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सबसे बड़ा तीर्थ

पार्वती की बेटी मीना ही उसके जीवन का आधार थी मीना के पिता की मृत्यु उसकी बाल्यावस्था मे ही हो गई थी पार्वती अपनी बेटी मीना के लालन पालन और शिक्षा दीक्ष के लिए तन मन मे जुटी थी इस प्रकार धीरे धीरे समय बीतता रहा और मीना सोलह वर्ष की हो गई
एक दिन स्कूल से लौटते समय मीना बारिश मे भीग गई इस कारण उसे ज्वर चढ़ गया फिर उसकी तबीयत दिनो दिन बिगड़ती चल गई पार्वती ने मीना का इलाज कराने मे कसर नही छोड़ी लेकिन उसकी बीमारी जान का नाम नही लेती थी अत पार्वती मंदिर गई और भगलान से प्रार्थना लगी हे भगवान मेरी बेटी को जल्दी से अच्छा कर दो मै प्रसाद चढ़ाऊगी और तीर्थयात्रा करुंगी।
फिर मिना दो चार दिनो में भी पुर्णत: ठिक हो गई और स्कुल भी जाने लगी उधर पार्वती अपने वचनानुसार तीर्थयात्रा पर जाने की त्यारी में लग गयी । तीर्थयात्रा पर जाने से एक रात पहले पार्वती को सामने के एक घर से किसी की सिसकने के आवाज सुनाई दी । जब पार्वती वहा गई तो देखा की उसकी पड़ोसन सीता रो रही है . पार्वती ने सीता से उसके रोने का कारण पुछा सिता बोली मेरे पती कई दिनो से बिमार है । डाक्टर ने कई टेस्ट और एक्स-रे कराने को कहा है । मगर घर में एक पैसा भी नही है । सीता की बात सुनकर पार्वती बोली वहन घबराओ नही भगवान तुम्हारे पती को जल्दी ठिक कर देगा । फिर पार्वती अपने घर गए और तिर्थयात्रा पर जाने लिए उसने जो पैसे रखे थे । उसे लाकर सीता के हाथ पर रख दिया । सीता बोली पार्वती वहन तीर्थयात्रा तो बड़े पुण्य का काम है । और तुम तिर्थयात्रा पर न जाकर ये पैसे मुझे दे रही हो ।
पार्वती ने कहा ,” सीता वहन तिर्थयात्रा तो फिर हो जायेगी । इस समय तुम्हे पैसे की आवश्यक्ता है . तुम अपने पती का उपचार कराओ ।
किसी की सहायता और सेवा से बढकर कोई तिर्थयात्रा नही है । जीसने इस तथ्य को जान लिया उसका मन सबसे बड़ा तीर्थ बन जाता है ।

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