साधको जब से राम जी विवाह करके अवध आये हैं तब से नित्य नया आनन्द , गोस्वामी बाबा लिखते है –

साधको जब से राम जी विवाह करके अवध आये हैं तब से नित्य नया आनन्द , गोस्वामी बाबा लिखते है –
जब ते राम ब्याहि घर आए । नित नव मंगल मोद बधाए ।।
प्रतिदिन बधाइयाँ , नयी प्रसन्नताएँ अवध मे होती हैं । गोस्वामी बाबा कहते है कि विश्व की ऋद्धि सिद्धि की नदियां दौड -दौडकर अवध के सागर मे बहने लगी। सरयू मे अमृत बहने लगा । वनस्पतिं मे जैसे सदा वसन्त हो ऐसा सुखमय और प्रसन्न जीवन लगता है ।कोई चिन्ता नही , कोई दुःख नही । गोस्वामी बाबा सुख का वर्णन करते करते अचानक एक नया मोड़ लाते हैं । यह एक महत्वपूर्ण मोड़ है ।
मित्रों -यह मोड़ हम सबके आता हैं । रामकथा तो अपनी कथा है । राम जी द्वारा ही अपना जीवन देखना हैं । जीवन वही है । वह त्रेतायुग था आज कलियुग हैं । उस समय लोग बिना सिले हुए कपडे़ पहनते थे आज सिले हुए कपडे़ पहनते हैं । पहले खडा़ऊँ पहनते थे , आज बूट पहनते हैं ।भीतर का जीवन वही था जो आज हैं ।
अयोध्या मे इतनी समृद्धि सुख ! बाबा जी कहते हैं , अयोध्या के किसी आम व्यक्ति से पूँछो कि तृप्त हो ? शान्त हो ? पहले पूँछते थे तो कहते थे , हमारे महाराज के पुत्र नही है । एक नही चार पुत्र उत्पन्न हुए । फिर पूँछा कि अब सन्तुष्ट हो , तो कहते है , अभी नही यज्ञोपबीत विवाह हो जाय तो कुछ कह सकते है । जब यह भी सम्पन्न हो गया तो फिर पूँछो कि अब तो विवाह भी हो गया ,अब सन्तुष्ट हो गये होगे ? तो कहते है –
सब के उर अभिलाष अस , कहहि मनाइ महेस।
आपु अक्षत जुबराज पद रामहिं देउ नरेश ।।
सबके मन मे यही इच्छा है कि महाराज दशरथ प्रभु श्री राम को युवराज पद दे दें ।
मित्रो , त्रेतायुग हो या कलियुग मूल रुप से हम सबका व्यवहार वही है । पहले सोचते है कि बेटा हो जाय , बेटा हो गया तो , अच्छा पढ लिख ले , पढ लिया तो अच्छी नौकरी लग जाय , नौकरी लग गयी तो सुन्दर विवाह हो जाय , विवाह हो गया तो नाती पोते हो जाय , वह भी हो गया तो बेटे को प्रोन्नति मिल जाय । यह कामना कभी समाप्त ही नही होती । मित्रों हमारा जीवन यही है , ऐसे ही —- फिर ऐसा हो —- फिर ऐसा हो । उसमे ही लगे रहते हैं । एक के बाद एक इच्छाओ का शिखर !इच्छाएँ कभी पूर्ण नही होती । यह संसार का नियम है । संसार मे कोई दुखी न हो यह तभी सम्भव है जब कोई इच्छा ही न हो ।राजा दशरथ की सभी इच्छा पूर्ण नही हो पायी फिर हमारी कैसी पूर्ण होगी ?
मित्रो बहुत लोग एक तर्क करते है कि व्यक्ति यदि इच्छा ही न करे तो प्रगति रुक जाती हैं । इस पर जहाँ तक मेरा(आचार्य करुणेश शुक्ल ) विचार है , इच्छा सदैव अपनी क्रिया की मर्यादा मे करनी चाहिये ।हम कोई कार्य करें जिसका मूल्य पाँच हजार है , हम उसी के दस हजार की इच्छा करें । और जब दस हजार न मिले तो रोने लगे, यह गलत है । मान लीजिये उसने दस हजार दे भी दिये तो आप सावधानी रखकर उसी कार्य को और सुनियोजित तरीके से यथासम्भव करना । हम जितना चाहे उतना मिल जाय तो एक सावधानी रखना आवश्यक है जितना साधन बढे उतनी साधना भी बढना चाहिये नही तो वह बढे हुये साधन हमे पतन की ओर ले जायेगें । हम सबकी इच्छाओ से दुख का सृजन होता है । सम्भवतः राम वन गमन का एक कारण अवध वासिओ की इच्छा भी रही ।
मित्रों सम्पूर्ण अवध वासी के मन मे यही था कि हे भोले बाबा ! जल्द से जल्द राम जी का अभिषेक हो जाय । ऐसी इच्छा मे अयोध्या डूबी थी तभी एक घटना घटी —–
घटना क्या थी ?
जानते है अगले भाग मे ——

जय गुरूदेव

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