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सच्ची वीरता

एक दिन छत्रपति शिवाजी अपने शिविर में बैठे सेनापति माधव की प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी वह हाथ में एक ग्रंथ लिए उनके पास पहुंचा। माधव के पीछे एक डोला भी था। उसने प्रसन्न मुद्रा में शिवाजी से कहा,” महाराज! मुगल सेना दूर तक खदेड़ दी गई है और राजा बहलोल खां जान बचाकर भाग गया है।“ शिवाजी ने डोले की ओर इशारा करते हुए पूछा,” यह क्या है?”
माधव ने कहा,” इसमें स्वर्ग की परी कहलाने वाली राजा बहलोल खां की बेगम गौहर बानू है जो आपके लिए जीत के तोहफे के रूप में लाई गईधर्म है। यह देखिए मैं उनका धर्म ग्रंथ कुरान शरीफ भी उठा लाया हूं। अब हम इन दोनों को अपमानित करके उनसे प्रतिशोध ले सकते हैं।“
शिवाजी ने सेनापति माधव के हाथ से कुरान शरीफ लेकर उसे चूम लिया और डोले के पास जाकर राजा बहलोल खां की बेगम से बाहर आने को कहा। बेगम गौहर बानू डोले से बाहर आई। उन्हें देखकर शिवाजी ने कहा,” आप अत्यंत सुंदर हैं। काश! मेरा जन्म आपके पुत्र के रूप में होता तो मैं भी कितना सुंदर होता।“
फिर शिवाजी अपने सेनापति माधव को फटकारते हुए बोले,” यह वीरता नहीं है कि दुश्मन की मां, बहन, बेटी या पत्नी का अतीत्व लूटा जाए और उनके धर्म ग्रंथों कीहोली जलाई जाए। किसी के धर्म को अपमानित करना बहुत बड़ी कायरता और नीचता है। एक सच्चा वीर दुश्मन की स्त्री और उसके धर्म ग्रंथ को अपमानित करके कभी खुश नहीं हो सकता।“
तत्पश्चात शिवाजी ने सेनापति माधव को आदेश दिया कि पूरे सम्मान के साथ बेगम गौहर बान और करान शरीफ को राजा बहलोल खां के हवाले कर दिया जाए। शिवाजी के आदेश का तुरंत पालि किया गया।
अपनी बेगम गौहर बानू राजा बहलोल खां मन ही मन उनकी सच्ची वीरता के सामने प्राणपण से नतमस्तक हो गया।

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