नसीरुद्दीन शाह की पोल खोलना बहुत जरूरी है !

– जिस तरह आज अमेरिका अपने साथ अफगानी मुसलमानों को ले जा रहा है । ठीक वैसे ही नसीरुद्दीन शाह के पुरखों को अंग्रेज भारत लेकर आए थे । दरअसल 1839-40 में पहला एंग्लो अफगान युद्ध हुआ था । इस युद्ध में एक अफगान पश्तून या पठान जमींदार जां फिशां खां ने अंग्रेजों का साथ दिया था । जब अंग्रेज अफगानों से युद्ध हार गए तब अंग्रेजों ने जां फिशां खां को अफगानिस्तान से लाकर मेरठ के सरधना में बसा दिया था और उनको एक रियासत दे दी थी । इन्हीं जां फिशां खां के खानदान में जन्म हुआ है… नसीरूद्दीन शाह का ।

– जां फिशां खां…खानदानी गद्दार था… पहले उसने अफगानिस्तान में अपने देश के अंदर गद्दारी की और अंग्रेजों का साथ दिया और 1857 के संग्राम में भी जां फिशां खां ने अंग्रेजों का साथ दिया था । कुल मिलाकर नसीरुद्दीन शाह अंग्रेजों के भाड़े के टट्टुओं के खानदान से ताल्लुकात रखते हैं ।

– ये तो नसीरुद्दीन शाह और उनके खानदान का परिचय है… बाकी अब ज़रा ये भी देख लें कि आखिर उन्होंने कहा क्या है ?

नसीरुद्दीन शाह ने एक वीडियो में कहा…

“अफगानिस्तान में तालिबान का दोबारा हुकूमत पा लेना दुनिया भर के लिए फिक्र का मसला है इससे कम खतरनाक नहीं है हिंदुस्तानी मुसलमानों के कुछ तबकों का उन वहशियों की वापसी पर जश्न मनाना । आज हर हिंदुस्तानी मुसलमान को अपने आप से ये सवाल पूछना चाहिए कि उसे अपने मजहब में सुधार, आधुनिकता चाहिए या पिछली सदियों का वहशीपन और बार्बरिक वैल्यूज़। हिंदुस्तानी इस्लाम हमेशा दुनिया भर के इस्लाम से अलग रहा है और खुदा वो वक्त ना लाए कि वो इतना बदल जाए कि हम उसे पहचान भी ना सकें।”

– यानी नसीरुद्दीन शाह ने अपने बयान में हिंदुओं को मूर्ख बनाने की कोशिश की… और ये कहा कि हिंदुस्तानी इस्लाम मुख्तलिफ यानी अलग इस्लाम है । लेकिन ये बात उनकी बिरादरी से आने वाले मुसलमानों ने ही गलत साबित कर दी । यानी मुसलमानों ने ही मुसलमानों की पोल खोल दी यानी एक दूसरे के कपड़े फाड़ दिए ।

– नसीरुददीन के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए लखनऊ के मौलाना खालिद रशीद फिरंग महली ने कहा… लोग मजहब-ए-इस्लाम के बारे में तरह तरह की बात कर रहे हैं तो मजहब-ए- इस्लाम वही है जो हमारे कुरान हमारे हदीस में मौजूद है । (और कुरान तो काबुल, कराची और कलकत्ता में एक ही है अलग नहीं है- लेखक की टिप्पणी)

सहारनपुर देवबंद के एक मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा कि एक्टर नसीरुद्दीन शाह ने जो बयान दिया है कि हिंदुस्तान का इस्लाम अलग है और अफगानिस्तान का इस्लाम अलग है इस तरह के बयान विवादित बयान हैं पूरी दुनिया का इस्लाम एक है जो कुरान और हदीस को मानता है यही इस्लाम है ।

हैदराबाद के मौलाना पीर अली कादरी ने कहा कि नसीरुद्दीन शाह साहब को थोड़ा ये करेक्शन करने की जरूरत है कि दुनिया में किसी कोने में हो… इस्लाम एक ही है…. हिंदुस्तान का इस्लाम सऊदी अरब का इस्लाम…. अलग कोई दूसरे मुल्क का इस्लाम… अलग कतई नहीं हो सकता है… इस्लाम के जो प्रैक्टिस है सारी दुनिया में एक ही है और किसी किस्म का कोई चेंज नहीं हो सकता है ।

– कई मुसलमानों ने ट्विटर पर ट्वीट भी किया था कि नसीरुद्दीन शाह गलत कह रहे हैं क्योंकि 1400 साल पहले जो इस्लाम था वो हर तरह से कम्लीट है और उस पर टीका टिप्पणी करके नसीरुद्दीन शाह ने गलती की है इस्लाम के हिसाब से कुफ्र किया है ।

– यानी एक बार फिर मजहब-ए-इस्लाम पूरी दुनिया के सरेमंजर पर एक्सपोज हो गया… नसीरुद्दीन शाह के बयान को (जो हिंदुओं को मूर्ख बनाने के लिए ही था) इस्लाम के आलिम उलेमाओं ने गैरइस्लामी करार दिया ।

-दरअसल जिन मौलानाओं ने इस्लाम का असली चेहरा हिंदुस्तान को दिखा दिया उन मौलानाओं के कट्टपंथ से तो हिंदुस्तान निपट ही लेगा लेकिन सबसे ज्यादा मुश्किल नसीरुद्दीन शाह और जावेद अख्तर जैसे लोगों से निपटना है जो मीठी छुरी की तरह हिंदुस्तान की बर्बादी का सपना देख रहे हैं ।
-नसीरुद्दीन शाह ने समाज सुधार की बात कही है कि इस्लाम में सुधार होना चाहिए लेकिन क्या इस्लाम में सुधार की कोई गुंजाइश है । बिलकुल नहीं इस्लाम में सुधार को तकलीद कहा जाता है । और तकलीक का जिम्मा इस्लाम में सिर्फ और सिर्फ आलिम उलमा यानी इस्लाम के विद्वानों को ही है… आम लोगों को इस्लाम में किसी तरह का सुधार करना का जिम्मा नहीं दिया जाता है ।

-कुल मिलाकर नसीरुद्दीन शाह जैसे किसी भी एक्टर के बयान को सुनने समझने या समर्थन करने से पहले जरूरी है कुरान और हदीस का अध्ययन… अगर आप अफगानिस्तान के मौजूदा हालात… आतंकवाद और तालिबान की मानसिकता को समझना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको कुरान का अध्ययन करना चाहिए और खासकर उन आयतों के बारे में जानना चाहिए जिन पर टिप्पणी करने की वजह से शिया बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी मुसलमानों के निशाने पर आ गए थे

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