वातावरण को साफ रखता है।

सनातन धर्म और संस्कृति

,सनातन धर्म मंदिर में प्रकृति पूजन का महत्व हमेशा से रहा है। आप छोटे-से-छोटे मंदिर में जाईये वहाँ पर आपको तुलसी का पौधा देखने को अवश्य मिलेगा। सनातन धर्म में तुलसी पूजा का विधान है। तुलसी का पौधा आपको 24×7 आक्सीजन प्रदान करता है। छोटा सा पौधा मनुष्य के लिए कितना उपयोगी होगा, इसका वर्णन आज से हजारों वर्ष पहले ऋषि मुनियों ने हमारे वेद पुराण में समायोजित किया। शायद हमारे ऋषि मुनियों को आज से हजारों वर्ष पहले इस बात का अनुभव था कि एक दिन मनुष्य को इसकी जरूरत पड़ेगी। इस छोटे से पौधे को घर के किसी कोने में लगाकर आप घर का आक्सीजन लेवल मैंटेन कर सकते है।

तुलसी के इसी महत्व को सनातन धर्म के विभिन्न ग्रंथो में हमारे ऋषि मुनियों ने समायोजित किया है। उसे धर्म का स्वरूप बनाकर पूजने की परंपरा स्थापित किया । यही कारण है कि यह सनातन धर्म में एक आस्था का केन्द्र बना हुआ है।

आज के परिस्थिति में तुलसीदास के इस दोहे से भी समझा जा सकता है।

काम क्रोध मद लोभ की. जौ लौ मन में खान।।

तौ लौ पंडित मूरखों , तुलसी एक समान।।

गोस्वामी तुलसीदास नें आम मनुष्य को समझाते है, कि जब मनुष्य किसी व्यक्ति पर काम क्रोध यानि कामेन्छा , क्रोध यानि गुस्सा, अहंकार और लालच हावी हो जाए तो पढ़ा लिका और समझदार व्यक्ति भी अनपढ़ों के समान व्यवहार करने लगता है।

आज यही सत्य है हम सबके सामने है। पढे लिखे और समझदार लोग, लोगों को समाधान बताने के बजाय अफवाहों को बढावा दे रहे है। सिर्फ अपने वोट बैंक बढ़ाने और अपने टीआरपी के लिए सनातन धर्म और उनके संस्कारों को विरोध किया जा रहा है।

अगर सनातन और वैदिक धर्म के अनुसार चले तो मनुष्य के लिए हर समस्या का समाधान मिल सकता है। मंदिर जहाँ भी है वहाँ हर संभव कोशिस होती है कि पेड़ लगाया जाय। छोटे से छोटे मंदिर में भी आपको तुलसी का पौधा अवश्य मिलेगा। इसके अलावा तरह तरह के फूलों से भी मंदिर को सुगंधित रखने का प्रयास किया जाता है और इसके लिए फूल लगाए जाते है। अगर मंदिर के पास जगह हो तो वहाँ पर पीपल और नीम का पेड़ भी लगाया जाता है। इसके अलावा वट वृक्ष भी लगाये जाते है।

जाने अनजाने में हम जिसे पूजते रहे है वह सभी सांस प्रदायनी, जीवन दायिनी है। जिसे सनातन संस्कृति ने आज तक संभालकर रखा है।

इसके अलावा आप और किसी भी गुरुद्वारा में जाईये या चर्च में वहाँ पर पेड़ और प्रकृति की प्रधानता और उसके महत्व को इतना स्थान नही दिया गया है। अगर आप मस्जिद में जाईये तो वहाँ तो यह प्रयास किया जाता है कि अधिक से अधिक नमाज पढ़ने वाले आ सके। उनके यहाँ प्रकृति की रक्षा या महत्व बिल्कुल नही है।

आज यही कारण है कि मनुष्य को सांस लेने के लिए भी अप्राकृतिक रूप से प्लांट लगाने पर रहे है। सांस भी अब सरकार के भरोसे रहा है। क्योंकि हम लोगों को सांस तो चाहिए लेकिन पेड़ नही लगाते है। पेड़ लगाने के बजाय एयरकंडीशन लगाते है। अब यह सोचना है कि एयर कंडीशन मे हवा कहाँ से आयेगा। इसलिए पेड़ लगाईये एयर कंडीशन नही।

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