भारत-विभाजन की पृष्ठ भूमि के साक्षियों की गवाही का ग्रन्थ

मैं सोचता रहा कि भारत-विभाजन की पृष्ठ भूमि के साक्षियों की गवाही का ग्रन्थ क्यों कृष्णानन्द भाईजी ने। अंग्रेजों ने भारत को विभाजित कर पाकिस्तान बनाया और चले गए। जो हो गई, सो हो गई। अब क्यों गड़े मुर्दे उखाड़ना?
तभी मेरे अन्दर का भारत बोल पड़ा—“यह अलख जगाते रहो। तब तक, जब तक मेरा बिछुड़ा हुआ भूभाग (पाकिस्तान व बंगलादेश) फिर से मेरे साथ मिल न जाए, एकरूप न हो जाए। पौन सदी पूर्व घटित विभाजन के घावों को कुरेदते रहो, उन घावों से रिसते रक्त का दर्शन वर्तमान और भावी पीढियों को कराते रहो; ताकि वे मुझे पुनः एक व अखण्ड बनाने के लिए प्रेरित व प्रयत्नशील हों।“
यही वह मुख्य कारण है कि श्री कृष्णानन्द भाईजी ने भारत विभाजन के साक्षी लोगों की आपबीतियों को संकलित किया है और लिखा है।
विभिन्न लोगों ने विभाजन के भिन्न-भिन्न कारण बताए हैं। लेकिन एक अत्यन्त महत्वपूर्ण, किन्तु प्रच्छन्न, कारण मुझे बताया प्रिंस आफ़ सरीला श्री नरेन्द्रसिंह ने। सरीला एक रियासत थी, जो बुन्देलखण्ड में टीकमगढ़ के पास थी। वे उसके प्रिंस थे तथा गवर्नरजनरल लार्ड वेवल व लार्ट माउण्टबैटन के वे ए.डी.सी. रहे थे। इस कारण 1942 से 1948 तक की वाइसराय भवन में घटित घटनाओं के वे स्वयं साक्षी थे।
मेरी उनसे प्रथम भेंट हुई दिसम्बर 1999 में इण्डिया इण्टर नेशनल सेंटर दिल्ली में, जब मैं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की बैठक के लिए दिल्ली आया और सेंटर में ही रुका। वे काफ़ी वृद्ध थे और इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर में ही रहते थे।
उन्होंने बताया कि “दूसरे विश्वयुद्ध के रणनीतिकार भले ही विंस्टन चर्चिल थे, लेकिन युद्ध के हीरो बने अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट। रूजवल्ट ने जापान पर एटम बम गिरा कर एक ओर तो जापान के घुटने टिकवा दिए, दूसरी ओर जापानी साघनों का उपयोग करते ब्रह्मदेश में अंग्रेजी सेना को खदेड़ रही आजाद हिन्द फौज की गति को अवरुद्ध कर दिया। इस प्रकार अमरीका के कारण इंगलैंड युद्ध जीत सका।
“इंगलैंड युद्ध भले ही जीत गया था, लेकिन उसकी शक्ति बहुत क्षीण हो चुकी थी। सुभाषचन्द्र बोस के अद्भुत कारनामों के कारण भारत के लोगों के मनों में से अंग्रेजों का डर विल्कुल समाप्त हो गया था। उल्टे अंग्रेजों को ही यह डर सताने लगा था कि भारत के लोग कहीं चुन-चुन कर अंग्रेजों को ही समाप्त करना न शुरु कर दें। अतः ब्रिटिश प्रधान मन्त्री एटली ने फरवरी 1946 में ही ब्रिटिश संसद में यह घोषणा कर दी कि हम भारत की सत्ता भारत के ही लोगों को सौंप कर वहाँ से निकल जाएँगे।
“युद्ध के उपरान्त अमरीका व इंगलैंड को यह भी चिन्ता लगी कि मध्य-पूर्व के पेट्रोलियम देशों में रूस अपना प्रभाव बढ़ा लेगा। उसके प्रभाव को रोकने व उस पर नियन्त्रण रखने के लिए उन्हें कोई मजबूत खूंटा चाहिए था। वह खूँटा उन्हें भारत का उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र दिखा। इधर मुस्लिम नेताओं द्वारा पाकिस्तान की माँग हो ही रही थी। यह उनके लिए सोने में सुहागा सिद्ध हुआ। इंगलैंड-अमरीका युति ने अपनी गोटियाँ चलनी शुरु कर दीं। एक गोटी जिन्ना था और दूसरी गोटी नेहरू। दोनों ही सत्ताकामी थे। वार्ताओं का सिलसिला शुरु हुआ। क्योंकि भारत पर शासन तो अंग्रेजों का था, इसलिए भारतीय नेताओं से वार्ताएँ अंग्रेज अधिकारी ही करते थे और बाद में इसकी जानकारी ब्रिटिश प्रधानमन्त्री अमरीकी राष्ट्रपति को देते थे।
