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सबसे चंगा है धर्म का धंधा ?

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मंदिर-मस्जिद और गुरुद्वारों व गिरजाघरों में उपासकों और अनुयायियों की भीड़ इस कदर है की आज धरती पर धर्म से जुड़ा व्यवसाय चार लाख करोड़ डालर से ज्यादा है। अकेले भारत में सभी प्रकार के धर्म स्थलों की चल-अचल संपत्ति का आकलन किया जाय तो वह अमेरिका, चीन और इंग्लैंड की सकल पूंजी से ज्यादा है। राजनेताओं में मंदिरों-मस्जिदों में जाने की एक होड़ सी है। हरेक अपने को श्रेष्ठ साबित करने को लालायित है। मगर मध्यकालीन निर्गुण धारा के संत कबीर ने अपनी रचना के माध्यम से समाज में व्याप्त पाखंड और अंधविश्वास पर गहरी चोट की है। देखें रचना,
मोको कहां ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में
ना तीरथ मे ना मूरत में, ना एकान्त निवास में
ना मंदिर में ना मस्जिद में, ना काबे कैलास में
मैं तो तेरे पास में बन्दे,मैं तो तेरे पास में।
…खोजि होए तुरत मिल जाउं, इक पल की तालास में, कहत कबीर सुनो भई साधो, मैं तो हूं विश्वास में।।
कहने का अभिप्राय है कि क्या समाज में हम और हमारी राजनीति में पाखंड व अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं दे रही? क्या हम राजनीति का धर्म त्यागकर सिर्फ धर्म के नाम पर राजनीति नहीं कर रहे? आज कबीर जैसे संत होते क्या उन्हें धर्म व राष्ट्रद्रोही ठहराया जाता? भारत में नेताओं को मसीहा बनाना क्या औचित्य पूर्ण है!

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