नोएडा भूमि आवंटन : राजनीति और भ्रष्टाचार

नोएडा प्राधिकरण एक भ्रष्ट निकाय है। यह मै नही कह रहा हूँ। सुप्रीम कोर्ट ने एमराल्ड कोर्ट सेक्टर 93 के मामले में कहा। सिर्फ इतना ही नही प्राधिकरण के चेहरे से ही नहीं, बल्कि आंख, नाक और कान से भी भ्रष्टाचार टपकता है। लेकिन यह बात स्पष्ट नहीं है कि यह सिर्फ नोएडा प्राधिकरण के बारे में था या फिर तीनों प्राधिकरण के बारे में। खैर छोड़िये आते है मुद्दे पर आते है।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सुपरटेक बिल्डर के द्वारा बनाए जा रहे दो टावर सियान और अपेक्स को 3 महीने के अन्दर गिराने का आदेश दिया। इसके साथ ही बिल्डर को कहा गया कि उन सभी निवेशकों का पैसा 12% ब्याज के साथ वापस करे। लेकिन बिल्डर इसको लेकर पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगा और निवेशकों के हितों की ध्यान रखने की बात सुप्रीम कोर्ट के सामने रखेगा। यह भी हो सकता है कि एक बिल्डिंग को गिराने और दूसरे बिल्डिंग को बचाने की बात भी याचिका में दाखिल किया जा सकता है।

खैर मामला यह था कि बिल्डर ने एमराल्ड कोर्ट सोसायटी में 24 मंजिल के नक्शा पास कराके 40 मंजिल के टावर बना दिया। सोसायटी में सबसे ऊँची बिल्डिंग बनते देख सोसायटी के लोगों नें आपत्ति किया। लेकिन बिल्डर पर कोई फर्क नही पड़ा। आखिर पड़ता भी कैसे जब इतना बड़ा रसूख हो। सोसायटी के लोगों नें हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और हाईकोर्ट नें फैसला सुनाते हुए बिल्डिंग को ध्वस्त करने का आदेश दिया। फिलहाल बिल्डिंग भी जहदोजद में है किधर जायें। लेकिन निवेशकों को भारी नुकसान हो रहा है।

फिलहाल आज से नोएडा प्राधिकरण में जांच शुरू

एमराल्ड कोर्ट में दोषियों को सजा दिलाने के लिए प्रदेश सरकार सख्त है। लेकिन इतना सख्त है कि मामले में सुप्रीम कोर्ट को फैसला देना पड़ा है। उसके बाद भी अभी भी योगी सरकार सिर्फ और सिर्फ नौकरशाहों और अफसरों को तलाशने की काम में एसआईटी को लगा दिया है जो कि आज से एक्शन मोड में दिखें। एक्शन का असर कितना होगा यह तो आने वाले समय में पता लगेगा। एक्शन होगा भी या फिर आज तक जिस प्रकार की जांच होती रही है यह भी वैसा ही साबित होगा।

नोएडा में सिर्फ एमराल्ड कोर्ट ही नहीं है

आज प्रदेश सरकार इतनी तत्परता दिखा रही है। जांच करके दोषियों को सजा दिलाने के लिए। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या नोएडा में सिर्फ एमराल्ड कोर्ट सोसायटी ही है जिसमें भ्रष्टाचार किया गया है। 2011 में ग्रेटर नोएडा वेस्ट का मामला प्रयागराज हाईकोर्ट पहुंची और जांच की जिम्मेदारी मुख्य सचिव स्तर के अधिकारियों से कराने की दिशा निर्देश प्राप्त हुआ। उस समय में मायावती यानी बहुजन समाजवादी पार्टी की सरकार थी और जमीन की तो लूट मची थी। जिसने जितना पाया लूटा। ग्रेटर नोएडा में मास्टर प्लान को ताक पर रखते हुए भूमि का उपयोग बदला गया। जिस भूमि पर उद्योग लगाना था उसे आवासीय बनाकर बिल्डर को दे दिया गया। जिसकी जांच उस समय मे की गयी लेकिन सत्ता बदली और सपा की सरकार आयी। जांच आज तक पूरी नहीं की गई। यह भी कहना ठीक होगा कि जांच तो हुई लेकिन फाइल को दफन कर दिया गया सपा सरकार के द्वारा।

उसके बाद साल 2012 में हाईकोर्ट के निर्देशन में मास्टर प्लान रिवाइज किया गया और 25 % मकान EWS और LIG बनाने का निर्देश दिया गया। जिसके बदले में बिल्डर को एक्स्ट्रा एफएआर दिए गए थे। लेकिन आज तक पता नही चला कि 25 % मकान कहाँ चला गया। पीएम ग्रीवन्स से जबाब मांगो तो कहते है यह मामला रेरा का है। बिल्डर और बायर का मामला है। यह बिल्डर का मामला जरूर है लेकिन बायर का नही है। बायर का मामला तो है उसके पैसे लेकर उसका मकान नही दिया गया है। गरीबों के लिए दिए गए एक्स्ट्रा एफएआर को भी बेच दिया गया।
प्लानिंग विभाग के इसी लचीली रवैया के कारण सरकार को हजारों करोड़ की चुना लगा है।  

उस एक्स्ट्रा एफएआर को भी बिल्डर नें बेच लिया और आज तक प्लानिंग और फाइनेंस विभाग को यह नहीं पता कि बिल्डर को कितना एफएआर दिया गया। प्लानिंग विभाग के इसी लचीली रवैया के कारण सरकार को हजारों करोड़ की चुना लगा है। स्टाम्प विभाग उस समय तक स्टाम्प ड्यूटी नहीं ले सकता जब तक उसको बताया न जाय कि किस बिल्डर को कितना एफएआर दिया गया है। प्लानिंग विभाग बताएंगे क्यों ? जो चीज छुपाने में फायदा देता हो उसे उठाकर अपने और बिल्डरों की नुकसान क्यों करेंगे ? आखिर कोई तो कारण होना चाहिए कि प्लानिंग और फाइनेंस विभाग बताये कि कितना एफएआर बिल्डर को दिया गया है ?

कहानी बहुत पुरानी है। सीएजी नें 15 सालों की डाटा खंगाला है और कई मामलों में आपत्ति भी दर्ज की है। जनता को उम्मीद था प्रदेश के योगी सरकार सीएजी ऑडिट रिपोर्ट को विधान पटल पर रखकर राजनीतिक भ्रष्टाचार की काली करतूत उजागर करेगी। लेकिन यह सरकार भी सीएजी पर चुपी साधकर सिर्फ एमराल्ड कोर्ट में एसआईटी बनाई है। एसआईटी तो स्पोर्ट्स सिटी और रिक्रिएशन पार्क को लेकर भी बनायी जानी चाहिए। 25% EWS और LIG के मकान को लेकर भी बनाए जाने चाहिए। एसआईटी तो बिल्डरों के द्वारा लिए गए एक्स्ट्रा एफएआर को लेकर भी बनायी जानी चाहिए। और एक बात एसआईटी आईटी/आईटीज के लिए आवंटित भूमि के लिए भी बनाई जानी चाहिए। क्या भूमि का उपयोग सही किया गया है नही।

जांच तो रेहड़ी पटरी वालों को लेकर भी किया जा सकता था लेकिन 20 लाख करोड़ की बडे मामले के सामने यह थोड़ा छोटा है। उम्मीद करते है कि रेहड़ी पटरी में भ्रष्टाचार ऐसे ही दिन-दूनी  और रात-चौगुनी की दर से विकास होता रहे ताकि जब यह करोड़ों का मामला होगा तो लिखने में थोड़ा अच्छा लगेगा। रेहड़ी पटरी वाले बता रहे थे कि 50 हजार में वेंडरों को फर्जी लाइसेंस बनाकर दिया जा रहा है। खैर अभी एसआईटी एमराल्ड कोर्ट को लेकर जांच करने आ रही है। अगला नंबर किसका होगा यह देखना है और एसआईटी जांच में कितना कुछ निकलता है यह भी बड़ा दिलचस्प होगा।

फिलहाल एसआईटी के चार सदस्यीय टीम में अवस्थापना व औद्योगिक विकास आयुक्त संजीव मित्तल, अपर मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह, अपर पुलिस महानिदेशक राजीव सब्बरवाल एवं मुख्य नगर व ग्राम नियोजक अनूप कुमार श्रीवास्तव शामिल है। उम्मीद है कि एमराल्ड कोर्ट के बाद एफएआऱ पर भी एफआईआर होगी। अन्यथा यह नाइंसाफी से कम नही।  इंतजार तो यह भी रहेगा कि कोई भी राजनीतिक पार्टी या भ्रष्ट राजनेता के दामन पर घोटाला का दाग न लगे।

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