पथ विक्रेताओं के नाम पर प्रदेश के 217 नगरों में आयोजित ये दीपोत्सव मेला चुनावी शगूफा एवं राजनीति से कम नहीं है।

समाज जागरण

साढ़े चार वर्षों तक पथ विक्रेताओं का उत्पीड़न जारी रहा, पथ विक्रेता अधिनियम- 2014 एवं माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों को दरकिनार करते हुए संबंधित विभागों ने जिस प्रकार से पुलिस की बलपूर्वक सहायता एवं बुल्डोजर की ताकत से जो कुछ भी किया वो किसी से छुपा नहीं है जिसके लिए इंसाफ़ की गुहार अलग अलग नगरों के पथ विक्रेता संबंधित अधिकारियों एवं विभागों की चौखट पर भी लगाते रहे।
पथ विक्रेताओं के नाम पर आयोजित ये मेला पटरी दुकानदारों के नाम पर केवल छलावा है। जिस प्रकार भ्रष्टाचार की सूचना मुरादाबाद नगर निगम से आई है उसी प्रकार की सूचना अन्य जिलों से भी आ रही हैं।

लखनऊ नगर निगम में कुल 8 ज़ोन हैं और हर ज़ोन में से एक सौ पथ विक्रेताओं को निशुल्क स्टॉल देने की बात टाउन वेंडिंग कमेटी की बैठक दिनांक 23 अक्तूबर को तय हुई थी इस प्रकार लखनऊ के 8 ज़ोनों में कुल मिलाकर 8 सौ पथ विक्रेताओं को निशुल्क स्टॉल दिए जाने के निर्देश जारी किए गए थे लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसकी हक़ीक़त कुछ और ही बयान कर रही है जो कि छानबीन का विषय है।
28 अक्तूबर को लखनऊ के दीपोत्सव मेले के उदघाटन समारोह में माननीय मुख्यमंत्री जी ने लखनऊ मेले में लखनऊ के 1500 (पंद्रह सौ) पथ विक्रेताओं को निःशुल्क स्टॉल देने की बात जब अपने संबोधन में की तो पूरा पिंडाल तालियों की गड़गड़ाहट और नारों की गूंज से घनघना उठा लेकिन इस भीड़ के समंदर में से किसी एक ने भी ये जानने की कोशिश नहीं की कि माननीय मुख्यमंत्री जी को ये भ्रमित आंकड़ा आख़िर किस विभाग ने पेश की थी ?
नगर निगम लखनऊ ने जो लिस्ट पथ विक्रेताओं की बनाई थी उनमें से किसी एक को भी स्टॉल नहीं दी गई बल्कि उन्हें मेला स्थल से दूर हटकर खुले आसमान के नीचे 2×2 मीटर की खाली भूमि पर केवल निशान लगाकर अपने अपने साधन के सहारे वयवसाय करने पर मजबूर कर दिया गया और इस प्रकार से संबंधित विभागों ने अपनी ज़िम्मेदारी को केवल फाइलों में क़ैद कर दिया जोकि निष्पक्ष जांच का विषय है लेकिन इस जलवंत मुद्दे पर आखिर कौन अपनी जुबान खोलेगा ???

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