संवेदना इंसान की पहचान है,संवेदनहीन समाज मुर्दो का टीला है।-मिथीलेश ।

वारिसलीगंज (नवादा) (अभय कुमार रंजन):-साहित्य कल्पना की उड़ान नहीं, यथार्थ की कलात्मक अभिव्यक्ति है। काव्य-लोक समाज को आइना दिखाने का काम करता है।संवेदना काव्य की पूंजी है। संवेदनहीन समाज मुर्दो का टीला है। संवेदना इंसान की पहचान है। उपरोक्त बातें देश देशान्तर मगहिया दालान के 61वें आन लाइन काव्य संध्या की अध्यक्षता करते हुए मगही मंडप के संस्थापक सह सारथी पत्रिका के संपादक कवि मगधेश जी मिथिलेश ने कही। कार्यक्रम का संचालन कृष्ण कुमार भट्टा ने रोचक शैली में किया। संयोजन प्रेमी अनिलानंद के द्वारा किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए मुख्य अतिथि दीन बंधु ने कृषक की पीड़ा को स्वर दिया। हे धरती मईया तोहर सेवइका हो उदास। कवि ओंकार निराला ने वर्तमान की विसंगतियों को बिषय बनाया। उन्होंने सुनाया की- बड़ी पसोपेश में जी रहल हे आदमी, कोय जहर कोय अमृत पी रहल हे आदमी। गया के सुमन्त ने मौसम का मिजाज को टटोला। गरमी गिर रहल हे जैसे आयल जेठ महीना वा। गया के ही सुरेंद्र सिंह सुरेंद्र ने मगही के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि मगहिया हे हमर बोल अलबत्ता। जबकि गया के खालिक हुसैन परदेशी ने अपने सुरीले कंठ से गीत सुनाकर माहौल को बदल दिया। कटनिया हो लगल गेहूंआ के सगरी। व्यंगकार रंजीत दुधु ने शिक्षा की दुर्गति की ओर इशारा करते हुए सुनाया की, रूप बदल रहल हे विद्यालय हमर गांव के। बन्द हो गेल पुस्तकालय हमर गांव के। केके भट्टा ने तरनुमम में गीत सुनाकर श्रोताओं को भाव बिभोर कर दिया-लहरल दुपहरिया में मारे हे लहरिया। तइयो सुहावन लगे मिठ् मगही बोलिया। इस दौरान डा नरेश प्रसाद वर्मा, उदय जी, गोपाल जी आदि ने एक से बढकर एक समाज से जुड़ी समसामयिक रचना सुनाकर मंच की शोभा बढ़ाई। धन्यवाद ज्ञापन आचार्य गोपाल जी ने किया।

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