“माउण्ट बेटन यह जानता था कि जवाहरलाल सत्ता का भूखा है। वह किसी भी कीमत पर सत्ता प्राप्त करना चाहता है। अतः उसे सत्ता सौंपने से पहले उसने भारत का विभाजन स्वीकार करा लिया। साथ ही अन्य भी वे सादी सर्तें मनवा लीं, जो ब्रिटिश-अमरीकी हितों के लिए आवश्यक थीं। जवाहर सत्ता के लिए इतना अंधा हो गया था कि उसने इन शर्तों की भनक सरदार पटेल व गान्धी को भी नहीं लगने दी।“
प्रिंस आफ सरीला ने मुझे एक पत्र भी पढ़ने के लिए दिया, जो किसी टाईप किए पत्र की तीसरी या चौथी प्रति थी। वह काफ़ी घुन्धली थी, तो भी मैं उसे पढ़ सकता था। वह पत्र माऊण्टबेटन द्वारा प्रधान मंत्री एटली को लिखा गया था। उसमें माऊण्टबेटन ने एटली को सीचित किया था कि जवाहरलाल से निम्नलिखित विषयों पर सन्धि (treaty) हो गई है ओंर यह सन्धि 50 साल के लिए है—
1. भारत पाकिस्तान पर आक्रमण कर कभी उसे जीतने की कोशिश नहीं करेगा।
2. पाकिस्तान चाहे तो आक्रमण करके भारत की भूमि जीत सकता है।
3. यदि भारत की सेना रक्षात्मक युद्ध में पाकिस्तान को पीछे खदेड़ कर पाकिस्तान की भूमि पर कब्जा कर लेती है, तो वह भूमि भारत पाकिस्तान को वापिस करेगा।
(ध्यान दें कि 1965 व 1971 के युद्धों में भारत द्वारा जीती हुई भूमि पाकिस्तान को वापिस दी गई।)
4. भारत के मुसलमानों और ईसाइयों का विशेषाधिकार सुरक्षित रखा जाएगा।
5. सुभाषचन्द्र बोस को पकड़ कर भारत ब्रिटेन को सौंपे गा।
6. भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन अधिनायक जय हे, रहेगा।
7. हिन्दी के ऊपर अंग्रेजी की वरीयता रहेगी।
8. संविधान और प्रशाशन-तन्त्र में कोई बड़ा परिर्वतन नहीं होगा।
9. शिक्षा पद्धति नहीं बदली जाएगी।
10. सैन्य विकास पर पाकिस्तान से अधिक खर्च नहीं किया जाएगा, ताकि पाकिस्तान डरे नहीं।
इस प्रकार के 40-50 बिन्दु उस पत्र में थे। शेष मुझे याद नहीं। पत्र के अन्त में लिखा था—“This treaty should be kept secret. It is not to be pullished,”
(उपरोक्त सब मैंने अपनी स्मृति के आधार पर बताया है। शब्दों में अन्तर हो सकता है।)
पत्र पढ़ने के बाद मैंने सरीला को कहा कि विश्वास नहीं होता कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने यह सब स्वीकार किया होगा।
इस पर सरीला मुस्कराए और फिर गम्भीर हो कर बोले—“पहले तो जवाहर लाल को ‘पंडित’ कहन बन्द करो, क्योंकि वह मुसलमान था।“ इसकी पुष्टि में उन्होंने एक प्रसंग बताया—
“जबाहर और माऊण्टबेटन की बातचीत चल रही थी। मैं साथ के ही अपने कक्ष में उनकी वार्ता सुन रहा था। जावाहर जब विभाजन के लिए तैयार नहीं हुआ, तो माऊण्टबेटन ने उसे कहा—‘हमने (अंग्रेजों ने) यहाँ की सत्ता मुसलमानों से ली थी, और अब हम उन्हीं को वापिस देकर चले जाएँगे। हम सत्ता जिन्ना को सौंप देंगे।‘
“मैंने देखा, यह सुनते ही जवाहर का चेहरा फक्क हो गया था। उसे लगा, उसके हाथ से सत्ता गई। थोड़ी देर में वह संभला और बोला—‘Originally I am also a muslim.’ (मूलत: तो मैं भी मुसलमान हूँ।) यह मैने अपने कानों से सुना था।“
