प्रियंका वाड्रा और कांग्रेस का हिंदुत्व

ऐ बाबू ये पब्लिक है पब्लिक, ये जो पब्लिक है सब जानती है ये जो पब्लिक है, ये जो पब्लिक है सब जानती है ये जो पब्लिक है अजी अंदर क्या है बाहर क्या है अंदर क्या है बाहर क्या है ये सब कुछ पहचानती है ,ये जो पब्लिक यह गाना राजेश खन्ना के फिल्म रोटी की है। यह फिल्म 1974 में रिलिज किया गया और उस समय में सुपर डुपर हिट रहा था। उसके बाद ही देश भर में जेपी आंदोलन को एक हवा मिला और आन्दोलन में यह गीत नें धुम मचाया था।

आप सोच रहे होंगे कि मैं फिल्म रोटी के बारे में बताने जा रहा हूँ, या फिर आप यह सोच रहे होगें कि मै फिल्म के सुपर स्टार राजेश खन्ना के बारे में बताने जा रहा हूँ या फिर मुमताज के बारे में तो आप बिल्कुल गलत है। लेकिन फिल्म के शीर्षक मुझे बहुत पसंद है। भला रोटी किसे पसंद नही होगा। लेकिन आज कल रोटी के कई प्रकार हो गए है जैसे पेट भरने वाला रोटी, दूसरा राजनीतिक रोटी। आपने नेताओं को कहते हुए सुना ही होगा कि विपक्ष या पक्ष राजनीतिक रोटियां सेक रहा है। रोटियां सेकना तो ठीक है जनाब लेकिन जब लाश पर रोटियाँ सेकी जा रही हो तो मानवता शर्मशार होता है। खैऱ इन बातों से नेताओं को क्या लेना देना है, सत्ता ऐसी नशा है जो कि अच्छे बूरे को भूलाकर सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक सत्ता पाने के लिए अग्रसर करता है। जो सत्ता में है वह भी और जो नही है वह भी। कम तो कोई भी नही है।

मैं प्रियंका के चुनावी हिंदुत्व पर बात करू इससे पहले थोड़ा उत्तर प्रदेश के लखीमपुर और राजस्थान में दलित की पीट-पीटकर हत्या पर प्रकाश डालते है। ऐसे मिडिया भी आजकल किसी गिद्ध से कम नही है। रहेगा भी क्यों नही आखिर रोटी तो उसे भी खानी है। खैर आपने प्रियंका गांधी के लखीमपुर सीरिज तो देखा ही होगा। मिडिया नें किस प्रकार से एक औरत के द्वारा झाडू लगाने को ब्रेकिंग बना दिया। इसमे दो बात हो सकती है या तो प्रियंका जी नें पहली बार झाडू लगायी हो। हमारे या आपने घर में मां, बहन बेटियाँ तो सवेरे झाडू लेकर ही उठती है मारने के लिए नही बल्कि घर में लगाने के लिए। आलम यह है कि कभी कभी तो मर्द नामक प्राणी भी झाडू लगाते मिल जाते है, लेकिन किसी ने आज तक उस पर खबर नही बनाया। यह राजनीतिक रोटियों का ही कमाल है बाबू जी, हिरासत में झाडू लगाना और वहाँ पर मिडिया का पूरा कवरेज मिलना। फोटो खीचने वाले पत्रकार भी किसी एंगल को बक्शने को तैयार नही। हर एंगल से फोटो लिया गया। खैर दिल्ली में केजरीवाल नें कांग्रेस पर झाडू लगा दिया। बाकिं जो बचे है उस पर राहुल जी नें और प्रियंका अपना रोल अदा कर रही है।

