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शील और साहस

काफी समय पहले की बात है। वन क्षेत्र के निकट महर्षि बोधायन का आश्रम था। उनके पास अनेक विध्दार्थी अध्ययन के लिए आते थे। महर्षि अपने शिष्यों के सर्वागीण विकास पर विशेष ध्यान देते थे। एक दिन शिष्यों के आग्रह पर महर्षि अपने आश्रम के निकट स्थित एक नदी के तट पर गए। गुरू और शिष्य नदी में बड़ी देर तक तैरते रहे। जब वे थक गए तो तट पर आ गए। फिर एक वृक्ष के नीचे भोजन करके वहीं विश्राम करने लगे। जल्दी ही सबको नींद आ गई और रात बीत गई।
अगले दिन प्रात:काल सबसे पहले महर्षि बोधायन की ही आंख खुली। अन्य शिष्य अभी तक सो रहे थे। तभी उनके नेत्र भय मिश्रित आश्चर्य से फैल गए। उन्होंने देखा कि गार्ग्य नामक एक शिष्य के पैर पर एक काला सांप कुंडली मारकर सो रहा था जबकि गार्ग्य जाग रहा था।
यह दृश्य देखकर महर्षि बोधायन को चिंता हुई। इस पर गार्ग्य ने कहा,” गुरू जी! आप चिंता न करें। जागने पर यह सांप स्वत: चला जाएगा।“
महर्षि प्रतिक्षा करने लगे। कुछ देर बाद सांप जाग गया और झाड़ियों में चला गया। ऐसी विकट स्थिति में भी शांत रहने वाले शिष्य को पाकर महर्षि बोधायन औऱ अन्य सहपाठी प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे गले से लगा लिया। महर्षि ने गार्ग्य को आशीर्वाद देते हुए कहा,” बेटा! तुम्हारा यह शील अक्षय बना रहे।“
पास ही गार्ग्य का एक मित्र मैत्रायण खड़ा था, उसे गुरू का आशीर्वाद समझ में नहीं आया। उसने पूछा,” गुरूदेव! गार्ग्य के व्यवहार मे साहस और दृढ़ता का परिचय मिलता है, फिर आपने शील अक्षुण्ण रहने का आशीर्वाद क्यों दिया?”
महर्षि बोधायन ने कहा,” वत्स मैत्रायण! जिस प्रकार जल का ठोस रूप हिम है, उसी प्रकार शील का घनीभूत रूप साहस, दृढ़ता और धैर्य है। यदि व्यक्ति हर परिस्थिति में अपने शील की रक्षा के प्रति सजग रहे तो वह असाधारण वीरता को विकसित कर सकता है। सामान्यत: शील और धैर्य को वीरता का गुण नहीं माना जाता लेकिन यथार्य यह है कि पराक्रम तथा साहस इन्हीं में बसता है।

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