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सत्य से सहमति

सम्राट समुद्रगुप्त अपने समय के बहुत प्रतापी सम्राट थे लेकिन एक बार वे भी अनेक चिंताओं से घिर गए और क्षुब्ध रहने लगे। एक दिन वे अपनी चिंताओं मे मुक्ति पाने के लिए वन की ओर चल पड़े। समुद्रगुप्त अपने सबसे प्रिय श्वेत-श्याम वर्ण के घोड़े पर बैठे और चले जा रहे थे, तभी अचानक उन्हें बांसुरी की सुरीली आवाज सुनाई दी। बांसुरी की आवाज इतनी मीठी थी कि उन्होंने घोड़े की गति थोड़ी धीमी कर दी और उसे उस दिशा की ओर मोड़ दिया जिधर से बांसुरी की आवाज आ रही था।
कुछ दूर जाकर सम्राट समुद्रगुप्त ने देखा कि एक पहाड़ी झरने के पास वृक्षों की झुरमुट के नीचे एक चरवाहा प्रसन्नचित्त होकर बांसुरी बजाते हुए नृत्य कर रहा था।
समीप ही उसकी भेड़ें बैठी हुई थीं। सम्राट समुद्रगुप्त ने उस चरवाहे से पूछा,” तू तो एसा आनंदित हो रहा है, जैसे तुझे कोई साम्राज्य मिल गया हो?”
युवक चरवाहा हंसता हुआ बोला,” श्रीमान! आप दुआ करें कि भगवान मुझे कोई साम्राज्य न दें क्योंकि मैं तो अभी ही सम्राट हूं। परंतु साम्राज्य मिंल जाने पर कोई व्यक्ति सम्राट नहीं रह सकता।“
चरवाहे की बातें सुनकर सम्राट समुद्रुप्त हैरान हो गए। उनकी हैरानी भांपकर युवाक बोला,” श्रीमान! कोई भी व्यक्ति संपत्ति मे नहीं बल्कि स्वतंत्रता से सम्राट होता है और मेरे पास स्वतंत्रता के अतिरिक्त कोई भी संपदा नहीं है। भगवान के स्वरूप के बारे में चिंतन करने के लिए मेरे पास मन है। प्रभु भक्ति करने के लिए मेरे पास निर्मल हृदय है। चंद्रमा मुझ पर भी उतनी ही चंद्रकिरणें बरसाता है जितनी कि किसी सम्राट पर। प्रकृति के आंगन में खिले हुए फूलों की सुगंध भी मुझे किसी सम्राट से कम नहीं मिलती। फिर आप ही बताएं कि किसी सम्राट के पास ऐसा क्या है जो मेरे पास नहीं है? मेरे पास तो सब कुछ है।“
युवक की बातें सुनकर सम्राट समुद्रगुप्त ने कहा,” प्रिय युवक! तुम सही कहते हो। मेरा निवेदव है कि जब तुम अपने गांव जाओ तो सबसे यह कहो कि सम्राट समुद्रगुप्त भी तुम्हारे इस सत्य में पूर्णत: सहमत है

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