गुरुगीता भाग 6

विश्वनाथ त्रिपाठी

बंदउ गुरु पद पदुम परागा |
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा ||
अमिय मूरि मय चूरन चारू |
समन सकल भव रुज परिवार ||
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस मे पूज्य गुरुदेव के चरणों की वंदना मे कमलेश चरणो मे छिपी शक्ति को समझाने का प्रयास किया कहते हे मानव तू कितना भोला है | आज तक गुरुदेव मे निहित शक्तियो को तू समझ ही नहीं सका |अरे मूर्ख! गुरदेव के चरणो मे तो अमरत्व प्रदान करनेवाली सुंदर जड़ी है जो संपूर्ण सांसारिक कष्टो को दूर कर देती है |अर्थात जो व्यक्ति गुरु चरणो का आश्रय ले लेता है वह भव सा गर से पार हो जाता है | यही बात तो हमारे पुराणों ने हमे बताया है जहाँ से निकाल कर गोसाईं जी ने हमे हमारी भाषा मे हमे सुलभ करा दिया |
यदि हम अपने ग्रंथो का अध्ययन करते होते, सत्संग मे जाते होते तो हमारा मन संसार मे इतना न घुसा होता है, धर्म का त्याग कर हम असंस्कृत न हो गये होते | भगवान शिव ने मां पार्वती का माध्यम बना कर हमे सद्गुरु से जोड़कर उनकी पूजा की दीक्षा दी है भोले नाथ आगे कहते है हे देवि ! —
कर्मणा , मनसा,वाचा ,
नित्यं आराधयेत गुरुं |
दीर्घ दंडंं नमस्कृत्य,
निर्लज्जो गुरु सन्निकट ||
शिष्य को चाहिए कि लज्जा मुक्त हो कर वह गुरुदेव को दंडवत लेट कर प्रणाम करे मन वाणी और कर्म से उनकी आराधना नित्य समर्पित भाव से करे |
शरीरं, इन्द्रियं, प्राणान्,
सद्गुरेभ्यो निवेदयेत् |
आत्मदारादिकं सर्वम्
सद्गुरेभ्यो निवेदयेत् ||
शिष्य का शरीर, इंद्रिय, और मन तथा प्राण हमेशा गुरु कार्य के लिए तत्पर रहना चाहिए | इतना ही नहीं अपनी पत्नी व बच्चो को भी गुरु सेवा व कार्य मे समर्पित करना चाहिए |
कृमि कीट भस्म विष्ठा,
दुरगंधि मल मूत्रकम् |
श्लेषम रक्तम् त्वचा मांसं
वंचयेत् न वरानने ||
भगवान भोले नाथ माता पार्वती से कहते हे देवि! यह शरीर कृमि, कीट भस्म विष्ठा मल मूत्र त्वचा मास रक्त आदि के योग से ही तो बना है यदि यह गुरु कार्य के लिए समर्पित कर दिया जाय तो इससे बढ़ कर और कोई पुण्य का कार्य नहीं हो सकता |
संसार वृक्ष समारूढ़ा,
पतंते नरकार्णवे |
येन चैव उद्धृता: सर्वे
तस्मै श्री गुरुवे नम:||
जो सांसारिक माया रूपी सागर मे डूब कर अपना सब कुछ बर्वाद कर चुका है ऐसे अधम प्राणी को भी सद्गुरू उस कीचड़ से निकाल कर उसे विमल आत्मा वाला बना कर नरक जाने से बचा देता है ऐसे गुरू को बार बार प्रणाम है |
गुरूर्बह्मा, गुरूर्विष्णु:,
गुरूर्देवो महेश्वर:|
गुरू सक्षात परब्रह्म,
तस्मै: परम गुरुवे नम:||
हे देवि ! गुरू शिष्य के भीतर ज्ञान की सृष्टि करने के कारण वह ब्रह्मा के रूप मे, ज्ञान का संरक्षण करने के कारण भगवान विष्णु के रूप मे और अज्ञान का संहार करने के कारण शिव रूप मे पूजनीय है | इस प्रकार गुरुवे परब्रह्म परमेश्वर ही हैं |
हेतवे जगतामेव,
संसारार्णवसेतवे|
प्रभावे सर्व विद्यानां ,
शंभवे गुरुवे नम:||
हे श्रेष्ठ.आनन वाली देवि! गुरू तो संसार की उत्पत्ति का कारण है, वही संसार सागर से पार होने वाला सेतु भी है, वही सारी विद्याओं को प्रकट भी करता है| इस प्रकार शिश रूक, सदा कल्याणकारी स्वरूपधारी गुरू को प्रणाम है |
भाइयो इस प्रकार नित्य कल्याण कारी गुरुदेव के संबंध मे हमने आज जो कुछ भी लिखा वह भगवान शिव की वाणी है लेकिन हमे यह सोचना होगा कि अपना जीवन उत्तम बनाने के लिए शिव जी की वाणी पर विश्वास करे और जीवन मे पालन का संकल्प भी लें | रामचरितमानस की एक पंक्तियाँ अवश्य ध्यान मे रखें
मातु पिता अरु गुरु की बानी |
विना विचार करहु शुभ जानी ||

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