लॉकडाउन का पोस्टमार्टम

लॉकडाउन का पोस्टमार्टम
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-राजेश बैरागी-
हालांकि उनमें से कोई भी महामारी विशेषज्ञ नहीं था परंतु उनकी बातें तार्किक थीं। शनिवार-रविवार के लॉकडाउन में खासतौर पर रविवार की शाम को किसी एक के घर के बाहर बैठकर हुक्का गुड़गुड़ाने वाले अडोसी-पड़ोसी आज भी दुनिया जहान की खबरों पर ऐसे तर्क देते हैं कि मसलों पर सतत् निगरानी करने वाले विशेषज्ञ भी हैरान हो जाएं। एक ने कहा,-इस लॉकडाउन का कुछ फायदा नहीं है। सड़कों पर उतने ही वाहन दौड़ रहे हैं तो कैसा लॉकडाउन। दूसरे ने अपना पक्ष रखा कि कोरोना क्या केवल सप्ताह के आखिरी दो दिन ही सक्रिय रहता है।तीसरे ने बोलने के लिए मुंह खोला ही था कि एक युवक ने आकर बताया कि तिलपता गांव (ग्रेटर नोएडा) में खान-पान की बहुत सी दुकानें खुली हुई हैं और उनपर भीड़ भी है। इस सूचना ने उन चारों हुक्केबाजों के निठल्ले चिंतन में आग में घी डालने का काम किया। चारों ने एक स्वर में कहा कि और लगा लो लॉकडाउन, लोग अपने जीने का रास्ता खुद तय कर लेंगे। वार्ता आगे बढ़ रही थी कि इसी बीच उन चारों में से एक का फोन बजा। उधर से बोलने वाले ने बताया कि वह देवला (ग्रेटर नोएडा) के साप्ताहिक बाजार में खड़ा है। इधर से पूछा गया कि साप्ताहिक बाजार में, क्या लॉकडाउन में साप्ताहिक बाजार लगा हुआ है? उधर वाले ने बताया कि न केवल बाजार लगा हुआ है बल्कि भारी भीड़ भी है। मुझे कुछ पेंट व हार्डवेयर का सामान मंगवाना था। मैंने बेटे से कहा,- जरा अमुक दुकानदार से पूछ सुबह कितने बजे दुकान खोलेगा। बेटे ने पूछा तो उस दुकानदार ने कहा,-सुबह के चक्कर में क्यों पड़ते हो, अभी आ जाओ, पीछे के रास्ते से दे दूंगा।'(नेक दृष्टि हिंदी साप्ताहिक नौएडा)

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