साधको, महाराज दशरथ ने अयोध्या के आम जनमानस से पूँछा

साधको , महाराज दशरथ ने अयोध्या के आम जनमानस से पूँछा –
जौ पाँचहि मत लागै नीका । करहु हरषि हियँ रामहि टीका ।।
लोगो से पूँछा तो वे नाचने लगे । आम जनमानस और सचिवो के मुख से आवाज निकली – जिअहु जगतपति बरिस करोरी । महराज ! आप करोडो़ वर्ष जियें । भगवान हमार आयुष्य आप को दे दे । बहुत ही अच्छा निर्णय लिया ।हम कह नही सकते – महराज ! आपने तो हम सबके मन की बात छीन ली ।
साधको , राम जी के राज्याभिषेक की बात अयोध्या की गलियों मे फैल गयी । सबके सब खुशियां मनाने लगे । कर्मचारी राज्याभिषेक सामग्री की व्यवस्था ऐसे कर रहे है जैसे सब पहले से लाकर रखा हो । आज्ञा भर की देर थी , प्रबन्धन परिपालन मे देर नही हुई ~
तब नरनाह बशिष्ठ बोलाए । रामधाम सिख देन पठाए ।।
जब सम्पूर्ण व्यवस्था हो गयी तो गुरुदेव वशिष्ठ जी को बुलवाया गया । गुरुदेव का आगमन हुआ । राजा दशरथ ने उनसे निवेदन किया , गुरुदेव ! आप जाइये और श्री सीताराम को विधि विधान से संकल्प कराइये -संयम व्रत का उपदेश दीजिये ।
साधको यहाँ पर एक विचारणीय विषय है गुरु वशिष्ठ को ही राम जी के पास क्यूँ भेजा गया ? मन्त्री या स्वयं राजा दशरथ भी तो राम जी को सूचना दे सकते थे । इसके दो कारण थे । पहला वशिष्ठ जी रघुकुल के गुरुदेव भी थे ।
गुरु ही हमे नियम संयम एवं व्रतपालन के लिये निर्देशित कर सकता है और उसकी बात अकाट्य है । दूसरा कारण बहुत गम्भीर है । राजा दशरथ राम जी के स्वभाव को अच्छी तरह जानते है कि लोभ न रामहि राज कर श्रीराम को राज्य का कोई लोभ नही है और साथ ही बहुत भरत पर प्रीति भरत पर उन्हे असीम प्रेम है ।वे तो यही चाहेंगे कि मेरा भाई भरत ही राजा बने । इसलिये यदि राम जी इस तरह का कोई प्रश्न उठायें तो गुरुदेव अपने ज्ञान के द्वारा उसका समाधान भी कर देंगे और तो और राम जी गुरुदेव की बात का खण्डन भी नही करेंगे ।गुरुदेव महल के अन्दर गये , द्वारपाल ने श्रीराम जी को समाचार दिया , – गुरुदेव आयें है । जैसे ही राम जी ने सुना यथासीघ्र द्वार पर आये , चरणों मे प्रणाम किया , सम्मान पूर्वक भवन मे ले आये , विधिवत पूजन किया । और निवेदन करते है –
सेवक सदन स्वामि आगमनू । मंगल मूल अमंगल दमनू ।।
आज सेवक के घर स्वामी का आगमन ! यह मेरे भाग्योदय की निशानी हैं । आपने प्रभुता छोडकर प्रेम किया हैं । प्रभुता छोडकर प्रेम करे वही प्रेम कहलाता है । ऊँचाईं मिलने के बाद पहले जैसी स्थित रखना तो कोई राम जी से सीखे ।संत प्रभुता छोडकर प्रेम करते हैं ।
साधको, औपचारिक वर्तालाप के बाद श्रीराम जी ने गुरुदेव से पूँछा – गुरुदेव ! मेरे लिये क्या आज्ञा हैं ? वशिष्ठ जी ने गूढ सांकेतिक भाषा मे उत्तर देते है –
भूप सजेउ अभिषेक समाजू । चाहत देन तुम्हहि जुबराजू ।।

साधको , वशिष्ठ जी का शब्द चातुर्य देखिये । यह नही कहा कि यह प्रस्ताव मेरा हैं । अपितु कहते है राजा दशरथ ने यह प्रस्ताव रखा है कि आप अयोध्या के युवराज बनो । भूप शब्द के द्वारा मानो गुरुदेव कहना चाहते है कि प्रत्येक राजा अपने सुयोग्य पुत्र को सिहासन प्रदान ही करता है , राजा दशरथ भी वही कर रहे है इसमे अनुचित कुछ नही है । महराज का प्रस्ताव रघुकुल की परम्परा के अनुकूल है अतः मैने भी इसका समर्थन किया हैं ।आपको यही सूचना देने आया हूँ । राजा के शुभ निर्णय से आपको अवगत करा दिया अब निर्णय आपको करना है । यहाँ वशिष्ठ जी सोच रहे है भगवान शिव की पटकथा के अनुसार तो आपको वन गमन करना चाहिये – किन्तु महराज तो आपको सिंहासन पर देखना चाहते हैं ।निर्णय आपको करना है – सिंहासन या वन गमन ! भगवान राम ने मन ही मन संकल्प ले लिया -वन गमन ।
साधको , ध्यान देना यहाँ पर गुरुजी की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है ~ एक तरफ तो दशरथ जी को राज्याभिषेक की व्यवस्था करने को कह देते है दूसरी तरफ जब राम जी को संयम नियम के विधि विधान समझाने लगे तो अपने संशय को भी व्यक्त कर दिया –
राम करहु सब संजम आजू ।जौं बिधि कुशल निबाहै काजू ।।
जौ बिधि मे संशय ध्वनि है । अर्थात आप संयम नियम का पालन करिये , देखते है संकल्प किसका पूरा होता है राजा दशरथ का या आपका । आशीर्बाद देकर गुरुदेव वापस चले जाते है ।
गुरुदेव के जाने पर श्रीराम जी का चेहरा उदास हो गया , क्यूँ ? जानते् है आगे कल ———

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