बाजरा कथा

बाजरा हमारे देश की एक महत्वपूर्ण खाद्य फसल है। खेती प्रदेश के कई जिलों और देश के कई राज्यों में होती है। मेरे जनपद प्रतापगढ़ में भी सई के किनारे के ग्रामों में बाजरे की फसल बहुत अच्छी एवं बहुतायत की जाने वाली फसल थी, बलुई दोमट मिट्टी बाजरे की फसल के लिए अच्छी होती है इसलिए यहां इसका उत्पादन बहुत अच्छा होता है सिंचाई की इसमें कम आवश्यकता होती है इसलिए कम पानी में भी उत्पादन अच्छा हो जाता है गांव में कहावत थी कि “3 बज्रे बजरी” हल और बैल की खेती में किसान इसे बड़ी मेहनत से उगाते थे. खेतों की तैयारी में सुदूर नदी किनारे एकांत में किसान का बैलों के साथ किसानों के एकाकी शब्द हट ,दाहिन,बांव आदि बहुत सुरीले लगते थे।
जिस बाजरे को खाने में बचपन में काला होने का डर रहता था ,वह बाजरा बहुत ही ताकतवर और पोषक तत्वों से भरपूर है। प्रातः नाश्ते के रूप में लेना घूघ्नी के रूप में लेना गांव में आम बात थी बड़े से बड़े लोग भी बाजरे का सेवन करते थे हमारे गांव में 40 साल पहले एक बड़े झगड़ू नामा सेठ हुआ करते थे। 1 दिन सवेरे सवेरे कोई दवा लेने में उनके यहां पहुंचा तो देखा की बाजरा उबालकर गुड़ के साथ खा रहे थे। बड़े सेठ थे बड़ा नाम था परंतु इसके गुणों से परिचित होकर ही शायद वाह इसे बड़े चाव से खा रहे थे ।मुझे देखते ही उन्होंने अंगौछे से ढक लिया था। बचपन में बाजरा बहुत हुआ करता था चाहे अनचाहे ठंडी ओं में खूब खाया जाता था बाजरे से तरह-तरह की वैरायटी के खाद्य बनते थे रोटी तो सबसे आम थी और इसका भात भी अच्छा बनता था। परिवार में संख्या पर्याप्त होने के कारण पर भात बड़े बटुए में पकाया जाता था जिन्हें शाम तक दूध, मट्ठा ,दही और हरी सब्जियों के साथ खूब खाया जाता था।
इसके बड़े डंठल को चारा मशीन में काटकर जानवरों के लिए चारा बनाना बहुत मेहनत एवं रूचि का काम था। हाथ से भी लोग काटकर जानवरों को खिलाते थे। एक पड़ोसी हाथ से जानवरों का छोटा-छोटा टुकड़ा काटने के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। सवेरे 4:00 बजे उठकर अंधेरे में ही गढ़ा से से चारा काटते थे और मुझे याद है कि उनका इतना अभ्यास था कि कभी भी गड़ासा उनके हाथ में नहीं लगा और उजाला होते तक चार पांच जानवरों का दिन भर खाने का राशन तैयार कर देते थे।
बाजरा उगाने की प्रक्रिया भी काफी अच्छी है। खेतों की अच्छी तरह निराई गुड़ाई करके बोया जाता था बरसात की सीजन की फसल होने के कारण बहुत ज्यादा पानी देने की जरूरत नहीं होती थी और अक्टूबर-नवंबर तक फसल तैयार हो जाती थी। फसल तैयार होने पर दो तरह के नुकसान की संभावना रहती थी एक तो अंतिम बारिश जो हथिया नक्षत्र में तेज हवाओं के साथ होती थी से फसल के गिरने के चांसेस रहते थे दूसरे फसल तैयार होने पर चिड़ियों के द्वारा चुने जाने का भय रहता था। छोटे किसान अपने बच्चों को डब्बा लेकर हराने के लिए भेजते थे और बच्चे जाकर डब्बा बजाकर खेत के किनारे हड़ा हड़ा करते थे। चिड़िया प्राय:सवेरे ही आहार करती हैं इसलिए सवेरे उठकर चिड़िया हटाना पड़ता था जिससे कुछ बच्चे जब स्कूल देर से पहुंचते तो मास्टर को बताते की चिड़िया हड़ाने गए थे।
खेती करना बहुत ही स्वास्थ्यवर्धक है.” आचार्य विनोबा जवाहरलाल नेहरू को भी एक घंटा खेती का काम करने के लिए कहते थे उनका कहना था कि एक घंटा खेती करके आप 15 घंटों का काम 10 घंटों में कर सकते हो।”
12वीं कक्षा पास होने के पश्चात खेती करना मेरी भी मजबूरी हो गई थी सभी भाई लोग आजीविका के लिए गांव से बाहर चले गए तो खेती का के काम में पिताजी को मदद के लिए हाथ बढ़ाना पड़ता था। खेती का काम करने में अप्रतिम सहयोगी थे एक पड़ोसी और एक ट्रांजिस्टर। सब्जी की खेती मेरी अगर उसका काम था दूसरी खेती भी पड़ोसी किसानों को देखकर और आवश्यकतानुसार की ही जाती थी। खेती करते समय मेड़ पर रखा गया ट्रांजिस्टर बहुत काम का साबित हुआ। जनरल नॉलेज एवं अन्य उपयोगी नालेज ट्रांजिस्टर से मिले वह अप्रतिम है। बच्चों और विद्यार्थियों के लिए आकाशवाणी से प्रसारित कार्यक्रम बहुत ही उपयोगी होते थे। जो प्रायः खेत की मेड़ पर ट्रांजिस्टर रखकर ही सुने जाते थे।
बाजरे को स्मृतियों में रखने का एक प्रयास है‌।

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