भाजपा के चंडीगढ़ में बिजली नहीं, बदायूं में ट्रेन नहीं

नरविजय यादव

देश की पहली प्लांड सिटी चंडीगढ़ इस वक्त एक अजीब स्थिति से गुजर रही है, जो कि कोरोना काल से भी ज्यादा मुश्किल साबित हो सकती है। वजह है चंडीगढ़ के बिजली विभाग के कर्मचारियों की तीन दिन की हड़ताल, जो सोमवार रात 12 से शुरू हो चुकी है। वे चंडीगढ़ में बिजली विभाग के निजीकरण का विरोध कर रहे हैं, जबकि यूटी प्रशासन की ओर से मार्च में ऐसा करने की तैयारी चल रही है। बिजली कर्मचारियों की यूनियन ने दो माह पूर्व ही हड़ताल का नोटिस दे दिया था, लेकिन प्रशासन की ओर से इस दिशा में कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई जो चिंता का विषय है। सबसे बड़ी चिंता तो अस्पतालों को लेकर हैं जहां अनेक मरीज आईसीयू में अथवा वेंटिलेटर जैसी मशीनों पर हैं और उनकी जान के लिए खतरा है। शहर के इंडस्ट्रियल एरिया में फैक्ट्रियां बंद हैं और प्रतिदिन 60-70 करोड़ रुपए तक का औद्योगिक नुकसान होने का अंदेशा पैदा हो गया है।

इसके अलावा, ऑनलाइन परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के सामने दिक्कत खड़ी हो गई है। सोमवार रात से ही शहर के कई हिस्सों में बिजली गायब है और प्रशासन के पास बिजली की खराबी दुरुस्त करने के लिए कोई इंतजाम नहीं है। अधिकारियों को आपात स्थिति के लिए तैनात किया गया है, लेकिन उसका कोई लाभ नहीं है, क्योंकि जमीनी लेवल पर बिजली ठीक करने के लिए लाइनमेन और इलेक्ट्रिशियन नहीं हैं। बिजली न होने से कई क्षेत्रों में पानी की सप्लाई नहीं हो पाई है। सड़कों पर ट्रेफिक लाइटें काम नहीं कर रही हैं और शहर में परेशानी के हालात हैं। सोचिए, एक सुव्यवस्थित शहर में ऐसा हो रहा है, देश के छोटे शहरों का क्या हाल होता होगा?

अब देश के एक छोटे शहर का हाल जानिए। एक समाचार पत्र के जरिए पता लगा कि उत्तर प्रदेश के बदायूं शहर में रेलवे स्टेशन है लेकिन लखनऊ या दिल्ली जाने के लिए एक भी ट्रेन नहीं है। पहले इस शहर में मीटर गेज की छोटी लाइन हुआ करती थी, जिसे बड़ी लाइन में बदल दिया गया, लेकिन शहर की कनेक्टिविटी दुरुस्त करने के लिए रेलवे मंत्रालय या राजनीतिक प्रतिनिधियों द्वारा कुछ नहीं किया गया। गंगा जमुनी तहजीब वाले इस ऐतिहासिक महत्व के जिले में कृषि के अलावा अन्य कोई बिजनेस गतिविधि न के बराबर है। छोटी लाइन के समय में बदायूं की कनेक्टिविटी आगरा, कासगंज और बरेली से थी। देश और प्रदेश की राजधानियों को जाने वालों के लिए बसों से आने जाने के अलावा और कोई चारा नहीं है। शहर की सांसद भारतीय जनता पार्टी की डॉ. संघमित्रा मौर्य हैं, जो बस नाम की ही सांसद हैं। इनके पिता स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपा छोड़ कर सपा का दामन थाम चुके हैं।

बदायूं में डॉ. संघमित्रा मौर्य और चंडीगढ़ में अभिनेत्री किरण खेर दो ऐसी सांसद हैं, जिनके होने या न होने से इनके संसदीय क्षेत्रों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता है। दोनों ही भाजपा के टिकट पर खड़ी होने और प्रधानमंत्री मोदी के कारण चुनाव जीत चुकी हैं और इनके शहरों की जनता हाथ मल रही है। राष्ट्रीय पार्टी के कैंडीडेट को जिताने का कई बार यह खामियाजा भुगतना पड़ता है कि वह काम के न होकर महज दिखावे के होते हैं और पांच साल के लिए सब कुछ ठप हो जाता है।

नरविजय यादव वरिष्ठ पत्रकार व कॉलमिस्ट हैं।

ईमेल: narvijayindia@gmail.com

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