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आदेश का पालन

आदेश का पालन
सिखों के गुरु अमरदास जी के अनेक प्रिय शिष्य थे उनमे से कई स्वयं को उनका उतराधिकारी मानते थे लेकिन अमरदास जी ने अभी तक किसी को अपना उतराधिकारी नही चुना था अपना उतराधिकारी चुनने तहत एक दिन
उन्होंने सभी शिष्यों को अपने पास बुलाकर काह तुम सब एक चबुतरा बनाओ मै उसे देखुंगा समस्त शिष्यों ने
अच्छे से अच्छे चबुतरा बनाए एक दिय प्रात; काल अमरदास जी ने चबुतरों का मुआयना किया और कहा “मुझे उनमे से काई भी चबुतरा अच्छा नही लगा सभी लोगा फिर से नया चबुतरा बनाएं
शिष्यों ने दोबारा चबुतरा बनाएं अमरदास जी ने पुन; उन चबुतरो को तोड़ने का आदोश देते हुए कहा “ मुझे
इनमे से भी कोई चबुतरा पसंद नही आया। अब समस्त शिष्यों का धैर्य छूटने लगा वे आपस मे खुसर फुसर
करने लगे कि गुरुजी बूढे होने के कारण ठीक से विचार नहीं कर पा रहें है।लेकिन शिष्य रामदास नया चबुतरा
बनाने मे जुटे शिष्यों ने उनसे कहा” तुम क्या चबुतरा बना रहे हो गुरुजी के आदेश का पालन करके तुम क्यों पालन
हो रहे हो?” रामदास ने कहा” भाइयो! यदि गुरुजी पागल है तो किसी का भी दिमाग सही नही हो सकता अगर गुरुजी सारी उम्र मुझसे चबुतरे बनवाने और तुड़वाते रहें तो भी मै उनके आदेश का पालन करता रहुंगा
गुरु अमरदास ने रामदास से 70 बार चबुतरे बनवाए और तुड़वा दिए लेकिन वे गुरु के आदेस का पालन करते रहे
एक दिन अमरदास जी आए और रामदास को गले लगाकर बोले “ तु मेरा सच्चा शिष्य है और मेरा उतराधिकारी है
फिर गुर अमरदास जी के बाद रामदास जी सिख पंथ के गुरु बने और अपने सेवाओं से मानव जाति को धन्य किया / जो शिष्य बिना किसी तर्क-वितर्क के गुरु के आदेश का पालन करता रहता है वही गुरु बनने का सच्चा अधिकार होता है

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