बढ़ते लोग, घटता पानी, विश्व जल दिवस 22 मार्च पर लेख

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जल ही जीवन है और जीवन में जल का महत्व हवा के बाद सबसे ज्यादा है । पृथ्वी धरातल का क्रमश: 71 प्रतिशत भाग पानी तथा 21 प्रतिशत भू-भाग है और इस कारण पृथ्वी को नीला ग्रह भी कहते है । इतने बड़े जल भंडारों के होते हुए भी आज धरती के कई भाग के लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे है, इंसान के साथ साथ पशु-पक्षी, जीव-जंतु आदि काल के ग्रास बन रहे है ।

आज जिस तरह जल का दोहन हो रहा है तथा जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, बरसात का चरित्र बदल जाना, जागरुकता की कमी, बढ़ती आबादी के कारण जल की उपलब्धता विकट होने की कगार पर है, यदि समय रहते विश्व तथा खासकर भारत के जल संचयन और संरक्षण की समुचित व्यवस्था जमीनी स्तर पर नहीं की गई तो, अगले पचास वर्ष में विषम परिस्थिति पैदा हो सकती है। जल के महत्व तथा आसन्न संकट को दर्शाने हेतु प्रतिवर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रूप में मनाने की परंपरा है ।

भारत की आबादी पूरे विश्व की आबादी का साढ़े सत्रह प्रतिशत है, जबकि इसके पास विश्व की कुल जल का मात्र चार प्रतिशत है । कई विशेषज्ञ जल की समस्या के विकरालता के मददेनजर कहा है कि तीसरा विश्वयुद्व संभवत: पानी को लेकर लड़ा जाएगा क्योंकि कई देशों के बीच जल स्त्रोतों तथा नदियो, बॉधों आदि को लेकर टकराव और संघर्ष की स्थति बदतर होती जा रही है ।

विश्व की बढती जनसंख्या का दुष्प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र में स्पष्ट रुप से दिखाई देने लगा है । आज नगरीकरण शैतान की आंत की तरह बढ़ता जा रहा है । बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए आवासीय भूमि तथा उदयोग धंधे की बढ़ती आवश्यकता, सड़कों के जाल विछाने से जल के प्राकृतिक स्त्रोतों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है । इस सबके साथ ही बढ़ती हुई जनसंख्या से प्रत्येक तत्व दूषित हो चुका है, कही भी शुद्धता नही रही, न थल, न जल, न वायु और न मानव का तन- मन । बढ़ती जनसंख्या के कारण गॉव- गॉव कस्बों,नगरों मे बदलते जा रहे हैं । बहुमंजिले भवन वनते जा रहें है । नए़- नए उधोग धंधे आरंभ हो गए है । इन सबके लिए जल की आवश्यकता होती है । नदियों का जल पीने तथा सिंचाई के लिए पर्याप्त नहीं रहा है । पेयजल की समस्या दिन प्रतिदिन भयंकर होती जा रही है । नदियों का जल स्तर गिरता जा रहा है ।

जहॉं जनसंख्या बढती जा रही है, वही उधोग धंधे की संख्या बढती जा रही है । इन्ही उधोग धंधे से निकलने वाले जहरीले पदार्थ रसायन आदि नदी नालो में बहा दिये जाते है, जो अपने आस पास के क्षेत्रों में निकलने वाली नदियों का जल प्रदुषित हो गया है । प्रदुषित जल से उत्पन रोगों का जन्म देते है । नगरो व महानगरों से होकर निकलने वाली नदियो के जल प्रदुषित हो गया है, जिससे उस जल के सेवन करने वाले प्राणी अनेक घातक रोगों से ग्रस्त हो जाते है ।

हमें इस पर गौर करना होगा कि पृथ्वी पर पीने लायक स्वच्छ जल तो मात्र तीन प्रतिशत ही हैं, शेष तो उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रूव पर वर्फ के रुप में जमा हुआ है । जिस तेजी से हम स्वच्छ जल का दुरुपयोग कर रहें है, शीध्र ही जल संकट आनेवाला है । वह दिन दूर नहीं जब एक बाल्टी पीने के पानी के लिए आंखो से पानी आ जाए तो बड़ी बात नही होगी । जल का कोई विकल्प नहीं है, पानी का एक -एक बूंद मूल्यवान है । हम दिल और दिमाग से पानी के महत्व को जाने । अगर सही ढंग से पानी का संरक्षण किया जाए तो इस समस्या का समाधान आसान हो जाएगा ।

समस्या की पहचान करने, समाधान निकालने और स्थानीय स्तर पर उन्हें लागू करने में आम लोगों और सिविल सोसायटी की भागीदारी जरूरी है । विशेषज्ञों के अनुसार जल संरक्षण के लिए पांच ‘आर’ अपनाने की जरूरत है । पहला (आर) रिड्यूस अर्थात पानी की जरूरत कम करना, दूसरा (आर) ‘रिस्पेक्ट’ यानि पानी का सम्मान, संभाल कर प्रयोग करना, तीसरा ‘आर’ ‘री -साइकिल’ अर्थात दुबारा से प्रयोग, गंदे पानी का शोधन करना, चौथा ‘आर’ ‘री -यूज’ करना तथा पांचवां ‘आर’ ‘रिटर्न’ जीतना पानी लो, उतना प्रकृति को देना ।

