भ्रष्टाचार में डुबा है पंचायत

ए सर, मेरे गांव में पक्की गली एवं नालियां बनायी जा रही है ! मैंने एक गली के स्टीमेट के बारे में जानकारी प्राप्त की और फिर बन रही गली की गुणवत्ता को देखा तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा! फिर ठिकेदार जो मेरा गोतिया हीं है, से इस तरह की अनियमितता और लूट के संदर्भ में पुछताछ की तो जो जानकारी मिली, उससे तो मेरा देश के लोकतांत्रिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था पर से विश्वास हीं उठ गया है! — मास्टर साहब बड़े निराश दिखे!

अइसन काहे कहत हउव मास्टर साहब! जानत नइखीं, पुरा प्रशासन उपर से नीचे तक भ्रष्टता में घेंटी तक डुबल ह!! खैर, आपन बात बोलीं!!— मुखियाजी जैसे सब जानते हों!

हाँ तो, उसने बताया कि ब्लॉक का इंजिनियरिंग विभाग वास्तविक खर्च से दो गुणा से भी अधिक का प्राक्लन अर्थात इस्टिमेट तैयार करता है फिर हमें ठिका लेने के साथ हीं 60% कमीशन के रुप में नीचे से उपर तक दे देना होता है फिर बचे रुपयों में निर्माण कार्य भी करना होता है और अपनी बचत भी देखनी होती है |==मास्टर साहब रुके |

इसलिए न मास्टर साहब काम घटिया क्वालिटी का होता है!! — सुरेन्द्र भाई मुंह बिजकाये!!

अजी, हमारे गाँव में पुराने नालियों का रिपेयरिंग हो रहा है लेकिन स्टिमेट नयी नाली निर्माण का बना है जबकि ठिकेदार नालियों के उपर के ईंट का एक परत उखाड़ कर पुनः नया जोड़ कर, उपर से पलस्तर मारवा दे रहा है! बस नाली का काम पुरा और स्टिमेट का 90% पैसा अधिकारियों और ठिकेदार के जेब में —- कहकर सुरेन्द्र भाई हाथ चमका दिये !

आपलोग जानते हीं हैं कि मेरा गाँव चौड़ाई की अपेक्षा लम्बा अधिक है |पुरब से पश्चिम लम्बा है और गाँव के उत्तर बड़े- बड़े गड्ढे थे जिसमें सालों भर पानी रहता था लेकिन गड्ढे के किनारे वाले लोग अपने अपने घर के सामने गड्ढे भरवा कर सड़क से अपने घर को, जोड़ लिये हैं और वो भी मनरेगा और नरेगा स्कीम से | मनरेगा और नरेगा में मजदूरों को रोजगार देने की बात है लेकिन सारा काम ट्रैक्टर और मशीनों द्वारा हुआ और हो रहा है जिसमें घोटाला हीं घोटाला होता है | इन गड्ढों की जमीन सरकारी है जिसपर व्यक्तिगत उपयोग के लिए रास्ता वो भी सरकारी योजनाओं से!!! सरासर भ्रष्टाचार है! इसका बहुत बुरा प्रभाव हमारे गाँव पर पड़ा है!!! —मैं चुप हुआ!

वो क्या सरजी! — मास्टर साहब पुछ बैठे |

पहला तो ये कि जमीन के नीचे के जल स्तर को बनाये रखने में गड्ढों का जल सहायक होता था वो खत्म हो चला है! दुसरा बरसात में पुरे गाँव का पानी गड्ढों की मदद से बहता हुआ सुदूर पूरब भागर में चला जाता था लेकिन अब बरसात में गाँव का पानी गाँव से उत्तर सड़क पार करके सैकड़ों एकड़ खेतों में जमा हो जाता है जिसके चलते खेती नहीं हो पाती! अब आपलोग सोंचिये– मनरेगा, नरेगा में भ्रष्टाचार से पैसे कमाने की व्यवस्था ने हमारे गाँव का कितना नुकसान किया है!!! लेकिन प्रशासन को इससे क्या!! पंचायत के मुखिया एवं अन्य जनप्रतिनिधि को भी अपने हिस्से से मतलब होता है!!! —- मैं गंभीर था!

ठीक कहतानी प्रोफेसर साहब! एक हमनी के टाइम रहे |सरकारी फंड अतना रहे ना! आपन भाड़ा से पंचायत के काम खातिर ब्लॉक बगैरह जात रहीं जा! केहु अंगुली मत उठावे एही डर में कांपत रहीं जा! बाकि आजु, मुखिया के पद ” कौन बनेगा, करोड़पति” के लाटरी हो गईलबा —- मुखियाजी अफसोस जाहिर किये!

मेरे सामने की बात है, विगत पंचायत मुखिया के चुनाव के वक्त, पुरा गाँव मिलकर, प्रोफेसर साहब को मुखिया पद का, चुनाव लड़ने को मनाता रह गया लेकिन ये तैयार नहीं हुए ! दरअसल पुरा गाँव मिलकर चार बिंदु की कसोटी पर उम्मीदवार का चुनाव किया था जिसपर प्रोफेसर साहब पुर्णतः खरे उतर रहे थे! — सुरेन्द्र भाई को बीच में रोकते हुए—

मुखियाजी बोल पड़े–” उ प्वाइंट का रहे!!!”

सुरेन्द्र भाई से पहले पारस नेता बोल पड़े —जी, मे भी जानता हूँ, सुनिये—
पहला– उम्मीदवार काफी पढ़ा लिखा हो!
दुसरा– आले दर्जे का इमानदार हो!
तीसरा– पंचायत फंड के अलावे सीएम, डीएम से बात करके नयी विकास की योजना लाने में समर्थ हो !
चौथा– जिसके अंदर जातिगत भेदभाव न हो !
और इन कसौटियों पर प्रोफेसर साहब खरे उतरते हैं लेकिन इन्होंने यह कहकर इंकार कर दिया कि चूंकि में एक समाजशास्त्री होने के नाते ग्रामीण समुदाय में मुखिया के कर्तव्यों का सही ज्ञान रखता हूँ अत: मेरी दबंगों, ठिकेदारों, आफिसरों सबसे दुश्मनी होगी और बुढ़ापे में कोर्ट कचहरी का चक्कर लगाना पड़ेगा! अब स्टेमिना भी नहीं रहा और गलत काम न कर सकता हूँ और न करने दूंगा फिर तो दिक्कत होगी न!!! — पारस नेता मेरी ओर देख रहे थे !

देखा नहीं आपने 20-20 लोग चुनाव में मुखिया बनने की लालच में खड़े हुए और जीता एक डकैत, चोर, अपहरणकर्ता वो भी जातिवादी राजनीति तथा पैसे से वोट खरीद कर! क्या जमाना आ गया — मास्टर साहब दीर्घ श्वास लिये!

अच्छा, आज अतने रहे दिहल जाव— कहकर मुखियाजी खड़े हो गये और इसके साथ हीं बैठकी भी…..!!

प्रोफेसर राजेन्द्र पाठक (समाजशास्त्री) बक्सर, बिहार

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