प्रिसं सरीला नें अपना कथन चालू रखा—“और जहाँ तक इस पत्र-प्रतिलिपि की प्रामाणिकता की बात है, इसी मूल प्रति भी तुम लंदन की ब्रिट्रिश लायब्रेरी के ‘ओरियण्टल एण्ड इंडियन कलेक्शन खण्ड ‘ के अभिलेखागार में देख सकते हो। वहाँ ब्रिट्रिश प्रधानमन्त्रियों के भारत सम्बन्धी पत्राचारों की फाइलें संचित हैं। भारत सम्बन्धी सूचनाओ को ब्रिट्रिश प्रधानमंत्री अमरीकी राष्ट्रपति से भी साजा करते थे, वह भी उन फाइलों में उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त साउथैम्पटन की हर्टले लायब्रेरी में माउण्टबेटन के पत्राचारों के साभी अभिलेख कियू(kew) के पब्लिक रिकार्ड आफिस में भी प्रदर्शित हैं।
मै वर्ष 2000 में इंग्लैंड गया, तो साउथैम्पटन की हर्टल लायब्रेरी में भी गया। वहाँ मुझे माउण्टबेटन के पत्राचारों की फाइलों में वह मूल पत्र मिल गया, जिसकी प्रतिलिपि प्रिंस सरीला नें दिखायी थी। मै लन्दन की ब्रिटिश लायब्रेरी में भी गया। वहाँ मुझे ब्रिटिश प्रधानमंत्री द्वारा अमरीकी राष्ट्रपति को लिखे पत्रों में वह सब कुछ मिला, जिसका उल्लेख प्रिंस सरीला ने किया था अर्थात ब्रिटिश-अमरीकी दुरभिसाम्धि।
इंगलैंड के बाद मै अमरीका गया तो वहाँ भी वाशिंगटन के अभिलेखागार में वह सारा पत्र-व्यवहार विधमान था।
‘प्रिंस आफ सरीला’ नरेन्द्र सिंह से हुए वार्तालाप तथा लन्दन, साउथैम्पटन एवं वाशिंगटन के अभिलेखागारों के अभिलेखों के आधार पर मै निष्कर्ष रूप में निम्नलिखित बातें कह सकता हूँ—
1 अमरीका ने जापानी हमलों से अपने को बचाने के लिए और आजाद हिन्द फौज के हमलों से इंग्लैंड को बचाने के लिए जापान पर एटम बम फेंका था।
2 आजाद हिन्द फौज भले ही जीत न पायी, किन्तु उससे अंग्रेज इतना डर गए थे कि उन्होंने शीघ्राति-शीघ्र भारत छोड़ देने का निर्णय कर लिया।
3. लेकिन भारत छोड़ने से पहले भारत को इतना दुर्बल बना दिया जाए कि वह भविष्य में ब्रिटेन का कोई नुकसान न कर सके यह सोच कर उन्होंने भारत क दो टुकड़ों में बांटने का निश्च कल लिया।
4. मध्य-पूर्व के देशों में रूस के प्रभाव को रोकने के लिए पश्चिमोतर भारत पर आंगल-अमरीकी प्रभाव रहना आवश्यक है, इसलिए पश्चिमोतर भारत को पाकिस्तान बना दिये जाने का निर्णय कर लिया गया।
5. इसके साथ ही यह विचार किया गया कि शेष भारत की सता किसी ऐसे व्यक्ति को सौपी जाए जो सब प्रकार से ब्रिटिश हितों व ब्रिटिश सम्मान को सुरक्षित रखे। ऐसा व्यक्ति उन्हे जवाहर लाल नेहरू दिखायी दिया और इसलिए वे नेहरू को ही सता सौंप कर गए।
नेहरू को सता मिल गई। सता की पहली शर्त थी भारत का विभाजन। वह उसने स्वीकार किया। किन्तु उसके परिणाम क्या हुए ? भारत का पूर्व और पश्चिम रक्त-रंजित हो उठा। लाखों हिन्दुओं का कत्ले-आम हुआ। हिन्दू ललनाओं का अपहरण हुआ, उनकी अस्मिता लूटी गई। घर-दुकाने जला दी गई। करोड़ों हिन्दुओं को विस्थापन हुआ। सताधारी होने के बावजूद नेहरू ने उनकी रक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की। इसके उलट मुसलमानों की रक्षा के लिए वह निरन्तर प्रयत्नशील रहा। इसके लिए उसने हिन्दुओं पर गोलियाँ तक चलवा दीं। ऐसा क्यो ? क्योंकि वह मुसलमान था। प्रिंस आफ सरीला नें ठीक ही सुना था।
प्रस्तुत ‘विभाजनकालीन भारत के साक्षी’ ग्रन्थ में उस समय के भुक्तभोगी सैकड़ों लोगों की साक्षियाँ संग्रहित है।
यह ग्रन्थ विभाजन पर प्रकाशित अभी तक के सब ग्रन्थों से अलग प्रकार का है। इसकी सामग्री जमीनी स्तर की है और मौलिक है, जो सरकारी दस्तावेजों से इतर है। इसलिए भावी इतिहासकार इस मौलिक सामग्री के आधार पर विभाजन का वास्तविक और सत्य इतिहास को लिख पाएँगे, जो अभी तक लिका नही गया है। बीस वर्षों के परिश्रम का यह प्रतिफल है। लेखक को इसके लिए साधुवाद।

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