गजब की राजनीतिक विचाराधारा है भाई, एक तरफ फ्री दूसरी तरफ लूट

दैनिक समाज जागरण

देश में गजब की विचारधारा है भाई, किसी को फ्रि पर फ्रि और किसी को उसका मूल भी नही लौटाया जा रहा है। एक तरफ लाखो घर खरीदार दशकों से अपने लिए एक सुन्दर सा सपना संजोए बैठे है। अपने मेहनत के कमाई बिल्डर और उसके प्रमोटर्स को दिये हुए है। लेकिन कोई उसे उसके सपनों के घर लौटाने को तैयार नही है। कोई उसके बारे में बोलने को तैयार नही है। जो बोल रहा है वह भी अपना ही राजनीतिक रोटी में घी लगाने की काम कर रहा है। कोई इनके चेहरे पर मुस्कान लौटाने के तैयार नही।

दूसरी तरफ चुनाव आने से पहले फ्रि की होड़ लगी हुई है। कोई बिजली फ्री दे रहा है तो कोई पानी। कोई स्कूटी देने का वादा किया तो किसी नें लैपटाप देने का। भाई कोई ये तो बता दो इन मुफ्तखोरी बढावा देने वाले नेताओं को क्या रहने के लिए घर चाहिए या नही। देश के प्रधानमंत्री आवास योजना मे घर तो दिया जा रहा है मुफ्त में, लेकिन जिन घर खरीदारों नें पैसे दिये हुए है उनका घर क्यों नही मिल रहा है। ऐसा तो नही उन्ही पैसों से ये घर फ्रि में बांटे जा रहे हो। कोई ये तो बता दो कि उन घर खरीदारों का गुनाह क्या है ? शायद यही गुनाह है कि उसने दिल्ली एनसीआर मे अपना एक आशियाना लेने के लिए सोचा और बिल्डर को अपने जीवन भर के कमाई दे दिया। बदले मे उसे क्या मिला ? बदले में उसे मिला नेताओं के दावे, और बिल्डर के वादे। बैंक की ईएमआई और फिर मकान किराया तो भरना ही पड़ता है अन्यथा मकान मालिक को तो जानते ही है —-

अपने ही पैसे देने के बाद घर खरीदारों को रेरा के सामने पेश होना पड़ता है, अपने ही पैसों के लिए घर खरीदारों को सुप्रीम कोर्ट के दरवाजा खटखटाना पड़ता है। लेकिन क्या उनको न्याय मिला है? इस देश में मुफ्तखोरों को जितना तब्बजों दिये जा रहे है उसका 1 प्रतिशत भी तब्बजों टैक्सपेयर को दिया जाता तो देश कहाँ से कहाँ पहुँच गया हो। टैक्सपेयर को नही दिया जाता है क्योंकि उनका कोई एसोसिएशन नही है, उनके पास में वोट नही है। वोट है भी तो वोटिंग करने के बजाय वह लोग सिर्फ समाचार देखना ही पसंद करते है। अगर इनका भी कोई एसोसिएशन होता तो शायद इनसे भी पूछा जाता कि क्या फ्रि बांटा जाया और क्या नही। इनके पैसे से चलने वाली सरकार आज इनका ही नही सुन रही है। टैक्स देना कर्तव्य है तो सुविधा पाना उनका अधिकार भी है। पहले डाकु लूटता था और राजनीतिक पार्टी लूट रहा है। गरीबी मिटाने के नाम पर सिर्फ परिवारवाद ही विकसित किये गए है। राजनीतिक को अपना पुस्तैनी जायदाद समझ लिया है, अपने बाद अपने ही बेटे को सौप कर जाते है क्योंकि पैसे बहुत है राजनीति में आजकल।

दिल्ली एनसीआर में लाखों घर खरीदार दशकों से अपने घर के लिए मारे मारे फिर रहे है। किसी पार्टी नें भी इनका संज्ञान नही लिया है। ले भी तो कैसे आखिर राजनीतिक चंदा जो ले रखा है। जिनको घर देना उनको कोई पूछ नही रहा है, जो फ्रि में लेने वाला है उनको चाभी पकड़ाया जा रहा है। लाखों घर खरीदारों नें अरबों का टैक्स दिया होगा। लेकिन उनका क्या हक है कि सड़क पर उतरकर धरना प्रदर्शन करे, किसी का सड़क जाम करे ? किसी को घर नही मिला हो तो किसी को मालिकाना हक नही मिला है। मिला है तो बस उनको जिल्लत की जिंदगी। कभी मैंटेनेंस के नाम पर बिल्डर की दादागिरी तो कभी पोजीशन मांगने पर पीटाई। कहावत सुना था कि अंधेर गाय की राम रखवार होता है, लेकिन यह तो सिर्फ कहावत ही है।

फ्रि मे बाटों योजना का शुभारम्भ हो चुका है क्योंकि राजनीतिक अब समाज सेवा नही शुद्ध व्यापार है। कैसे भी एक बार जनता से वोट डलवा ले बस 5 साल तक लूटने का मौका मिलेगा। नेता तो देखते देखते ही करोड़पति और जनता फिर से बिजली बिल माफ करवाने वाली कतार में। अगली बार चुनाव में नेताजी 400 युनिट फ्रि कर देंगे। चुनाव से पहले कन्वर्टेड बहन जी, लोगों को स्कूटी देने की घोषणा करती है यह जानते हुए कि वर्तमान सरकार मे पेट्रोल बहुत महंगा है। जानती है सरकार आ जा बस पेट्रोल के पैसे तो अपने ही जेब मे आने वाले है। कोई लैपटाप देने का वादा किया है, लेकिन जिनके पास में लैपटाप है उनको घर नही दिया जा रहा है।

अगर ये सारा वादा चुनाव से पहले ही पूरा कर लिया जाय तो कैसे रहेगा। बिजली पानी वाले चुनाव से पहले एक साल की बिजली पानी के बिल दे दे, स्कूटी वाले को एक साल की पेट्रोल की पैसे, लैपटाप वाले लैपटाॅप दे दे। ताकि जनता को कोई कन्फ्यूजन न रहे। लेकिन ऐसे नही करेंगे, क्योंकि इनको भी तो फ्रि बांटने के नाम पर बड़ा घोटाला करना है, जिसनें चंदा दिया है उनको टैंडर देकर उनको फायदा पहुँचाना है। आज तक ऐसा ही तो होता आ रहा है।

मैने जग की अजब तस्वीर दैखी, फ्रि के खाने वाले हस्ता है और मेहनत के खाने वाले रोता है।
हमे हँसते मुखड़े चार मिले,
दुखियारे चेहरे हज़ार मिले,
यहाँ सुख से सौ गुनी पीड़ देखी,
एक हँसता है दस रोते हैं,
हमने जग की अजब तसवीर देखी,
एक हँसता है दस रोते हैं

दो एक सुखी यहाँ लाखों में
आंसू है करोड़ों आँखों में
हमने गिन गिन हर तकदीर देखी
एक हँसता है दस रोते हैं
हमने जग की अजब तसवीर देखी
एक हँसता है दस रोते हैं

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