गुरु गीता भाग 7

गुरु गीता भाग 7
विश्वनाथ त्रिपाठी

सब धरती कागद करूँ,
लेखनि सब वन राय |
सात समुद्र की मसि करूँ,
गुरु गुरु गुन लिखा न जाय ||
संत कबीर दास ने लिखा कि गुरू जी की महिमा का वर्णन करने के लिये संपूर्ण धरातल को कागज के रूप मे प्रयोग किया जाय, भूमि पर विराजमान सम्पूर्ण वन प्रदेश की लकड़ियों को लेखनी बना लिया जाय और सभी सागर को स्याही का पात्र बना कर उसमे स् यही घोल दी जाय फिर गुरदेव के गणित्र का वर्णन आरम्भ किया जाय तो भी उनके गुणो का गान करना सम्भव नहीं हो सकता |
यह बात केवल कबीर की ही नहीं उच्चकोटि के सारे संतो ने स्वीकार किया है | संत शिरोमणि अनंत विभूषित ब्रह्मर्षि महामंडलेश्वर स्वामी पंचमानंद जी महाराज, पीठाधीश्वर वन खंडी सरकार निखिल धाम गैपरा मुरे ना तो कहते हैं कोई गुरुभक्ति करके देखे तो शिष्य अगर समर्पित है तो वह सब कुछ पा सकता है, | मुझे इसका अनुभव है, मै गुरुभक्ति मे जीता हूँ क्यो कि हमारे भगवान राम और कृष्ण गुरू के सानिध्य मे ही शिक्षा प्रापत कर ब्रह्मांड नायक बन सके |
आइए भगवान शिव के मुख से निकली गुरुगीता को आगे ले चलते है| आज हम सातवे भाग मे गुरु चर्चा करेंगे | भगवान भोलेनाथ कैलाश पर मा पार्वती से कहते हैं —–
अज्ञान तिमिरांधस्य,
ज्ञानांजय शलाका |
चक्षु: उन्मीलितं येन
तस्मै; श्री गुरुवे नम: ||
हे देवि! अज्ञान के अंधकार से अंधे हुए प्राणी को जिसने ज्ञान की शलाका से अंजन लगा कर नेत्रों को खोल दिया हो उसे मै बार बार प्रणाम करता हूँ |
त्वं पिता, त्वं च मे माता,
त्वं बंधु: त्वं च देवता |
संसार प्रति बोधार्थं,
तस्मै श्री गुरुवे नम: ||
वे गुरुदेव हमारे वंदनीय हैं जो अपने शिष्य का पालन पिता की तरह करते है, माता की तरह प्यार करते है, भाई के समान मदत करते है, संसार की सत्यता का बोध कराते हुए इष्ट देव का भी दायित्व निभाते है, उन्हे मै प्रणाम करता हूँ |
यत्सत्येन् जगत सत्यं
यत्प्रकाशेन् भाति तत् |
यदानंदेन नन्दन्ति,
तस्मै श्री गुरुवे नम; ||
जिसकी सत्यता से जगत की सत्यता का आभास है, जिसके प्रकाश से संसार प्रकाशित होता है | जिसके आनन्द से आनंद से यह संसार आनंदित हो गुरू को प्रणाम है |
यस्य स्थित त्या सत्यमिदं,
यद् भाति भानु रूपत: |
प्रियं पुत्रादि यत् प्रीत्या ,
तस्मै श्री गुरुवे नम:||
जिनके सत्य का आधार ले कर यह संसार सत्य प्रतीत होता है| जो सूर्य की भाति अपने ज्ञान रूप प्रकाश से सभी को प्रकाशित करता है जिसके प्रेम के कारण ही पुत्र आदि सभी प्रिय लगते है उन देव रूप गुरू को प्रणाम है |
येन चेतयते हि इदं चित्तं,
चेतयते न यम्|
जाग्रत स्वप्न, सुसुप्त्यादि |
तस्मै श्री गुरुवे नम:||
जिसकी चेतना से यह संपूर्ण संसार चेतना युक्त लगता है, लेकिन मानव को इस सत्य का बोध नहीं होता |गाह्रो, स्वपन और सुषुप्ति आदि अवस्था का जो बोध कराते है उन सद्गुरू को प्रणाम |
यस्य ज्ञानादि इदँ विश्वं,
न दृश्यंं भिन्नमेदत:|
सदेक रूप रूपाय,
तस्मै श्री गुरुवे नम: ||
जिस गुरू के ज्ञान से संसार की भेद दृष्टि नष्ट हो जाती है, एक ही रूप मे दिखने वाला वह गुरू बारंबार प्रणम्य है |
इस प्रकार सद्गुरु जीवन का आधार है हमे उनके प्रति आदरभाव से जाकर दीक्षा लेकर साधना करनी चाहिए |

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