साधना पथ (भाग 50)

भाग 50

साधको , श्रीराम , लक्ष्मण और सीता गंगा के किनारे से पैदल यात्रा प्रारम्भ करते हैं । निषादराज से भगवान राम ने कहा , भैय्या गुह ! अब आप भी जाकर अपना राजपाट सम्भालो । निषादराज भगवान से निवेदन करते हैं , प्रभू ! थोडे़ दिन आपके साथ रहकर , आपकी सेवा करके , आपके निवास स्थल पर पर्णकुटी बना कर वापस आ जाउँगा ।
नाथ साथ रहि पंथ देखाई । करि दिन चारि चरन सेवकाई ।।
आप मुझे अपने साथ चलने दीजिये प्रभू ! संसार को जिसके स्मरण से , नाम से मार्गदर्शन मिलता हैं उस प्रभू को मै एक भील कहता हूँ कि मै आपको रास्ता बताउँगा , मै आपकी पर्णकुटी बनाउँगा , आपका आस पास के भीलो से परिचय कराउँगा । तब मुझे सन्तोष होगा कि मैने अपने प्रभु के लिये कुछ व्यवस्था की । भगवान ने निषादराज की मनःस्थित समझकर उसे अपने साथ चलने की आज्ञा प्रदान कर दी । यात्रा आगे बढती है ।
प्रभु तीर्थराजप्रयाग पहुँचे ।गोस्वामी बाबा लिखते है –
सचिव सत्य श्रद्धा प्रिय नारी । माधव सरिस मीतु हितकारी ।।
तीर्थराज प्रयाग का मन्त्री सत्य है , श्रद्धा उनकी प्रिय पत्नी है , वेणी माधव उनके प्रिय सखा है । अर्थात जिसने श्रद्धा , भक्ति , विश्वास से तीर्थराज का सेवन किया और सबसे बडी बात इसके साथ साथ प्रभु पर पूर्ण श्रद्धा भी हो तो फिर प्रयाग राज हमे वह सबकुछ प्रदान कर देते है जो उनके पास भरा हुआ है । क्या है —-
चारि पदारथ भरा भँडारु । पुन्य प्रदेस देस अति चारु ।।
चारो पदार्थ , धर्म , अर्थ , काम , मोक्ष से भण्डार भरा है । जो नियम से तीर्थराज का सेवन करता है वह निश्चित ही इन पुरुषार्थो को प्राप्त कर सकता है ।
साधको , प्रभु श्रीराम -गंगा यमुना और सरस्वती के त्रिवेणी संगम पर पहुँचे । पापनाशक तीर्थराज के दर्शन किये ।लक्ष्मण , सीता और निषादराज से उनकी महिमा (तीर्थराज)कावर्णन किया । तत्पश्चात स्नान करके माधव की पूजा की , अक्षयवट की परिक्रमा की और उसके बाद सभी ऋषि भरद्वाज के आश्रम मे पहुँचे ।
साधको भगवान ने यहाँ पर तीर्थो का सेवन कैसे करना चाहिये उसका बहुत सुन्दर उदाहरण दिया है । हमे सबसे पहले तीर्थ का महात्म्य समझना अर्थात जानना चाहिये ।तभी उस मे स्नान करें । स्नान के बाद मेला मत घूमने लगो वहाँ के पबित्र स्थलो पर जाकर उनको प्रणाम करो और तत्पश्चात ऋषि मुनि संतो के पास जाकर धर्म चर्चा , कथा प्रसंग श्रवण करों । यह तीर्थयात्रा कहलाती है नही तो आजकल की तरह की यात्रा पर्यटन ही मानी जायेगी ।
भगवान राम भरद्वाज ऋषि की कुटिया मे पहुँचे । और राम जी ने पहुँचते ही भरद्वाज ऋषि को दण्डवत प्रणाम किया । ऋषि आगे बढकर रामजी को उठा लिया और हृदय से लगा लिया । आज भरद्वाज ऋषि के आनन्द का पारावार नही है ।
दीन्ह असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि ।
लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि ।।
मुनीश्वर भरद्वाज जी ने आशीर्बाद दिया । आज भरद्वाज जी मन ही मन सोच रहे है कि बिधाता ने आज इन नयनो को इन तीनो (राम लक्ष्मण और सीता) का दर्शन करा करके मेरे सम्पूर्ण पुण्यो के फल को मुझे प्रदान कर दिया । कुशल क्षेम पूँछकर ऋषि भरद्वाज जी ने सुन्दर जल जलपान की व्यवस्था कर दिया । सभी ने सुन्दर अमृतमयी जलपान किया । आज भरद्वाज जी अत्यन्त प्रसन्न होकर भगवान श्रीराम से कहते हैं –
आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू । आजु सुफल जप जोग बिरागू ।।
सफल सकल सुभ साधन साजू । राम तुम्हहि अवलोकत आजू ।।
हे राम ! आपका दर्शन करते ही आज मेरा तप , तीर्थ सेवन , और त्याग सफल हो गया । आज मेरा जप ,योग और बैराग्य सफल हो गया और आज सम्पूर्ण जीवन का पूर्ण लक्ष्य भी प्राप्त कर लिया । आपके दर्शन से मेरी सम्पूर्ण सब आशायें पूर्ण हो गयी । प्रत्येक आध्यात्मिक व्यक्ति का लक्ष्य यही होता है कि वह येन केन प्रकारेण भगवान के श्रीचरणों मे प्रेम मिल जाये । वह आज मुझे प्राप्त हो गया , अब आप मुझे
निज पद सरसिज सहज सनेहू ।।
कृपा करके यह वरदान दीजिये की आपके श्रीचरण कमलों मे मेरा स्वाभाविक प्रेम हो । भरद्वाज जी कहते है प्रभू ! मै तो एक बात जानता हूँ , और सबसे यही कहता भी हूँ –
करम वचन मन छाडि, छलु जब लगि जनु न तुम्हार ।
तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार ।।
मन ,वचन और कर्म से जो आपका भजन नही करता वह कभी भी स्वप्न मे भी सुख प्राप्त नही कर सकता । दूसरे कितने भी पुरुषार्थ वह करले परन्तु जब तक वह आपका नही बनेगा तब तक न तो उसे सुख प्राप्त होगा और न ही वह कुशलता प्राप्त कर सकता है ।
साधको – एक रात्रि भरद्वाज जी के आश्रम मे बिताकर दूसरे दिन प्रातः स्नानादि क्रिया से निवृत्ति होकर श्रीराम जी ने भरद्वाज जी से एक बात पूँछी ? क्या पूँछा रामजी ने ? जानते है ——– अगले सत्र मे ———-

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