प्रियंका गांधी जी की एक विडियों तेजी से वायरल
आजकल प्रियंका जी की एक विडियों तेजी से वायरल हो रहे है सोशल मिडिया पर। खैर विडियों तो वायरल होते रहते है लेकिन यह खास इस लिए है कि पहली बार प्रियंका मां भगवती की मंत्र खुले मंच से बोल रही है, और लोगों से जय माता दी की जयकारा लगवा रही है। कांग्रेस का हिंदुत्ववादी चेहरा हमेशा से भारत भूमि के लिए धोखा साबित हुआ है, मै ये नही कह रहा हूँ कि प्रियंका वाड्रा की नियत भी भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जैसा हो। लेकिन चुनाव के समय में अचानक से हिंदुत्व प्रेम जागना और चुनाव खत्म होते ही हिंदुओं को भूल जाना अपने आप मे कई सवाल उठाते है।
चलिए एक सवाल मै आप से पूछता हूँ :– क्या कभी आपने राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के रक्षाबंधन वाले एक भी पोस्ट देखा है जिसमें बहन भाई को राखी बांध रहा हो। क्या आपने कभी इससे पहले कभी प्रियंका के मुख से मंत्र सुना है। खैर छोड़िये दिल्ली के कालका मंदिर को सील कर दिया गया है क्या आपने इस पर प्रियंका जी के द्वारा दिया गया कोई ब्यान सुना है। राहुल गांधी का दतात्रेय ब्राह्मण होना, उतना ही सही हो जितना की आर्यन खान का 23 साल में नशेरी होना। राहुल को सत्ता पालने की ललक है और आर्य़ान को चरस पीने की। खैर भला हो चाय वाले और गाय वाले का जिसनें राजनीतिक में हिन्दुस्थान के धरती पर नेताओं को जालिदार टोपी छोड़ जागरण करने पर मजबूर कर दिया है। कांग्रेस वह पार्टी है जिसमें राम को काल्पनिक बताया गया है। आज जब कांग्रेस के महासचिव और उत्तर प्रदेश के प्रभारी प्रियंका गांधी मंत्रो का उच्चारण किया है तो लगा कि कांग्रेस लौट रही है।
चलिये आपको 1937 से 1947 के बीच में ले चलते है
आजादी से पहले देश में दो बड़ी राजनीतिक पार्टी थी। मुस्लिम लीग और कांग्रेस। जैसा कि आप जानते है कि मुस्लिम .लीग बनने और उसे बनाने के पीछे जिन्ना का उद्देश्य मुस्लिम राष्ट्र तथा मुस्लिम को लेकर था। दूसरी तरफ कांग्रेस जिसे लोग हिंदू के पार्टी मानकर समर्थन किया। हालांकि यह कहना भी ठीक होगा कि जिन्ना और अंग्रेज शासक भी कांग्रेस पार्टी को हिंदुवादी पार्टी ही मानते थे। लेकिन कांग्रेस और उसके नेता सत्ता के लोलुप एक दिशाहीन पार्टी निकली। सेक्यूलरिज्म के नशा उस पर इतने ज्यादा असर कर दिया था कि नेहरू के सत्ता में रहते हुए भी 40 लाख से ज्यादा हिंदुओं को मार दिया गया। न जाने कितने महिलाओं के घृणित अपराध किया गया। कितने माता बहनों को आग और कुएं में कुदकर जान देनी पड़ी। कितने भाई और पिता को अपने हाथों से ही अपने बच्चों को मौत के घाट उतारना पड़ा। इन सबका दोषी था कांग्रेस। या यह कहना भी ठीक होगा कि इसका दोषी स्वयं हिंदू था जिसने कांग्रेस पर विश्वास किया। गांधी के अहिंसा नें हिंदुओं को नपुंसक बना दिया था। नेहरू मुस्लिम था इस बात की जिक्र भी जल्द ही प्रकाशित होने वाली पुस्तक विभाजन कालीन भारत के एक अध्याय में आपको पढ़ने को मिल जायेंगे।

भारत के विभाजन के समय में जो विभत्स घटना और क्रुरता को अंजाम दिया गया उसका सूत्रधार भले ही जिन्ना रहा हो लेकिन उसका गुनहगार तो नेहरू था। क्योंकि अंग्रेज नें सेटर का पावर नेहरू को दिया था। नेहरू जी चाहते तो रोक सकते थे, लेकिन सब कुछ होने दिया। जिसके परिणाम यह हुआ कि करोड़ों हिंदुओं को अपनी जान गवानी पड़ी। धर्म के आधार पर बंटवारा होने के बावजूद मुस्लिम भारत में ही रहा लेकिन पाकिस्तान से हिंदुओं को या तो मार दिया गया या फिर उसका धर्मांतरण कर दिया गया। लेकिन भारत के हिस्से में पूरी तरह से शांति बना रहा क्योंकि नेहरू ने जानबुझकर पाकिस्तानी हिस्से से हिंदुओं को भागने के लिए मजबूर किया और किसी प्रकार से सुरक्षा नही दिया।

