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हिन्दुओ में एक कमी।है ?

हिंदुओं में एक कमी है वह है ‘अखंड विश्वास’ हमारे शास्त्रों ने हमें इस तरह से प्रशिक्षित किया है कि अखंड विश्वास हमारे संस्कार का मूल अंश बन गया है | चाहे वह किसी पत्थर की बनी मूर्ति के प्रति हो, जीव-जंतुओं के प्रति हो, पेड़-पौधों के प्रति हो, साक्षात जीते-जागते इंसानों के प्रति हो या किसी भी हिंदू हित की बात करने वाले सामाजिक या राजनीतिक संगठन के प्रति हो | बस यही पर हिंदू मात खाता है |

इतिहास गवाह है कि हिंदुओं ने जब-जब किसी भी व्यक्ति या संगठन के प्रति अखंड विश्वास रखा, तो वहीं से हिंदुओं का पतन शुरू हो गया | प्रकृति की यह व्यवस्था है कि जो व्यक्ति इतिहास से सबक लेकर भविष्य के प्रति जागरुक नहीं होता है, वह निश्चित तौर से नष्ट हो जाता है |

आज से 2,800 वर्ष पूर्व जब समस्त पृथ्वी पर बस सिर्फ सनातन हिंदू था, इसी धर्म से विश्व की सभी संस्कृतियां निर्मित पोषित पल्लवित और विकसित हुई थी | विश्व की जितनी बड़ी संस्कृतियां नष्ट हुई हैं, वह सभी पैशाचिक संस्कृति के हमला होने पर अपने प्रमुख लोगों पर अखंड विश्वास के कारण ही नष्ट हुई हैं |

और आज विश्व की सारी संस्कृतियों को नष्ट करने के बाद पैशाचिक विधर्मी भारत के मूल सत्य सनातन धर्म को नष्ट करने पर आमादा हैं | इसके लिये साम, दाम, दंड, भेद किसी भी नीति के द्वारा यह विधर्मी हमारी मूल संस्कृति को नष्ट कर देना चाहते हैं |

साम से तात्पर्य है समझा-बुझाकर अर्थात शिक्षा पद्धति द्वारा डिवेट, डिस्कशन या सेमिनार द्वारा यह सदैव हमें यह बताना चाहते हैं कि हमारी सनातन संस्कृति अतार्किक, अवैज्ञानिक और पुरानी है और इन विधर्मी पिशाचों ने अपनी संस्कृति को पूर्णतया वैज्ञानिक, विकसित और भविष्य में सुख देने वाली बना लिया है |

दाम से तात्पर्य है भारत के अंदर दो लाख से अधिक विधि अनुसार पंजीकृत समाज सेवी संगठन (NGO) इन्हीं विदेशी विधर्मी पिशाचों से धन लेकर उनके उद्देश्य की पूर्ति के लिये इस देश में चल रहे हैं | निश्चित तौर से इस तरह का लिया गया धन भारतीय संस्कृत के विनाश के लिए ही खर्च किया जा रहा है |

बड़े स्तर पर देश में धर्मांतरण के साथ-साथ और शिक्षा के नाम पर, चिकित्सा के नाम पर, चंगाई सभाओं के नाम पर, जो दूसरे पैशाचिक धर्म को सनातन धर्म से अच्छा और विकसित बताया जा रहा है | यह सब दाम अर्थात धन का ही प्रभाव है |

अब हम दंड की चर्चा करते हैं | हम सभी इतना तो जानते ही हैं कि भारत के अंदर पूरा का पूरा संवैधानिक और विधिक तंत्र वही है जो अंग्रेज ने अपने शासन काल में विकसित कर भारत पर थोप दिया था | आज तक हमारे राजनेताओं ने कभी भी अंग्रेजों द्वारा विकसित किए गए संवैधानिक और विधिक तंत्र को भारतीय संस्कृति के अनुरूप बदलने का प्रयास नहीं किया है या यह कहिये कि उनमें इस तंत्र को बदलने का सामर्थ ही नहीं है |

