हाईकोर्ट ने कहा- धर्मांतरण कानून लागू होते ही पीड़िता को कैसे हो गई अपने अधिकारों की जानकारी

जबरन धर्मांतरण कराने के आरोपी को जमानत: हाईकोर्ट ने कहा- धर्मांतरण कानून लागू होते ही पीड़िता को कैसे हो गई अपने अधिकारों की जानकारी

यूपी में धर्मांतरण अध्यादेश नवंबर 2020 में लाया गया मगर सरकार ने इसे मार्च 2021 में गजट मेंं प्रकाशित किया। चार मार्च 2021 को राज्य पाल के हस्ताक्षर के बाद यह प्रदेश में लागू हुआ।

युवती से चार साल तक दुष्कर्म करने और धर्म बदलने के दबाव डालने के आरोपी की जमानत मंजूर करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिकायत दर्ज कराने वाली पीड़िता को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। कोर्ट ने कहा अपनी मर्जी से चार साल तक आरोपी के साथ रहने वाली पीड़िता को प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी अध्यादेश लागू होते ही अचानक अपने अधिकारों की जानकारी हो गई। उसके कृत्य से उसकी मानसिकता उजागर होती है।

महोबा निवासी मुन्ना खान की जमानत अर्जी पर सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति राहुल चतुर्वेदी ने कहा कि पीड़िता याची के सभी कार्यों में अपनी मर्जी से सक्रिय सहभागी रही है। इससे जाहिर है कि वह अपनी इच्छा से आरोपी के साथ रह रही थी और यहां तक की दूसरे व्यक्ति के साथ शादी हो जाने के बाद भी उसने आरोपी से रिश्ते बनाए रखे। याची मुन्ना खान के खिलाफ पीड़िता ने चार मार्च 2021 को महोबा कोतवाली में आईपीसी की धाराओं के अलावा धर्मांतरण विरोधी अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई है।

शादीशुदा हो या अविवाहित बालिग साथ रह सकेंगे।
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि धर्म परिवर्तन करके शादी करने वाले बालिगों को सुरक्षा प्रदान करने में धर्मांतरण महत्वपूर्ण तथ्य नही है। यदि धर्मांतरण जबरन कराने का आरोप नहीं है तो ऐसे युगल को सुरक्षा मुहैया कराना पुलिस व प्रशासन की बाध्यता है।
कोर्ट ने कहा कि दो बालिग अगर अपनी मर्जी से शादी कर रहे है या नही भी की है, तब भी उन्हें साथ रहने का अधिकार है। भले ही उनके पास विवाह का कोई प्रमाण पत्र नहीं है।
पुलिस अधिकारी को प्रमाण पत्र के लिए ऐसे युगल को बाध्य नहीं करना चाहिए। यह आदेश न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय ने दिया है। मामले के तथ्यों के अनुसार 20 वर्षीय याचि ने धर्म परिवर्तन कर 40 वर्षिय व्यक्ति से शादी की। याचिका दाखिल कर परिवार वालों पर धमकाने का आरोप लगाया। इस मामले में कोर्ट नें कहा कि ऐसे मामले में कानूनी स्थिति स्पष्ट है। दो बालिग स्त्री पुरुष अपनी मर्जी से शादी कर सकते है चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का मानने वाले हो। इस मामले में सुप्रिम कोर्ट ने लता सिंह के मामले में स्पष्ट निर्देश दिया है कि अपनी मर्जी से अंतरधार्मिक या अन्तरजातीय विवाह करने वाले बालिगों को किसी प्रकार से परेशान न किया जाय।

Please follow and like us:
%d bloggers like this: