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मदरसों के मौलवियों की तरह कोई सरकार इन्हें वेतन नहीं देती।

डोरवेल बहुत ही संकोच में बजाई गयी थी,
तो मैं चौंका!!
कौन होगा….
दाई, नौकर, ड्राइवर धोबी दादा,
या सब्जी वाला!!
सबकी डोरवेल बजाने की स्टाइल अलग अलग ही होती है।

वैसे भी 45 दिन से अधिक चल रहे अज्ञातवास में न कोई दोस्त आ रहे न कोई रिश्तेदार।

गेट पर जाकर देखा तो मोहल्ले के मंदिर के पुजारी
वयोवृद्ध पंडित जी खड़े थे।

चरण स्पर्श भी नहीं कर सकते थे,
(social distance जो मेंटेन करना था)

सो ससंकोच दूर से ही करबद्ध सादर प्रणाम किया।
उन्होंने आशीर्वाद देते हुये पुराने किन्तु साफ-सुथरे थैले से मंदिर का प्रसाद निकाल कर दिया।

हम दोनों मुँह में गमछा लपेटे एक दूसरे को देख रहे थे।

पंडित जी ने कहा कि अक्षय तृतीया भी व्यतीत हो गयी, आज मंगलवार था ।
पर आप नहीं आए ।

हमने वर्तमान परिस्थिति स्पष्ट करते हुये समझाना चाहा कि स्थिति आप देख ही रहे हैं।
अब तो भगवान जब सब ठीक ठाक करेंगे तभी आना होगा।

तभी पंडित जी ने मुँह से अपना गमछा हटाया,
वे धीरे-धीरे सुबकते हुये बोले कि आप लोगों के दान और चढ़ावे से ही मेरे परिवार का भरण पोषण होता है…..
एक महीने से सब बंद है…
भूखों मरने की नौबत है।
हमलोगों के लिए अन्य कोई व्यवस्था नहीं है……..
हमें भूख नहीं लगती है क्या ??
हम भी आपके धार्मिक मजदूर ही तो हैं ।

हम उद्विग्न हो उठे……
अपने परिवार को कोरोना से सुरक्षित रखने की चिंताओं के बीच इनकी चिंता ही हमें नहीं रही।
हमने उन्हें शाब्दिक सान्त्वना देते हुये…घर के अंदर आने का आग्रह किया।
सूखे कपोलों में ढलके आँसू पोंछते हुये…
पंडित जी ने स्वल्पाहार लेने से मना कर दिया..
बोले
घर में सब भूखे बैठे हैं, मैं कैसे खा लूँ ?

हमने तत्काल मोहल्ले की परचून के दूकानदार को फोनकर महीने भर का राशन पुजारी जी के यहांँ पहुँचाने का आग्रह किया तो पुजारी जी संतुष्ट हुये।
हजारों आशीष देते हुये बार बार पीछे मुड़ मुड़कर हमें कृतज्ञ नेत्रों से देखते हुये पुजारी जी वापस जा रहे थे ।

धर्म वाहकों का भी ध्यान रखें….
सड़क चलते राहगीरों से हाथ फैलाकर भिक्षा माँगने के लिए इन्हें विवश न करें।
मदरसों के मौलवियों की तरह कोई सरकार इन्हें वेतन नहीं देती।
हमारे आपके आश्रय से ही इनका परिवार भी पलता है ।

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