अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस (21 फरवरी)

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अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस (21 फरवरी)

यह एक मनोवैज्ञानिक और सर्वमान्य तथ्य है कि हम अपनी मनोभावनाओं को जितनी सूक्ष्मता, भावनात्मक और करुणामयी रुप से अपनी मातृभाषा में व्यक्त कर सकते हैं, उतना किसी दूसरे की भाषा में व्यक्त कर ही नहीं सकते । मातृभाषा बोलने -सुनने में अपूर्व सुख प्राप्त होता है, क्योंकि इसके साथ हमारी अनेक खट्टी-मीठी यादें जुड़ी होती है । कवि कोकिल विद्यापति ने मातृभाषा के महत्व को रेखांकित करते हुए लिखा है ” देसिल बयना सब जन मिट्ठा”। विचार संप्रेषण जितना व्यापक मातृभाषा द्वारा हो सकता है , उतना अन्य भाषा द्वारा संभव नहीं ।

मातृभाषा सामाजिक एकता, देशभक्ति, प्रेम -मुहव्वत, भाईचारा को बढ़ाता है । मातृभाषा द्वारा ज्ञानार्जन, इसके विस्तार, उपयोग सहज और स्वाभाविक रूप से होता है । इसमें मौलिकता, अपनापन का अहसास होती हैं । मातृभाषा से व्यक्ति के स्वाभिमान जागृत होता है और उसकी चतुर्मुख व्यक्तित्व का विकास होता है। मातृभाषा की उन्नति सब प्रकार की उन्नति का मूल है । भारतेंदु हरिश्चंद्र निज भाषा का महत्व बताते हुए लिखा है :

‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटन न हिय के सूल।

संसार के विविध भाषाओं, सांस्कृतिक / सामाजिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा देने और विभिन्न मातृभाषाओं के प्रति जागरुकता एवं सम्मान दर्शाने हेतु प्रत्येक वर्ष 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने की परंपरा है। यूनेस्को द्वारा इस बार 2022 के अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का विषय (थीम), “बहुभाषी शिक्षा के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग: चुनौतियां और अवसर” (“Using technology for multilingual learning: Challenges and opportunities”), बहुभाषी शिक्षा को आगे बढ़ाने और सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और सीखने के विकास का समर्थन करने के लिए प्रौद्योगिकी की अपनी महत्वर्ण भूमिका है ।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की प्रेरणा के मूल में 21 फरवरी, 1952 को बंगलादेश के ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं पर तत्कालीन पाकिस्तान सरकार की बर्बरता और जुल्म की दास्तान है । पाकिस्तानी सरकार की भाषाई नीति का कड़ा विरोध जताते हुए अपनी मातृभाषा बांग्ला के अस्तित्व और अस्मिता बनाए रखने हेतु छात्रों द्वारा बड़ा आंदोलन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में छात्रों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं का पुलिस के गोलियों के कारण शहीद होना पड़ा । मातृभाषा के लिए दिए गए इस अदभुत और अभूतपूर्व बलिदान की याद में 21 फरवरी 1999 को मातृभाषा दिवस के रूप में मानने की युनेस्को द्वारा घोषणा की थी । 21 फरवरी, 2000 के यूनेस्को मुख्यालय पेरिस में एक समारोह के दौरान प्रथम बार मातृभाषा दिवस मनाया गया और यह निर्णय लिया गया कि सभी देश 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस मनाया करेंगे । तभी से यह दिवस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मातृभाषा दिवस के रूप में विश्व के सभी देशों में मनाया जाता है । संयुक्त राष्ट्र ने 2008 में इसकी स्वीकृति प्रदान की । यूनेस्को के अनुसार भाषा केवल संपर्क, शिक्षा या विकास का माध्यम न होकर व्यक्ति की विशिष्ट पहचान है, उसकी संस्कृति, परंपरा एवं इतिहास का कोष है ।