अब 70 साल बाद एक बार फिर से कांग्रेस में हिदुत्व प्रेम जगा है। राहुल गांधी की मंदिर मंदिर भटकना और दतात्रेय ब्राह्मण बताना। कश्मीर में हिदू शिक्षक के हत्या पर चुप रहना। लखीमपुर की राजनीतिक टूर, शोक मे सत्ता की खोज में निकले गांधी परिवार से जनता क्या उम्मीद लगा सकती है। लखीमपुर में 5 किसान समेत कुल 9 लोगो मारे गए है लेकिन कांग्रेस सिर्फ 5 को लेकर आंसू बहा रही है। क्या बांकि के 4 लोग किसी का कुछ नही लगता है। एक पत्रकार की हत्या कर दी गयी लेकिन उस मामले पर कांग्रेस चुप है। हालांकि इस मामले में कांग्रेस अकेला नही है बांकि पार्टी भी उसके साथ है। किसानों के शाेक में सत्ता कि शियासत सबको दिखाई दे रहा है। 4 गाड़ी से कुचले गए और 5 को पीट-पीटकर मार दिया गया। 9 लोगों की शोक और 9 पार्टियों के राजनीतिक टूर। जब किसी घर में सदमा हो या अनहोनी हो तो वहाँ घर वालों को शांति और सहानुभूति की जरूरत पड़ती है, लेकिन राजनीतिक सत्ता के लोलूप न तो शांति से उन्हे रहने देते है और नही तो सहानुभूति मिलते है। सियासत के नाम जान की कीमत लगायी जाती है। राजस्थान में एक दलित को पीट-पीटकर मार दिया जाता है लेकिन पूरे विपक्ष मामले को लेकर चुप है क्योंकि वहाँ सत्ता कांग्रेस के हाथ में है। ऐसा क्यों होता है जनता को जबाब अवश्य मांगना होगा।

चुनावी हिंदुत्व पर विश्वास करना भारत के लिए एक बड़ी क्षति के तरफ अग्रसर करता है। जो सत्तर साल में हिंदू नही बना वह योगी के राज्य में बन गया। इसमें तारीफ योगी और मोदी की होनी चाहिए। मोदी पर यह आरोप भी लगना तय है और लोग लगा भी रहे है कि सबसे ज्यादा कन्वर्जन मोदी राज्य में हुआ है। सत्ता को अपना समझने वाली पार्टियाँ जो अब तक अवतार पार्टी करती थी अब जागरण करने और भगवान परशुराम के प्रतिमा लगाने की बात करने लगी है। खैर प्रियंका गांधी की घर वापसी राजनीतिक तौर पर नही अध्यात्मिक तौर पर होनी चाहिए। अन्यता सत्ता के लिए टोपी पहनने वाले और चुन्नी ओढ़ने वाली सनातन के लिए घाटक सिद्ध होगा। भारत मात्र एक देश बचा है जहाँ सनातन कुछ हद तक सुरक्षित है।
कांग्रेस के हिदुत्व प्रेम पर आखिर भरोसा करने लिए कुछ तो वजह होनी चाहिए । विभाजन कालीन भारत में यह भी जिक्र है कि नेहरू ने खुद कहा था कि मै भी मुसलमान हूँ। गांधी परिवार में सबसे बड़े गांधी यानि कि फिरोज गांधी को कभी भी याद नही किया जाता है। आखिर इसकी वजह क्या हो सकता है । फिरोज गांधी एक बहुत बड़े समाज सेवक और पत्रकार थे, नेशनल हेराल्ड का नाम तो आपने सुना ही होगा।
खैर रोटी कोई भी मिले खाईये लेकिन लाश पर सेकने की कोशिस मत कीजिए। बड़ा दिल दुखता है अपना। पूरे 9 के 9 लोग अपने ही थे लखीमपुर में।

ज्यादा हो गया…. बांकि के बारे में अगले संपादकीय में

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