अब समाज को किताबों की कम और जूते की जरूरत ज्यादा है

बढलते सामाजिक परिदृश्य में समाज की हालत को देखकर तो यही लगता है कि समाज को अब किताबों की जरूरत से ज्यादा जूतों की जरूरत है। पहनने के लिए या खाने के लिए यह तो परिस्थिति पर निर्भर करेंगा। किसी महा पुरुष ने सच ही कहा था की जब किताबे सड़क किनारे रख कर बिकेगी और जूते काँच के शोरूम में तब समझ जाना के लोगों को ज्ञान की नहीं जूते की जरुरत है।

आज वो समय आ गया है, जब किताब सड़क किनारे रखकर बेचे जाते है और जुते के लिए बड़े बड़े शो-रूम खोले गए है। हाई-प्रोफाईल लोगो को उस जुते के सेवा में लगाया जाता है।
आज लेखक की स्थित को देखे तो आपको साफ-साफ समझ में आयेगा कि आज लेखनी की जरूरत नही है। क्योंकि लोग 28 हजार के जुते तो खरीद सकता है लेकिन 700 की किताब उसे बहुत महंगा लगता है। खासकर विश्व के सबसे बड़ा लोकतंत्र में हिंदी और क्षेत्रीय लेखक की यही हालत है। आज समाज में एक अलग सा परिदृश्य देखने को मिलता है। किताबों की स्थिति उस कगार पर जा पहुँची है जहाँ से उसे विलुप्त होने में ज्यादा समय नही लगेगा। लोगों को पूर्ण ज्ञान की जरूरत नही है, इंटरनेट की अधूरा ज्ञान ही काफी है।

गाँव में नीम के पेड़ कम हो रहे है, लेकिन घरों में कड़वाहट बढती जा रही है! जुबान में मीठास कम हो रही है,लेकिन शरीर मे शुगर बढती जा रही है ।
किसी महा पुरुष ने सच ही कहा था की जब किताबे सड़क किनारे रख कर बिकेगी और जूते काँच के शोरूम में तब समझ जाना के लोगों को ज्ञान की नहीं जूते की जरुरत है। आज ज्ञान की जरूरत नही है और जिस समाज को ज्ञान की जरुरत नही हो उसका पतन होना भी निश्चित है।

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