मज़दूरों के अभाव गायब हो चुकी है मकनपुर की सुस्वादु हरी ककड़ी एवं सब्जियां।

मार्च के अंतिम या अप्रैल के प्रथम सप्ताह से बाजार में उपलब्ध हो जाती थी ककड़ी।
वारिसलीगंज (नवादा) (अभय कुमार रंजन):-शरीर की पोषण के लिए हरे फलों एवं सब्जियों को स्वास्थ्यवर्धक बताया गया है। जिसमें ताजी हरी ककड़ी स्वाद एवं पौष्टिकता से भरपूर होती है। एक दशक पहले तक प्रखंड के मकनपुर गांव के किसान स्थानीय बाजार को हरी ककड़ी एवं सब्जियों को प्रचुर मात्रा में उपलब्ध करवाते थे। परंतु मज़दूरों के पलायन से उक्त गांव का प्रसिद्ध ककड़ी बाजार से लगभग गायब हो चुकी है। मकनपुर की ककड़ी का स्थान अब लखीसराय जिले के दियारा क्षेत्र में उत्पादित ककड़ी ले रही है। पौष्टिकता से भरपूर तथा गर्मी के दिनों में लू के दौरान शरीर में होने वाले पानी की कमी को दूर करने में ककड़ी एक सस्ता एवं सुलभ मिल जाने वाला खाद्य फल होता था। जबकि गरीब मज़दूरों को गर्मी के नगदी आमदनी का स्रोत ककड़ी एवं सब्जियां होती थी। लेकिन मज़दूरों के पलायन से ककड़ी एवं सब्जी का उत्पादन लगभग बन्द हो गया है। मकनपुर गांव के किसानों की माने तो पहले गन्ना बिक्री के बाद तथा मिल बन्द होने पर रबी फसलों की बोआई के समय गांव के अधिकांश खेती योग्य भूमि पर ककड़ी एवं सब्जियों का उत्पादन प्रचुर मात्रा में होता था। जो मिहनत मजदूरी करने वाले लोगो के लिए नकदी का स्रोत तथा क्षेत्र के लोगो को सस्ता एवं सुलभ ककड़ी एवं सब्जी मिल जाता था। ककड़ी उत्पादन करने वाले किसान मज़दूर अल सुबह अपने खेत पहुंचकर पहले अपने उत्पाद को तोड़ कर बाजार ले जाते थे। बाद में लौटने पर ककड़ी के फसलों की सिंचाई करने को ले देसी जुगाड़ लट्ठा कुड़ी चलते थे। खेत पर ही उनका भोजन पहुंचाया जाता था। देर शाम तक रखवाली करने के बाद मजदूर रात को सिर्फ सोने के लिए घर जाते थे। लेकिन जब से मजदूरों में दूसरे प्रदेशों के इंट भट्ठों पर पलायन होने लगा धीरे धीरे क्षेत्र (खासकर) मकनपुर से हरी सब्जी एवं ककड़ी की उपज बन्द हो गई।

मार्च के अंतिम या अप्रैल के प्रथम सप्ताह से बाजार में ताजी हरी ककड़ी एवं सब्जियां पहुंच जाती थी। लेकिन उत्पादन बन्द होने से बिक्रेता लखीसराय जिले के दियारा क्षेत्रो में उत्पादित ककड़ियां लाते हैं। जो स्वाद हीन एवं खाने में कड़ा होता है। क्षेत्र में उत्पादित हरी ककड़ी अब लोगो के लिए गुजरे जमाने की बात हो गई है।

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