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*सास-ससुर और बहू*

पुत्र का कर्तव्य है कि वह पत्नी को सादर सास ससुर के सेवा हेतु प्रोत्साहित करे।

आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई।।
एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। “सादर” सास ससुर पद पूजा।।

काश! आजकल के पुत्रों में अपनी पत्नी को श्रीराम जी जैसे सास ससुर के आदर सहित सेवा करने का आदेश देने का साहस करते!!!
“आयसु मोर सासु सेवकाई”- हे भामिनी ! तुम आदर और स्नेह सहित सासु माँ की सेवा करो , यह मेरी आज्ञा है।

मैं सत्य कहता हूँ मित्रों कि इस कलिकाल मैं अधिसंख्य पतियों की ये स्थिति है कि वे एकांत में भी ऐसी आज्ञा देने की साहस नहीं है ,
तो श्रीराम जी जैसे , अपनी माता के सन्मुख क्या कह सकते हैं!!!

हे सुंदरी! “न मातुः परदैवतम् ” मेरे लिए माता के समान कोई देवता नहीं हैं। आप भलाई चाहती हो तो मेरी आज्ञा मान कर आदरपूर्वक सासु माँ की सेवा करो।
श्रीराम जी से प्रार्थना है कि
आज इस कलिकाल के सभी पतियों को अपनी पत्नी को सास ससुर के आदर सहित सेवा करने को आज्ञा देने की शक्ति दें ।

सास ससुर के “सादर” सेवा ही पूजा है।

एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा।”सादर” सास ससुर पद”पूजा”।।

देखिए ये बात भी पूर्ण सत्य नहीं है कि सभी पुत्रवधू अपने सास ससुर के सेवा नहीं करती लेकिन यह भी सत्य है कि सभी के सेवा में आदर ,सम्मान नहीं रहता है। कुछ ये सोच कर सेवा करती हैं कि सेवा नहीं करने पर…
लोग क्या कहेंगे!!!
आगे मेरे साथ क्या होगा!!
पाप लगेगा !!!
और सबसे महत्वपूर्ण बात कि कहीं नाराज होकर धन संपत्ति दूसरे को न दे दें!!!!
लेकिन उपरोक्त कारणों से की गई सेवा “सादर सेवा,” “आदर ,सम्मान पूर्वक सेवा” नहीं है।
भोजन दीं , पानी दीं लेकिन यह कहते हुए कि
“आपके और पुत्र- पुत्रवधुएँ नहीं थे क्या “!!
आपके सेवा करने का मुझे ठेका है क्या!!!
मुझे और कितने दिन झेलने होंगे???
अर्थात् वाग्वाण प्रहार युक्त सेवा जिसमें आदर सम्मान नहीं है।
और जो पुत्रवधू आदरपूर्वक सास ससुर की सेवा करती हैं उनके लिए संसार में इससे बढ़कर धर्म है और न पूजा ही…एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा…सादर सास ससुर पद पूजा ।।
आपके हृदय में सुमित्रा समान भाव होना चाहिए…
तुम्हरेहिं भाग राम बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं।।
अर्थात् आप समझें कि सभी पुत्रवधू को सास ससुर के सेवा करने का अवसर नहीं मिलता,
सौभाग्य प्राप्त नहीं होता ।
मेरा परम सौभाग्य है जो सास ससुर के सेवा करने का अवसर मिला।
“मो सम आजु धन्य नहिं दूजा”!!!
हर.पुत्रवधू के मन में यह हार्दिक इच्छा हो कि मुझे अपने सास ससुर के आदर सहित सेवा करने का अवसर मिले और यदि अवसर न मिले तो सीता मुख से सुनिए….
सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा।।
मुझे आपको सेवा करने का अवसर नहीं मिला अतः मैं बहुत ही अभागन हूँ…”सुनिअ माय मैं परम अभागी”
पुत्रवधू के मन की ऐसी भावना ईश्वर के पूजा के समान फलदाई होता है।
“पद पूजा”- पूजा में धन्यता का भाव आवश्यक है…
दशरथ जी विश्वामित्र मुनि से…
चरन पखारि कीन्हि अति पूजा। मो सम आजु धन्य नहिं दूजा।।
अगस्त मुनि श्रीराम जी से
सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन बर बैठारे आनी।।
पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मो सम भाग्यवंत नहिं दूजा।।

सेवा का अवसर श्राप नहीं बल्कि परम सौभाग्य है।

वे पुत्रवधू परम धन्य हैं जो विपत्ति में भी सास ससुर पर दोषारोपण नहीं करती हैं

सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथ सफल न कीन्हा।।

पूरे अयोध्या नगरी में कोलाहल है, शोर है कि कैकेई इच्छानुसार महाराज दशरथ जी श्रीराम जी को वनवास दिए हैं लेकिन सीता जी कहती हैं…
सेवा समय “दैअँ” बनु दीन्हा
इसमें मेरे सास ससुर का कोई हाथ नहीं है!
वे पूर्णतः निर्दोष हैं!!
और ये दैव योग से विधाता(दैअँ) का काम है।
जरा विचार करें कि यदि सीता जी आधुनिक पुत्रवधू होती तो क्या करती?? (अपने पति के हाथ में डंडे देकर कहती कि जल्दी से बुड्ढे.और बुढ़िया को समाप्त करो क्योंकि ये सठिया गए हैं!!!)

“दैअँ”बनु दीन्हा- उनका कहने का भाव है कि भावी प्रबल है जो किसी के वश में नहीं है।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि देवताओं का , दैवीय इच्छा न होती तो माता कैकेई हों या ससुर महाराज दशरथ जी, वे कभी वनवास नहीं देते।
मोर मनोरथ सफल न कीन्हा- मेरी हार्दिक इच्छा थी कि मैं चौंथेपन के अपने सास ससुर की सेवा करूँगी लेकिन विधाता से यह देखा नहीं गया। हमारे माता पिता की भी यही इच्छा थी कि मैं अपने सास ससुर की सेवा करूँ क्योंकि उन्होंने विदाई समय उपदेश दिए थे…
सास ससुर गुर सेवा करेहू। पति रूख लखि आयसु अनुसरेहू।।
दैअँ ने मेरे धर्म और परम धर्म दोनों को एक साथ उपस्थित कर मुझे साँप छुछूंदर वाली गति कर दिए हैं।
वनवास मेरे सास ससुर के कारण नहीं बल्कि मेरे दुर्भाग्य वश हुआ है…सुनिअ माय मैं परम अभागी!!!!
दिन रात अपने सास ससुर पर दोषारोपण करने वाली बहुओं को यहाँ के सीता चरित विशेष रूप से ,अवश्य अवलोकन करना चाहिए। उन्हें इससे सुंदर और आदर्श पुत्रवधू चरित अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा…..

जय सीताराम 🙏

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