शही भगत सिंह सेना ने अपने आदर्श शहीद भगत सिंह के114वे जन्मदिवस पर एक पैदल मार्च निकाला

नोएडा 28 सितंबर 2021 समाज जागरण

युवा दिलों की धड़कन और प्रेरणा स्रोत अमर बलिदानी शहीद भगत सिंह के जन्मदिवस पर शहीद भगत सिंह सेना नें पैदल मार्चा निकाला। भगत सिंह ने जिस प्रकार से राष्ट्र को यह संकेत दिया आज उसी पथ पर देश के करोड़ों युवा अपने देश समाज व राष्ट्र धर्म के हित में उठकर खड़े होकर चलने के लिए तैयार है। राष्ट्र के महान सपूत नें न सिर्फ युवाओं संकेत दिया बल्कि उनको राष्ट्र के दुश्मनों से लड़ना भी सिखाया। देश आज अपने हीरो को याद कर रहा है, शहीद भगत सिंह की आज जयंती है. इस मौके पर लोगों द्वारा भगत सिंह को श्रद्धांजलि दी जा रही है. शहीद भगत सिंह पार्क सेक्टर 31निठारी नॉएडा गौतमबुद्धनगर कार्यक्रम का आयोजन किया गया।।

भगतसिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907[1] को पंजाब के ज़िला लायलपुर में बंगा गाँव (पाकिस्तान) में हुआ था, एक देशभक्त सिक्ख परिवार में हुआ था, जिसका अनुकूल प्रभाव उन पर पड़ा था। भगतसिंह के पिता ‘सरदार किशन सिंह’ एवं उनके दो चाचा ‘अजीतसिंह’ तथा ‘स्वर्णसिंह’ अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ होने के कारण जेल में बन्द थे। जिस दिन भगतसिंह पैदा हुए उनके पिता एवं चाचा को जेल से रिहा किया गया। इस शुभ घड़ी के अवसर पर भगतसिंह के घर में खुशी और भी बढ़ गयी थी । भगतसिंह की दादी ने बच्चे का नाम ‘भागां वाला’ (अच्छे भाग्य वाला) रखा। बाद में उन्हें ‘भगतसिंह’ कहा जाने लगा। वे 14 वर्ष की आयु से ही पंजाब की क्रान्तिकारी संस्थाओं में कार्य करने लगे थे। डी.ए.वी. स्कूल से उन्होंने नवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1923 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद उन्हें विवाह बन्धन में बाँधने की तैयारियाँ होने लगीं तो वे लाहौर से भागकर कानपुर आ गये।

गंभीर विचार-विमर्श के पश्चात् 8 अप्रैल 1929 का दिन असेंबली में बम फेंकने के लिए तय हुआ और इस कार्य के लिए भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त निश्चित हुए। यद्यपि असेंबली के बहुत से सदस्य इस दमनकारी क़ानून के विरुद्ध थे तथापि वायसराय इसे अपने विशेषाधिकार से पास करना चाहता था। इसलिए यही तय हुआ कि जब वायसराय पब्लिक सेफ्टी बिल को क़ानून बनाने के लिए प्रस्तुत करे, ठीक उसी समय धमाका किया जाए और ऐसा ही किया भी गया। जैसे ही बिल संबंधी घोषणा की गई तभी भगत सिंह ने बम फेंका। इसके पश्चात् क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करने का दौर चला। भगत सिंह और बटुकेश्र्वर दत्त को आजीवन कारावास मिला।

भगत सिंह और उनके साथियों पर ‘लाहौर षड़यंत्र’ का मुक़दमा भी जेल में रहते ही चला। भागे हुए क्रांतिकारियों में प्रमुख राजगुरु पूना से गिरफ़्तार करके लाए गए। अंत में अदालत ने वही फैसला दिया, जिसकी पहले से ही उम्मीद थी। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को मृत्युदंड की सज़ा मिली।

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