नेहरू और निराला : रामचंद्र गुहा

नेहरू और निराला : रामचंद्र गुहा
कई सालों पहले, समाजशास्त्री त्रिलोकी नारायण पाण्डेय ने मुझसे एक घटना का ज़िक्र किया था, जो जवाहरलाल नेहरू और हिंदी के प्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ से जुड़ी हुई थी। प्रधानमंत्री नेहरू तब अपनी चीन की यात्रा से लौटे ही थे और अपने गृहनगर इलाहाबाद में एक सभा को संबोधित कर रहे थे। वह इलाहाबाद, जहाँ तब निराला रहा करते थे और त्रिलोकी पाण्डेय तब छात्र हुआ करते थे। निराला सभा में अगली पंक्ति में बैठे हुए थे, खुला हुआ सीना, जिस पर अभी-अभी तेल की मालिश हुई थी। ऐसा लगता था जैसे निराला, जो कुश्ती के दाँव-पेंच में भी महारत रखते थे, सीधे अखाड़े से होकर सभा में चले आए हों। निराला अपनी उस अनूठी मुद्रा में सबके आकर्षण का केंद्र थे। नेहरू ने अपना भाषण शुरू करने से पहले अपने कुछ प्रशंसकों द्वारा पहनाई जा रही मालाओं को स्वीकार किया और फिर अपना भाषण शुरू करते हुए नेहरू ने एक किस्सा सुनाया, “मैं चीन से लौटा हूँ और वहाँ मैंने एक कहानी सुनी। एक महान राजा और उसके दो बेटों की कहानी। एक चतुर और दूसरा मूर्ख। जब ये बेटे बड़े हो गए, तो राजा ने कहा कि मेरा मूर्ख बेटा राजा बनेगा, क्योंकि वह सिर्फ़ शासक बनने लायक ही है। पर मेरा चतुर और विद्वान बेटा कवि बनेगा क्योंकि वह महान कार्य करने के लिए बना हुआ है”। यह कहकर नेहरू ने अपने गले से माला उतारी और श्रद्धाभाव से निराला के पैरों की तरफ उछाल दिया ।
साभार: द हिंदू, 12 मार्च 2006.

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