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समत्व का ज्ञान

महाभारत युध्द समाप्त हो गया था। योगेश्वर श्रीकृष्ण व्दारका जा रहे थे। तभी मार्ग में उनकी भेंट उत्तंग मुनि से हुई। युध्द की घटना से अनजान उत्तंग मुनि ने जब श्रीकृष्ण हस्तिनापुर के बारे में पूछा तो उन्हें कौरवों के नाश का समाचार सुना दिया। यह सुनकर मुनि ने क्रोध में कहा,” हे कृष्ण! यदि आप चाहते तो यह विनाश रूक सकता था। मैं आपको स्राप दूंगा।“
श्रीकृष्ण बोले,” मुनिवर! पहले आप शांतिपूर्वक मेरा पक्ष सुन लें, फिर चाहें तो स्राप दे दें।“ यह कहकर श्रीकृष्ण ने उत्तंग मुनि को अपना विराट रूप दिखाया और धर्म की रक्षा के लिए कौरवों के नाश की आवश्यकता बताई।
तत्पश्चात श्रीकृष्ण ने उनसे वर मांगने को कहा। मुनि बोले,” जब भी मुझे प्यास लगे, तत्काल जल मिल जाए।“ श्रीकृष्ण वर देकर व्दारका की ओर चल पड़े। एक दिन वन में उत्तंग मुनि को बड़ी प्यास लगी। तभी वहां मैले-कुचैले वस्त्रों में एक चांडाल दिखाई दिया। वह हाथ में धनुष और पानी की मशक लिए हुए थे। वह मुनि तो देखकर बोला,” लगता है, आप प्यासे हैं। लीजिए, पनी पी लें।“
लेकिन घृणा के कारण मुनि ने जल नहीं पिया। उन्हें श्रीकृष्ण व्दारा दिए गए वर के इस स्वरूप पर भी क्रोध आया। तभी वह चांडाल हंसते हुए अंतर्धान हो गया।
उत्तंग मुनि को एहसास हुआ कि उनकी परीक्षा ली गई है। तभी वहां श्रीकृष्ण प्रकट हो गए। उत्तंग मुनि ने उनसे कहा,” प्रभु! आपने मेरी परीक्षा ली। मैं ब्राम्हण होकर चांडाल की मशक का जल कैसे पीता?”
श्रीकृष्ण ने कहा,” आपने जल की इच्छा की तो मैंने इद्रं से आपको अमृत पिलाने को कहा। मैं निश्चित था कि आप जैसा ज्ञानी व्यक्ति ब्राम्हण एवं चांडाल के भेद से ऊपर उठ चुका होगा और आप अमृत प्राप्त कर लेंगे। परंतु आपने मुझे इंद्र के सामने लज्जित कर दिया।“ यह कहकर श्रीकृष्ण अंतर्धान हो गए।
यथार्थ का ज्ञान होने पर जाति और वर्ण का कोई भेद नहीं रह जाता। समत्व के ज्ञान से पूर्व व्यक्ति प्राप्त हो रहे अमृत को भी नहीं प्राप्त कर पाता।

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