इसी वजह से अल्पसंख्यक को दी जाने वाली विशेष सुविधाओं के नाम पर भारत का मूल निवासी सनातन हिंदू की सारी संपदा लूटकर इन विधर्मियों के हाथ में सौंपी जा रही है | और यदि कोई सनातन हिंदू इसका विरोध करता है तो अंग्रेजी विधि के द्वारा उसके ऊपर कानूनी कार्रवाई प्रारंभ कर दी जाती है और उसे इतना प्रताड़ित किया जाता है कि उस प्रताड़ना के भय से अन्य कोई भी सनातन हिंदू विरोध करने का साहस इकट्ठा न कर सके |

अब थोड़ा भेद पर भी चर्चा करते हैं | हम लोग सदैव से जिसने जैसा थोप दिया उस व्यवस्था में जीने के आदी हैं | चाहे वह राजशाही सत्ता हो, धर्म शाही सत्ता हो, राजनीतिक सत्ता हो या लोकतांत्रिक राजनैतिक तंत्र | हमारी मूल प्रवृत्ति कभी भी विरोध करने की नहीं रही है | जितने भी बड़े युद्ध हिंदुओं ने लड़े उन सभी के मूल में जाकर देखें तो शासकों का अहंकार या अपने सत्ता का अस्तित्व ही दिखाई देता है | कभी भी कोई भी युद्ध सनातन धर्म के पुनर्स्थापन के लिए नहीं लड़ा गया |

आज जो लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था हमारे ऊपर लागू है, उस लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के सभी मुखिया ब्रिटेन के कानून के दायरे में ब्रिटिश सत्ता की इच्छा और मंशा पर देश में शासन चलाते हैं | उन्हें भारतीय सभ्यता और संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है | जब कभी भी हिंदू संगठित होकर उनसे राष्ट्र हित या धर्म हित का प्रश्न करता है तो वह लोग कोई न कोई ऐसा सागूफा छोड़ देते हैं जिससे कि संगठित हिंदू पुनः आपसी वर्ग संघर्ष में फंस जाता है और सनातन संस्कृति के लिये सामूहिक संघर्ष की स्थिति समाप्त हो जाती है |

चाहे वह कोई भी राजनीतिक दल हो या किसी भी स्वयंसेवी संगठन से संरक्षित या नियंत्रित हो, लेकिन सत्य यह है कि सभी विदेशी अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों के दबाव में भारत के विनाश के लिए ही कार्य कर रही हैं | भारत के धर्म और सनातन संस्कृति को नष्ट करने के लिये इन विदेशी षड्यंत्रकारियों ने हजारों की तादाद में भगवा वस्त्र धारी हिन्दू समाज में छोड़ रखे हैं | जो निरंतर सनातन संस्कृति को नष्ट करने में लगे हुये हैं | इन्होंने बड़े-बड़े मंदिरों मठों या अन्य धार्मिक संगठनों पर कब्जा कर रखा है | जो विदेशों से पोषित हैं |

इन से सावधान होना होगा और सनातन हिंदू समाज का जो बुद्धिजीवी वर्ग है | उसे संगठित होकर अपने सनातन संस्कृति की रक्षा के लिये सनातन संस्कृति को मानने वालों को प्रेरित और प्रशिक्षित करना होगा | किसी भी राजनीतिक दल या राजनीतिक व्यक्ति में इतना सामर्थ नहीं कि वह भारत की ‘सनातन संस्कृति’ को इन अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्रकारी विधर्मी पिशाचों से बचा सके | उठो भारत के सनातन हिंदु धर्मीओं उठो और धर्म के रक्षार्थ धर्मानुसार आचरण करके अपनी रक्षा स्वयं करो | शास्त्र ने कहा है “धर्मो रक्षति रक्षिता” अर्थात यदि हम धर्म की रक्षा करेंगे तो निश्चित तौर से धर्म हमारी रक्षा करेगा |

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