 

पानी की बर्बादी रोकना ही पानी का सदुपयोग है । हमें प्रण करना होगा कि हम ब्रश करते वक्त नल खुला नहीं छोडेगे, पानी पूरा गिलास पिऐगें व झुठा पानी नहीं छोडेगें । नहाते वक्त शावर के बदले वाल्टी व मग से नहाएगें और प्रयास रहेगा कि फलश मे कम से कम साफ पानी उडेलना पडे । शेविंग के वक्त मग मे पानी, धोए हुए कंपडो के गंदे पानी से नाली तथा शौचालय की सफाई, पानी का व्यर्थ बहना बंद करना तथा घरो की धुलाई के बदले पोछा करना चाहिए । हमें गाडी को धोने के बदले बगैर पानी की सफाई करना चाहिए । बर्तन और कपड़ा हाथ से धोते समय बहता पानी खुला नहीं छोडना चाहिए । वर्षा जल संग्रहण तथा इस्तेमाल को बढावा देना चाहिए तथा रेन हार्वेस्टिंग का इस्तेमाल पर जोर देना होगा । समर्सिबल का उपयोग व्यक्तिगत के बदले सामूहिक उद्देश्यों हेतु हो । कपड़ों को मशीन में नहीं, बाल्टी में खँगाले । किसी पाईप में रिसाव हो तो उसे तुरंत ठीक कराएं । आर॰ ओ॰ का पानी बेकार न जाने दें। यदि कहीं कोई सार्वजनिक नल खुला देखें तो उसे तुरंत बंद कर दें । भूजल स्तर बढ़ाने के लिए वाटर रिचार्जर लगाएँ । बरसात में मकानों की छतो पर गिरे पानी को जमीन के नीचे पहुंचाने की व्यवस्था बना दी जाए तथा वर्षा के पानी का इस्तेमाल टॉयलेट और बगीचों के काम में लाना होगा । फलों तथा सब्जियों को नल के बहते पानी में धोने के बदले बर्तन का प्रयोग करना चाहिए तथा धोने में इस्तेमाल किया गया पानी को बगीचों में इस्तेमाल पर जोर देना चाहिए । जिस फसल के उत्पादन में ज्यादा पानी की जरूरत होती है उसका उपयोग कम से कम करना होगा । टेक्नोलोजी के माध्यम से समुद्र के खारे जल को पीने योग्य बनाया जा रहा है ।

 

हमें लोगो को पानी के सदुपयोग करने के लिए जन जागरण करना होगा । संभावित खतरों के प्रति आगाह करना होगा । पर्यावरण की सुरक्षा तथा अधिक से अधिक वृक्षारोपण करने के लिए प्रेरित करना होगा । नदियों के जल ग्रहण क्षेत्र में प्रदुषण को रोकना होगा, गंदे नालों को सीधे नदियों में जाने से रोकना होगा तथा नदियों के पर्यावरणीय प्रवाह को बनाये रखना होगा । नदियों को साफ रखना होगा तथा पानी को प्रदुषित होने से बचाने के लिए हर संभव प्रयास करना होगा । पानी के तेजी से हो रहे बाजारीकरण को यथासंभव रोके जाने की आवश्यकता है । हमारे देश में जल संचयन, वर्षा जल प्रवंधन एवं सिंचाई के प्राचीन पद्वति जैसे बावडी, जोहड तथा आहर-पइन अपनाना होगा जो पर्यावरण हितैषी, कम लागत वाला को अपनाना होगा । वर्षा जल को संग्रह कर जमीन में पहुंचाने का इंतजाम करना होगा । ऑंगन को कच्चा रखने की पुरानी परंपराओ का अनुपालन किया जाए । छोट बड़े तालाब बनाकर जल का संरक्षण किया जाए । वर्षा जल की बर्बादी को रोकना होगा । जंगलो के अंधाधुघ कटाई होने से दुहरा नुकसान हो रहा है । वाष्पीकरण न होने से वर्षा नहीं हो पाती और दूसरे भूमिगत जल सूखता जा रहा है । इसलिए वन महोत्सव के माध्यम से सतत वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करना होगा । जल संरक्षण को अनिवार्य विषय के रुप में विधालय तथा अन्य शैक्षणिक संस्थाओं में शामिल करना होगा । प्रचार माध्यमों द्वारा सार्थक जल संरक्षण उपायों तथा कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाए । लो वॉटर इकोनॉमी यानि पानी को कम खर्च करना और उसका दोबारा इस्तेमाल करने को प्रोत्साहित किया जाए । साल भर प्रकृति इतना पानी आसमान से धरती पर उड़ेलती है कि अगर उसी का समुचित उपयोग कर लिया जाए तो हमें पानी की किल्लत से दो चार नही होना होगा । इस बारिश के पानी का एक बड़ा हिस्सा बिना उपयोग हुए समुद्र मे चला जाता है । अंत में इस कथन को जेहन में रखना होगा :-

“जल ही जीवन है और जल है तो कल है” ।

  1.                                            प्रवीण कुमार झा

 

 

 

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