कोस कोस पर बदले बानी, चार कोस पर पानी …ये कहावत मातृभाषा की महत्व को दर्शाने हेतु उपयुक्त है। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों का समग्र विकास मातृभाषा के माध्यम से ही संभव है । अभिव्यक्ति का सबसे सुलभ एवं आसान माध्यम मातृभाषा ही है । गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने कहा है कि, ” विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा किसी सभ्य देश में प्रदान नहीं की जाती। विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा देने से छात्रों का मन विकार ग्रस्त हो जाता है और वह अपने ही देश में प्रदेशी के समान मालूम पड़ते हैं ” । भारतेंदु जी ने मातृभाषा में शिक्षा की अवधारणा को भी साकार करने का वकालत किया हैं ‘और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात, निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।’ वे आगे लिखते भी है कि ‘अंग्रेजी पढ़के जदपि, सब गुण होत प्रवीन। पै निज भाषा ज्ञान के, रहत हीन के हीन।’ यानी अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषाओँ में प्राप्त शिक्षा से आप प्रवीण तो हो जाओगे किंतु सांस्कृतिक एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण से हीन ही रहोगे।

महात्मा गांधी ने कहा था- विदेशी माध्यम ( शिक्षा) ने बच्चों के तंत्रिका पर भार डाला है, उन्हें रट्टू बनाया है, वे सृजन के लायक नहीं रहे । कई अन्य महापुरुषों और शिक्षाविदों ने भी इसी प्रकार के सुझाव दिए हैं कि शिक्षा मातृभाषा में दी जानी चाहिए । इन्हीं भावनाओं के अनुकरण में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा नीति में सिफारिश की गई है कि, जहां तक संभव हो शिक्षा के माध्यम के रूप में 5वीं कक्षा तक मातृभाषा /घर की भाषा /स्थानीय भाषा /क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग किया जाए और 8वीं कक्षा व उसके बाद की शिक्षा में भी इसकी पूरी कोशिश की जाए.

देश की परिकल्पना हम उसके भाषाई आधार के साथ करते है और अगर उस देश की मातृभाषा के लिए चिंता करने की जरूरत पड़ने लगे, तो यह परेशान करने वाली बात है । ऐसा क्यों होता है जब कोई विशेष दिवस आता है, तभी हम उनकी विशेषताओं पर ध्यान देते है । जब देश और समाज के भीतर ही अपने मातृभाषा के प्रति संकीर्ण मानसिकता मौजूद हो तो तो ऐसे में एक दिवस मनाने भर से मातृभाषा विकास नहीं करेगी । आज मातृभाषा का महत्व सिर्फ सामाजिक रीति रिवाज, परंपरा निबाह के लिए रह गया है, न कि रूचि के लिए । लोग मातृभाषा इस्तेमाल नहीं करना चाहते है, बड़े मंचो से इसे बोलने में कठिनाई और शर्म महसूस करते है ।

संयुक राष्ट्र के अनुसार विश्व में बोली जाने वाली भाषाओं की संख्या लगभग 6900 है, इनमें से 90 % भाषाएं बोलने वाले की संख्या 1 लाख से भी कम है । लगभग 150 से 200 भाषाएं ऐसी है जिन्हें 10 लाख से अधिक लोग बोलते हैं । एक अनुमान के मुताबिक अगले 40 साल में 4000 से अधिक भाषाओं के खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है । एक अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 50 साल में भारत के करीब 20 प्रतिशत भाषा विलुप्त हो गई है ।

यह मुमकिन है कि मातृभाष रोजगार की भाषा ना हो, लेकिन ये संस्कार की भाषा अवश्य होती है । मातृभाषा में प्रवीण हुए बिना अन्य भाषाओं (यथा अंग्रेजी) पर अधिकार संभव नहीं है । मातृभाषा से प्रेम, व्यक्तित्व के विकास की मूलभूत आवश्यकता है । मां, मातृभूमि और मातृभाषा का कोई विकल्प नहीं है ….ऋग्वेद के अनुसार अपनी मातृभूमि, अपनी संस्कृति और अपनी मातृभाषा का सम्मान करना चाहिए क्योंकि ये सुख के दाता हैं …

प्रवीण कुमार झा

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