फिलहाल चुनाव है, घर खरीदारों की बात बाद में करेंगे

समाज जागरण नोएडा

सिर पर चुनाव है और पूरा नोएडा शहर अवैध विज्ञापन से भरे पड़े है। खैर मै चाहे ये करूँ , मै चाहे वो करूँ मेरी मर्जी। नेताजी के बैनर लगे है स्मार्ट सिटी नोएडा में अवश्य ही रैंकिंग में और सुधार आने की उम्मीद है। प्राधिकरण तो मस्त मौला है क्यों पूछे यह किसका विज्ञापन है और इसके लिए परमिशन लिये गए है या नही। ठेली पटरी मिल जाये और वहाँ से उनको कुछ न मिले जेसीबी लेकर पहुँच जायेंगे। सेक्टर 50 का मामला तो आपने सुना ही होगा। पन्नी के चालान काटने प्राधिकण और उनके एनजीओ वाले जेसीबी लेकर पहुँच गए। यह तो प्राधिकरण के पास अधिकार सुरक्षित है कि नेताओं के लिए क्या करना है और गरीब ठेली पटरी वालों के लिए क्या करना है।

मै रास्ते से भटककर प्राधिकरण और नेताजी के तारिफ करने लगा।

मै यहाँ बात कर रहा हूँ चुनाव राजनीति और घर खरीदार। हम सभी जानते है कि आज चुनाव आयोग चुनाव की तिथियों के बारे में घोषणा करने वाले है। निश्चित तौर से दलबदल के दल-दल में फंसे भारतीय राजनीतिक के लिए काफी ज्यादा उत्सुकता होगी कि यह जानने कि तारीख क्या होगी। मै यहाँ न्यायालय में न्याय की मांग करने वाले को मिलने वाली तारीखों की बात नही कर रहा हूँ वहाँ तो तारीख पर तारीख मिलते रहते है। आज चुनाव आयोग यह बताने वाले है कि हम लोग फ्रि के स्कूटी के लिए, फ्रि के बिजली और पानी के लिए, फ्रि के मकान के लिए। हर महीने अकाउण्ट में मिलने वाले रुपयों के लिए। बिजली पर 50 प्रतिशत के छुट के लिए वोटिंग कब करने वाले है। हमारे सोच की निकम्मेपन में भारतीय लोकतंत्र के लिए क्या रखा है। बस इतना देखना है कि सबसे ज्यादा फ्रि कौन देने का वादा किया है। हमे रोजगार चाहिए नही और देश को हम कुछ देना चाहते नही है। खैर चिंता मत कीजिए अब राजनीतिक पार्टियाँ भी आपको दारू और मुर्गे के लिए पैसे 1 नंबर में दे रही है, अकाउण्ट में।

इसी देश में एक वर्ग घर खरीदारों की है, सिर्फ दिल्ली एनसीआर में दशकों से सैकड़ों प्रोजेक्ट लटके हुए है और बिल्डर दिवालिया हो चुके है। हाल ही में सीएजी के रिपोर्ट में हुए खुलासे के बाद भी सरकार इस पर कोई ठोस कदम नही उठा रही है। बहुत सारे बिल्डर ग्राहकों को लुभावने स्कीम बताकर फंसाने में लगे है। बता दे कि नोएडा में सिर्फ एक ही टवीन टावर नही है जांच हो तो सैकड़ो टवीन टावर निकलेंगे।

शायद अभी यह बात करना ठीक नही होगा क्योंकि सरकारे कुछ कर नही सकती क्योंकि चुनाव आयोग ने आचार संहिता लागू कर दिया है। घर खरीदारों को घर देना कोई परियोजना तो है नही, जो चार दिन पहले शिलान्यास कर दिया जाता और जनता को उपहार देने के नाम पर कोरोड़ो के विज्ञापन लगा दिये जाते। यह मामला घर खरीदारों के सपनों के घर का है जो दस साल से मारे मारे फिर रहे है। अपने खुन पसीने की कमाई लूटाने के बाद भी किराये के घर में रहने को मजबूर है। एक तरफ घर का किराया और दूसरे तरफ बिल्डरों के जेब में गए पैसों का ईएमआई का बोझ तले दबे घऱ खरीदारों की बात तो हम चुनाव बाद ही करेंगे।

इनसे क्या फर्क पड़ता है किसी भी पार्टी को ज्यादातर घर खरीदार ऐसे है जिनके पास वोट बैंक नही है। जब इनकों घर मिलेंगे तो इनका वोट बैंक बनेगा। फिलहाल तो इनका वोट बाहर का ही होगा। जहाँ का है वहाँ के नेता जाने। फिलहाल चुनाव तो यूपी में है। थोड़ा बहुत है भी तो रेजिडेंट वेलफेयर वाले मैनेज कर ही लेंगे। फिलहाल तो बिल्डर का सोचना है आखिर चुनाव के लिए जो फंड चाहिए वो जनता थोड़े ही दे रही है। जनता तो खुद ही फ्रि के आस में बैठी है। भले ही 70 की पेट्रोल 100 की मिले, लेकिन जनता को तो रोज आने वाली पानी के 10 रुपये वाली बिल फ्रि चाहिए। भले ही 18 रुपये गेंहूं कि आटा 32 रुपये किलो मिले लेकिन उनकों तो बिजली फ्रि चाहिए।

Please follow and like us:
%d bloggers like this: